भगत सिंह की विचारधारा बहुत से साथियों की सांझी विचारधारा थी

सुशान्त कुमार

 

1857 की लौ को तेज करने के लिए 1907 के आस-पास इतिहास नए युग की सूत्रपात कर रहा था। पंजाब में शहीद भगतसिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को गांव बंगा चक्क नं. 105 गुगैरा ब्रांच (अब लायलपुर, पाकिस्तान)में हुआ था। माता का नाम विद्यावती व पिता का नाम किशन सिंह था। चाचा अजीत सिंह को लाला लाजपतराय के साथ किसान आंदोलन का प्रतिनिधित्व करने में अंग्रेज सरकार ने मांडले (वर्मा) में निर्वासन कर रखा था।

जनता के रोष के कारण नवंबर 1907 को रिहा किया गया। पिता किशन सिंह को अंग्रेज सरकार ने नेपाल से पकड़ा था। जिसे बाद में  छोड़ दिया था। सबसे छोटे चाचा स्वर्ण सिंह पर कई मुकदमें बनाए गए थे और वे जमानत पर रिहा हुए थे। दादी ने भगतसिंह को ‘आंगावाला’ नाम दिया था। बाबा अर्जुन सिंह ने अपने पोते का पालन-पोषण अपनी देखरेख में की। वे शुरू से ही उसके भीतर सामाजिक चेतना और तर्कशक्ति के विकास के लिए प्रयत्नशील थे। उसे सामाजिक बराबरी और प्रगति के विचारों से परिचित करा रहे थे।

शहीद भगत सिंह ने फांसी पर चढऩे से कुछ समय पहले कहा था-‘जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है, तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते है। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोडऩे के लिए एक क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरूरत होती है, अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाले प्रतिक्रियावादी शक्तियां जनता को गलत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती है।

इससे इंसान की प्रगति रूक जाती हैं और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह जरूरी है कि क्रांति की स्पिरिट ताजा की जाय, ताकि इंसानियत की रूह में एक हरकत पैदा हो।’ उन्होंने आगे कहा था कि-‘अंग्रेज की जड़े हिल गई है, कुछ ही दिनों में वे अपने देश चले जाएंगे। बाद में काफी अफरा-तफरी होगी और तब लोग उन्हें याद करेंगे।’

रोलेक्ट एक्ट व जलियांवाला के बाद गांधी ने क्रांतिकारियों से एक वर्ष का समय लिया। जिसमें उसने कहा था-‘हिंसा से हिंसा को खत्म नहीं किया जा सकता। हमें अंग्रेजों को ऐसा अवसर नहीं देना चाहिए कि वे और भी उत्साह से हम पर अत्याचार करें। हमारी हिंसात्मक कार्रवाई से एक ओर उनका बल बढ़ेगा और दूसरी ओर विश्व जनमत का समर्थन भी प्राप्त नहीं होगा। आप लोग मुझे एक वर्ष का समय दीजिए। मैं अगर इस एक वर्ष में स्वराज्य हासिल न कर पाया तो आप अपने रास्ते पर चलने को स्वतंत्र होंगे।’

भगत सिंह लगातार अध्यनरत रहे-‘वे राजनीति को धर्म से रंगे जाने के विरोधी थे। उनका मानना था कि क्रांतिकारियों और जनता के बीच सम्प्रेषण का अभाव भी आंदोलन की असफलताओं का एक कारण था। मजदूर वर्ग एक क्रांतिकारी ताकत बन सकता था पर उनकी अनदेखी की गई। सबसे प्रमुख बात यह थी कि क्रांतिकारियों को खुद भी पता नहीं था कि क्रांति के बाद स्थापित होने वाली सरकार का रूप क्या होगा? दूसरे देशों के क्रांतिकारी शक्तियों से उनका संबंध कैसा होगा? नई व्यवस्था में धर्म का क्या स्थान होगा? 

पिता से आखिरकार उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन में जुटे रहने की अनुमति प्राप्त कर ली। अध्ययन में पुस्तकालयों में रहकर सामाजिक समस्याओं पर वैज्ञानिक व ऐतिहासिक दृष्टिकोण से नजर दौड़ाने लगे। उनके जीवन में शहीद करतार सिंह सराभा व कूका विद्रोह का गहरा प्रभाव था। भगत सिंह महज एक व्यक्ति नहीं थे, वे एक आंदोलन से पैदा हुए और फिर आंदोलन का सर्वोच्च व सर्वोत्तम प्रतीक बन गए।

भगतसिंह की विचारधारा सिर्फ एक व्यक्ति की ही नहीं, एक आंदोलन की बहुत से साथियों की सांझी सोच व विचारधारा बनी। इसलिए इस लेख को भगत सिंह ही नहीं, शचीन्द्रनाथ सान्याल, शिव वर्मा, महाबीरा, डॉ. गया प्रसाद, पंडित किशोरीलाल, जयदेव कपूर, विजय कुमार सिन्हा, कमलनाथ तिवारी, बटुकेश्वर दत्त, यतीन्द्रनाथ दास, सुखदेव, राजगुरू, दुर्गा भाभी, भगवतीशरण वोहरा, चंद्रशेखर आजाद जैसे सैकड़ो सार्थियों की विचारधारा समझनी चाहिए।

हम फिर एक बार 18 वीं सदी से आगे बढ़ते है। 22 जून 1897 में पूना में चापेकर बंधुओं ने रैंड व ऐवस्र्ट को मार कर स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों के प्रवेश की घोषणा करने वाला पहला धमाका किया। 4 मई 1897 को लोकमान्य तिलक ने रैंड को निरंकुश कहा। 1902 में बंकिमचंद चटर्जी व विवेकानंद से प्रेरित होकर 20 सदी के पहले दशक के क्रांतिकारी धार्मिक उपासनों और कर्मकांडो से तथा प्राचीन व तात्कालीन हिन्दुत्व के पौराणिक उपासनों, प्रतीकों, गीतों और नारों से प्रेरणा ग्रहण करते थे। 30 अप्रैल 1908 को किंग्सफोर्ड की बग्घी पर खुदीराम बोस ने बम फेंका था।

यह पीढ़ी खुद को ‘वयस्क’ समझने लगी थी। नौजवान तबके में बेचैनी थी मगर पुराना नेतृत्व होमरूल के लिए प्रस्तावों और प्रार्थना पत्रों से आगे बढऩे को तैयार न था। 1913 में गदर पार्टी का गठन क्रांतिकारी आंदोलन के विकास की दिशा में एक बहुत बड़ा व महत्वपूर्ण कदम था। इसने राजनीति को धर्म से मुक्त किया और धर्म निरपेक्षता को अपनाया। धर्म को निजी मामला घोषित कर दिया गया। 1917 की अक्टूबर क्रांति ने न सिर्फ रूस के अवाम को पूंजीपतियों और जमींदारी की गुलामी से मुक्त किया बल्कि एक बिल्कुल नये समाज और नये इंसान को भी जन्म दिया।

13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड से जनता के गुस्से की लहर ऊंची उठ गई। पंजाब के लगभग सभी शहरों में लोग सडक़ों पर निकल आए। सितंबर 1920 में लाला लाजपतराय ने वस्तुगत परिस्थितियों का तथ्यपरक अध्ययन कर कहते हैं कि स्वराज्य शब्द गूंजने लगा है। सरकार परेशान और घबराई हुई थी। उसके हाथ पैर फूलने लगे थे।

यदि सरकार की चौमुखी अवज्ञा की छूट शहरों से चलकर करोड़ों किसानों तक पहुंच जाती है, तो अंग्रेजी हुकूमत के पास बचत के लिए कोई चारा नहीं रह जाएगा। 30 करोड़ जनता के विद्रोह की खौलती हुई हांडी से उनकी सारी तोपें और हवाई जहाज भी उन्हें बचा नहीं सकेंगे। गांधी भी खुश नहीं थे। वे आंदोलन वापस लेने के लिए किसी अवसर की प्रतीक्षा में थे और फरवरी 1922 को चौरी-चौरा की घटना के खिलाफ असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया। 

सभी क्रांतिकारियों को एक अखिल भारतीय पार्टी में संगठित करने 1923 में शचींद्रनाथ सान्याल ने हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ की बुनियाद डाली। घोषण पत्र में कहा गया था-‘राजनीति के क्षेत्र में क्रांतिकारी पार्टी का तत्कालिक उद्देश्य संगठित सशस्त्र क्रांति द्वारा भारत के संयुक्त राज्यों का एक संघीय गणराज्य स्थापित करना है। शोषण पर आधारित ऐसी समस्त व्यवस्थाओं की समाप्ति पर आधारित होगा जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को संभव बनाती है।

8 सितंबर 1928 को भगत सिंह, चंद्रशेखर आजार, कुंदनलाल, फणींद्रनाथ घोष, मनमोहन बेनर्जी, त्रिलोक्य चक्रवर्ती, प्रतुल गांगुली और एसएन मजुमदार के प्रयासों से समाजवाद को पार्टी के अंतिम लक्ष्य के रूप में रखकर हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ का गठन हुआ।

4 सितंबर 1928 की ट्रेड डिस्प्यूट बिल व 6 सितंबर 1928 की पब्लिक सेफ्टी बिल के खिलाफ 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दर्शक दीर्घा से असेम्बली भवन में बम फेंके और नारे लगाने के साथ-साथ पर्चे भी गिराये, जिसमें बम फेंकने के राजनीतिक उद्देश्य को स्पष्ट किया गया था। समाजवादी समाज की स्थापना को अंतिम उद्देश्य के रूप में स्वीकार करने के बाद भी कुछ कमजोरियां थी। जैसे व्यक्तिगत ढंग के कामों में लगे रहना।

मजदूरों, किसानों, युवकों और मध्यम वर्ग के बुद्धिजीवियों को संगठित करने की बात करते थे, लेकिन पंजाब में नौजवान भारत सभा के गठन को छोडक़र और कहीं भी संजीदगी के साथ उस दिशा में कार्रवाई नहीं हुई। माक्र्सवाद के संबंध में ज्ञज्ञ्क्र अधकचरा था। हिंसात्मक गतिविधयों जिसमें जालिक सरकारी अधिकारियों की हत्या और छुटपुट विद्रोह शामिल थे। मजदूरों, किसानों, युवकों और विद्यार्थियों के जन संगठन बनाने के नाम से संगठन बनाना चाहते थे लेकिन अमल में हिंसात्मक गतिविधियां और सशस्त्र कामों की तैयारी तक ही सीमित रहा।’

इन सारे कमियों और सीमाओं के बावजूद छोटे से समय में बहुत महत्वपूर्ण उपलब्ध्यिां भी है। जिसमें 1928 में लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन। नौजवान भारत सभा के लिए उनका आदर्श वाक्य जो घोषणा पत्र में दर्ज है-‘क्रांति जनता द्वारा जनता के हित में।’ दूसरे शब्दों में 98 प्रतिशत के लिए स्वराज्य। स्वराजय जनता द्वारा ही नहीं, बल्कि जनता के लिए भी। यह एक बहुत कठिन काम है। यद्यपि हमारे नेताओं ने बहुत से सुझाव दिए हैं, लेकिन जनता को जगाने के लिए कोई योजना पेश करके उस पर अमल करने का किसी ने भी साहस नहीं किया।

विस्तार में गए बगैर हम यह दावे से कह सकते हैं, कि अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए रूसी नवयुवकों की भांति हमारे हजारों मेधावी नौजवानों को अपना बहुमूल्य जीवन गांवों में बिताना पड़ेगा और लोगों को समझाना पड़ेगा कि भारतीय क्रांति वासतव में क्या होगी। उन्हें समझाना पड़ेगा कि आने वाली क्रांति का मतलब केवल मालिकों की तब्दीली नहीं होगा। उसका अर्थ होगा नई व्यवस्था का जन्म। एक नई राजसत्ता। इस कार्य को केवल क्रांतिकारी युवक ही पूरा कर सकेंगे। क्रांतिकारी से एक बम और पिस्तौल वाले आदमी से अभिप्राय नहीं है।’

8 अप्रैल असेम्बली बम केस में बयान-‘इंकलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के संबंध में हमने जो व्याख्या अपने बयान में दी है, उसे उड़ा दिया है, हालांकि यह हमारे उद्देश्य का खास भाग है। पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है। और यही चीज थी जिसे हम प्रकट करना चाहते थे।

हमारे इंकलाब का अर्थ पूंजीवादी युद्धों की मुसीबतों का अंत करना है। पर्चे की शुरूआत ‘बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज की आवश्यकता होती है कि हम‘सार्वजनिक सुरक्ष और औद्योगिक विवाद’ के दमनकारी कानूनों और लाला लाजपतराय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह कदम उठा रहे है।’

तीसरा 1929 में हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ का घोषणा पत्र में भगवती चरण बोहरा लिखते हैं जो आज भी प्रासंगिक है। भारत साम्राज्यवाद के जुएं के नीचे पिस रहा है। इसमें करोड़ों लोग आज अज्ञानता और गरीबी के शिकार हो रहे हैं। भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या जो मजदूरों और किसानों की है, उनकी विदेशी दबाव एवं आर्थिक लूट ने पस्त कर दिया है। विदेशी पूंजीवाद का एक तरफ से और भारतीय पूंजीवाद के धोखे भरे हमले का दूसरी तरफ से खतरा है। भारतीय पूंजीवाद विदेशी पूंजी के साथ हर रोज बहुत से गठजोड़ कर रहा है। भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूंजीपति से विश्वासघात की कीमत के रूप में सरकार में कुछ हिस्सा प्राप्त करना चाहता है। इसी कारण मेहनतकश की तमाम आशाएं अब सिर्फ  समाजवाद पर टिकी है और यही पूर्ण स्वराज्य और सब भेदभाव खत्म करने में सहायक साबित हो सकता है।

इसके अलावा 1929 में हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ की गतिविधियां, 26 जून 1930 में ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ का लिखा जाना। मार्च 1931 को सुखदेव के द्वारा गांधी जो अंतिम चिट्ठी ये सारे बढ़ा हुआ कदम था। माक्र्सवादी को सिद्धांत के रूप में व समाजवादी को अंतिम उद्देश्य के रूप में स्वकार करना भी एक अहम कदम था। यह वह दौर था। जब समाजवाद को ध्येय के रूप में स्वीकार किया गया था। मनुष्य द्वारा मनुष्य के और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषण से मुक्त वर्गहीन समाज के पक्ष में थे।

उन लोगों ने अपनी लड़ाई को ब्रिटिश साम्राज्यवादी के खिलाफ ही नहीं बल्कि विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ थे। उनका विश्वास था कि क्रांति के बाद जो सरकार बनेगी उसका रूप एक प्रकार की सर्वहारा वर्ग की तानाशाही का होगा। उन्होंने ईश्वर, धर्म और रहस्यवादी से पूरी तरह छुटकारा पा लिया था। वे धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करते थे ओर उनका दृष्टिकोण घोर साम्प्रदायिकतवाद के विरोध में था।

गांधी के नाम सुखदेव की ‘खुली चिट-ठी में मार्च 1931 में लिखते हैं-हिन्दुस्तानी सोशिलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के नाम से ही साफ पता चलता है, कि क्रांतिवादियों का आदश्र समाज-सत्तावादी प्रजातंत्र की स्थापना करना है। यह प्रजातंत्र मध्य का विश्राम नहीं है।द्ध उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो, तब तक वे लड़ाई जारी रखने के लिए बंधे हुए हैं। परंतु बदलती हुठ परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे अपनी युद्ध नीति बदलने को तैयार अवश्य होंगे। क्रांतिकारी युद्ध जुदा-जुदा मौकों पर जुदा-जुदा रूप धारण करता है। 

कभी वह प्रकट होता है, कभी गुप्त, कभी केवल आंदोलन रूप लेता है और कभी जीवन-मरण का भयानक संग्राम बन जाता है। ऐसी दशा में क्रांतिवादियों के सामने अपना आंदोलन बंद करने के लिए विशेष कारण हाने चाहिए। परंतु आपने ऐसी कोई निश्चित विचार प्रकट नहीं किया। निरी भाव पूर्ण अपीलों का क्रांतिकारी युद्ध में कोई विशेष महत्व नहीं होता, हो भी नहीं सकता।

असेम्बली बम कांड के बाद हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ के अधिकाशं साथी गिरफ्तार कर लिए गए। उन्होंने अपने मुकदमें की सुनवाइ्र के दौरान अपने दृष्टिकोण को प्रचारित करने, समाजवाद के विचारों को लोकप्रिय बनाने और क्रांतिकारी पार्टी के उद्देश्यों तथा प्रयोजनों को जनता के सामने रखने के लिए अदालत का मंच के रूप में जमकर इस्तेमाल किया।

भगत सिंह ने 19 अक्टूबर 1929 को पंजाब स्टूडेंट्स की कांग्रेस के नाम एक संदेश भेजा था जिसमें उन्होंने कहा था-‘आज हम नौजवानों की बम ओर पिस्तौल अपनाने के लिए नहीं कह सकते। इन्हें औद्योगिक क्षेत्रों की गंदी बस्तियों में और गांवों में टूटे-फूटे झोपड़ी में रहने वाले करोड़ो लोगों को जानना है।’

2 फरवरी 1931 को उन्होंने ‘युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम’ एक अपील लिखी थी। उन्होंने कहा था-‘गांवों और कारखानों में किसान और मजदूर ही असली क्रांतिकारी सैनिक है।’ उनका कहना था-‘मैं तो ऐसा क्रांतिकारी हूं जिसके पास एक लंबा कार्यक्रम और उसके बारे में सुनिश्चित विचार होते है।’ मैं पूरी ताकत के साथ बताना चाहता हूं कि मैं आतंकवादी नहीं हूं ओर कभी था भी नही, कदाचित उन कुछ दिनों को छोडक़र जब मैं अपने क्रांतिकारी जीवन की शुरूआत कर रहा था।

उन्होंने नौजवान राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सलाह दी कि वे माक्र्स और लेनिन का अध्ययन करे, उनकी शिक्षा को अपना मार्गदर्शक बनाएं, जनता के बीच जाएं, मजदूरों, किसानों और शिक्षित मध्यमवर्गीय नौजवानों के बीच काम करें, उन्हें राजनीतिक दृष्टि में शिक्षित करें, उनमें वर्ग चेतना उत्पन्न करें, उन्हें यूनियनों में संगठित करें आदि।

उन्होंने कहा कि सारा काम तब तक संभव नहीं है जब तक जनता की एक अपनी पार्टी न हो। वे किस तरह की पार्टी चाहते थे। इसका खुलासा करते हुए उद्धृत करते है-‘हमें पेशेवर क्रांतिकारियों की जरूरत है। जिनकी क्रांति के सिवाय और कोई आकांक्ष न हो, और न जीवन का कोई दूसरा लक्ष्य हो। ऐसे कार्यकर्ता जितनी बड़ी संख्या में एक पार्टी के रूप में संगठित होंगे, उतनी ही सफललाएं बढ़ जाएंगी।’ पार्टी ऐसे कार्यकर्ताओं का एक समूह होगा।

ऐसे कार्यकर्ता जिनके दिमाग साफ हो और समस्याओं की तीखी पकड़ हो और पहल करने और तुरंत फैसले लेने की क्षमता हो। इस पार्टी का अनुशासन बहुत कठोर होगा। पार्टी को अपने काम की शुरूआत अवाम के बीच प्रचार से करनी चाहिए। जिससे किसानों और मजदूरों की सहानुभूति प्राप्त की जा सके। ऐसे पार्टी को कम्युनिस्ट पार्टी कहा था। यहां भगत सिंह खुल्लम-खुल्ला माक्र्सवाद, साम्यवाद और एक साम्यवादी पार्टी की वकालत करते दिखते हैं।

क्रांति को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा था कि ‘क्रांति के लिए खूनी संघर्ष अनिवार्य नहीं है और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रति हिंसा का कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है। क्रांति से हमारा अभिप्राय यह है कि वर्तमान व्यवस्था, जो खुले तौर पर अन्याय पर टिकी हुई है वह बदलनी चाहिए।’ 1924 से 1928 के बीच उन्होंने विभिन्न विषयों का विस्तृत अध्ययन किया था। लाला लाजपतराय की द्वारकादास लाईब्रेरी के पुस्तकाध्यक्ष राजाराम शास्त्री के अनुसार उन दिनों भगत सिंह वस्तुत: ‘किताबों को निगला करता था।’

उनके प्रिय विषय थे रूसी क्रांति, सोवियत संघ, आयरलैंड, फ्रांस और भारत का क्रांतिकारी आंदोलन, अराजकतावाद और मार्क्सवाद। उन्होंने और उनके साथियों ने 1928 के अंत तक समाजवाद को अपने आंदोलन का अंतिम लक्ष्य घोषित कर दिया था और अपनी पार्टी का नाम कम्युनिस्ट पार्टी कर दिया था। उनकी यह वैचारिक प्रगति उनके फांसी पर चढऩे के दिनों तक जारी रही।

ईश्वर और धम्र के बारे में वे कहते है-‘आंधी और तूफान में अपने पांवों पर खड़े रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है।’ लेकिन वे सहारे के लिए किसी भी बनावटी अंग के विचार को दृढ़तापूर्वक अस्वीकार करते थे। वे कहते थे, ‘अपनी नियति का सामना करने के लिए मुझे किसी नशे की जरूरत नहीं है।’

जो आदमी अपने पांवों पर खड़े होने की कोशिश करता हैं और यथार्थवादी हो जाता है, उसे धार्मिक परिस्थितियों में यदि उसे डाल दिया है, तो उनका एक मर्द की तरह बहादुरी के साथ सामना करना होगा। 1926 में वे कहते है-‘अब तक मुझे इस बात पर यकीन हो गया था कि सृष्टि का निर्माण व्यवस्थापन और नियंत्रण करने वाली किसी सर्वशक्तिमान परम सत्ता के अस्तित्व का सिद्धांत एकदम निराधार है।’

जुलाई 1930 को भगत सिंह लाहौर सेंट्रल जेल में बोस्र्टल जेल से अपने साथियों से बचाव के मुद्दे पर चर्चा करते हुए धीमे स्वर में कहते हैं। (वे कभी चिल्लाकर नहीं बोलते थे।) वे कहते है-‘देशभक्ति के लिए यह सर्वोच्च पुरस्कार है (फांसी) और मुझे गर्व है, कि मैं यह पुरस्कार पाने जा रहा हूं।

वे सोचते हैं कि मेरे पार्थिव शरीर को नष्ट करके वे इस देश में सुरक्षित रह जाएंगे। यह उनकी भूल है। वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते। वे मेरे शरीर को कुचल सकते है, लेकिन मेरी भावनाओं को नहीं कुचल सकेंगे। ब्रिटिश हुकूमत के सिर पर मेरे विचार उस समय तक एक अभिशाप की तरह मंडराते रहेंगे जब तक वे यहां से भागने के लिए मजबूर न हो जाएं।’

आतंक के संबंध में वे कहते है-इटली पर आस्ट्रिया सिर्फ तलवार के जोर से राज करता था, इसलिए इटली को जबरदस्ती अधीन रखने का उसका काम आतंक था, घृणित था और खत्म करने योग्य था। लेकिन जब गैरीबाल्डी और मैजिनो ने इसके खिलाफ तरलवार उठाई और उस जालिम बादशाहत को उलटा दिया तब उनका यह काम घृणा लायक नहीं, बल्कि पूज्यनीय माना गया।

1924 के कोहाट के दंगे पर वे साम्प्रदायिक दंगे के इलाज में कहते हैं-‘दंगों का इलाज आर्थिक दशा में सुधार है लेकिन वर्ममान स्थिति में आर्थिक सुधार कठिन है, क्योंकि सरकार विदेशी है। लोगों को परस्पर लडऩे से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है। गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति है, इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों को चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हो अधिकार एक ही है। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल, राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ लेने का यत्न करो।’

अछूतों के समस्या पर वे कहते हैं, कि ‘सबसे पहले यह निर्णय कर लेना चाहिए कि सब इंसान समान है तथा न तो जन्म से कोई भिन्न पैदा हुआ और न कार्य विभाजन से अर्थात क्योंकि एक आदमी गरीब मेहतर के घर पैदा हो गया है, इसलिए जीवन भर मैला साफ करेगा और दुनिया में किसी तरह के विकास के काम पाने का उसे कोई हक नहीं है। ये बातें फिजूल है। उन्होंने संगठित होकर पूंजीवादी नौकरशाही से लडऩे की बात कही। अंत में सामाजिक आंदोलन के जरिए राजनैतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लेने का आह्वान किया था।’

षढय़ंत्र क्यों होते हैं और उसे रोका कैसे जाए इस पर वे कहते है कि-‘जहां भी गुलामी और गरीबी मौजूद है वहां कुछ जोशीले लोग उठते ही रहेंगे और गुलामी और गरीबी के जुएं को उतार फेंकने के यत्न करते रहेंगे, चाहे वे सफल हो या नहीं। हम समझते हैं कि इतिहास हमें यही बताता है कि इन षडय़ंत्रों को रोकने और हमेशा के लिए खत्म करने का एक ही तरीरका है कि दुनिया से गरीबी और गुलामी दूर की जाए और प्रत्येक देशों में आजादी के साथ के रोटी के सवाल का भी पूरा समाधान हो। जब तक यह नहीं होता, षडय़ंत्रों का बंद होना मुश्किल है।’ 17 नवंबर 1928 को लाला लाजपतराय को साइमन कमीशन के विरोध के कारण पुलिस ने उन पर लाठियां बरसाई थी। जिससे उनकी मृत्यु हो गई थी। इसके जवाब में 17 दिसंबर को सांडर्स की हत्या हो गई।

हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ ने अपनी 18 दिसंबर 1928 के नोटिस में साफ लिखा है। ‘हमें एक आदमी की हत्या करने का खेद है। परंतु यह आदमी उस निर्दयी, नीच और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का अंग था जिसे समाप्त कर देना आवश्यक है।’

अपने 2 फरवरी 1931 के लंबे लेख में उन्होंने फिर कहा है कि ‘हमें कांग्रेस से आंदोलन की संभावनाओं, पराजयों व उपलब्धियों संबंधी किसी किस्म का भ्रम नहीं होना चाहिए। यह आज के इस आंदोलन को गांधीवाद कहना ठीक है। इसका तरीका अनूठा है, लेकिन इसके विचार बेचारे लोगों के किसी काम के नहीं है।’ भगत सिंह आज भी प्रासंगिक है।

1991 के बाद देश गुलामी के कगार पर अग्रसर है। भारत एक बार फिर निजीकरण, उदारीकरण  और भूमंडलीकरण के जंजीरों में जकड़ गया है। एक बार फिर विद्रोह की भावना पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लेगा। भगत सिंह ने ठीक ही तो कहा था-‘मुझे फांसी हो जाने के बाद मेरे क्रांतिकारी विचारों की सुगंध इस मनोहर देश के वातावरण में व्याप्त हो जाएगी। वह नौजवानों को मदहोश करेगी ओर वे आजादी और क्रांति के लिए पागल हो उठेंगे।’

23 मार्च 1931 को शाम 7 बजे उन्हें राजगुरू और सुखदेव के साथ फांसी देकर उनकी लाशों के टुकड़े-टुकड़ कर दिए गए। फिर फिरोजपुर, सतलुज के किनारे उन्हें जलाने की कोशिश की गई। फांसी से पूर्व अंतिम क्षणों में वे युगपुरूष ब्लादीमिर इल्यिच लेनिन की जीवनी का अध्ययन कर रहे थे। जैसे ही उन्हें फांसी के लिए तैयार होने कहा गया वे झट कह उठे कि एक क्रांतिकारी को दूसरे क्रांतिकारी से मिलने दो। ‘यह उनकी अंतिम इच्छा थी। वे लेनिन की जीवनी को अधूरा छोढ़ गए।’ हमें उनकी मुड़ी हुई जीवनी से आगे बढऩे की जरूरत है।
 


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