औरंगजेब के जीवन और युग का वास्तविक साक्ष्य
जदुनाथ सरकार ने मध्य-काल के इतिहास पर किया गहन अनुसंधान
आलोक श्रीवास्तवऔरंगज़ेब की कहानी से भारत का आधुनिक इतिहास सीधे जुड़ता है. उसके पूर्ववर्ती मुगल बादशाह बाबर, हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाह,जहां इतिहास में अपनी-अपनी भूमिकाएं निभाकर अतीत की एक ऐसी कहानी बन गए, जिसमें मध्य-युग का वैभव, युद्ध, रोमांच, हिंसा-प्रतिहिंसा के विवरण थे. पर कुल मिलाकर यह कहानी सुदूर अतीत की थी. परंतु औरंगज़ेब की कहानी हिंदुस्तान के इतिहास के ठीक उस मोड़ पर खड़ी है, जहां से यह विशाल उपमहाद्वीप आधुनिक युग में दाखिल हो रहा था.

बेशक वैश्विक काल के अनुसार आधुनिक युग में भले ही वह अपने आप को मध्य-काल में समेटे रहने के जतन में ही लगा रहा हो. यह आधुनिक युग भारतीय उपमहाद्वीप में किसी पुनर्जागरण, औद्योगिक क्रांति, ज्ञानोदय-प्रबोधन आदि के जरिए नहीं आया. यह आया साम्राज्यवाद के बेड़ों पर सवार होकर, उसी के अनुसार उसका स्वरूप बना. भारत में आधुनिक युग के आगमन का अर्थ था औपनिवेशिक शोषण, मानसिक-दासता, बौद्धिक पराभव, आर्थिक अवनति आदि.
वहीं इसका दूसरा अर्थ था- रेलें, बिजली, शहरीकरण, अदालतें, प्रशासनिक ढांचा आदि. ये वे बातें थीं, जो औपनिवेशिक दोहन के लिए अनिवार्य इंफ्रास्ट्रक्चर बनाती थीं. इस ढांचे में से ही बहुत बाद में उस भारतीय आधुनिकता की किरनें फूटी, जो आज भी इस भूमि पर दिन का प्रकाशमय वैभव नहीं बन सकी है. खैर यह एक लंबा और वृहद प्रसंग है. औरंगजेब का आधी सदी लंबा शासन-काल मध्य-काल का वह अंतिम दौर भी था, जिसमें आने वाले समय के बीज छिपे हुए थे. वे बीज समूचे उपमहाद्वीप के लिए विषाक्त पैदावर के बीज थे.
औरंगजेब एक दुर्दांत योद्धा था. यही उसका सर्वोत्तम गुण था और यही उसकी अंतिम सीमा भी. वह इससे कम कुछ भी नहीं था और ज़्यादा भी कुछ नहीं. पर यह मध्य काल की विसंगति थी कि योद्धा ही विजेता होगा और विजेता ही शासक भले उसमें एक शासक हो सकने के योग्य गुण हों या न हों. अगर एक कल्पना करें तो स्थिति बहुत ज्यादा स्पष्ट हो आएगी.
कल्पना यह कि यदि हिंदुस्तान के तख्त का फैसला भाइयों की प्रतिस्पर्धा और जंग से न होता, सहयोग और मैत्री का कोई रास्ता भी यदि होता तो हिंदुस्तान का बादशाह द्वारा शुकोह और उसका सर्वोच्च सेनापति औरंगजेब उस राष्ट्र की रचना का मार्ग प्रशस्त कर देते, जिसकी सीमाएं अभेद्य होतीं और जिसका शासन-प्रशासन भारतीय आधुनिकता का वह रूप रचता जो उपनिवेश की जरूरतों पर नहीं, भारतीय जन-जीवन के गुणात्मक और तीव्र आर्थिक-सांस्कृतिक विकास पर टिका होता
इतिहासकार तुरंत कहेंगे कि इतिहास में होता, न होता की कोई जगह नहीं होती. तो इसी स्थल पर यह दृढ़तापूर्वक कहना होगा कि बेशक घटित को बदलने में ऐसी परिकल्पनाएं निरर्थक होती हैं, पर घटित के कारणों को समझने और उसका ठीक सार-संकलन करने के लिए नितांत उपयोगी और आवश्यक भी. हां, ऐसी संभाव्यताओं की कल्पना किसी हवाई उड़ाम पर नहीं यथार्थ के आधार पर ही होनी चाहिए. भारत की जीवनधारा ही जिस युग में बदल गई, सदियों तक के लिए उसका भविष्य ही धूसर हो गया.
इस हद तक कि स्वतंत्रता के बाद भी वह उन बेड़ियों को तोड़ना तो दूर, वह अपने लिए नई बेड़ियों को गढ़ने में मशगूल है. ये वे बेड़ियां हैं, जिनका एक सिरा विश्व साम्राज्यवाद के आर्थिक तंत्र से जुड़ा है तो दूसरा सिरा इसकी चाकरी करने वाली हिंदुत्व की हार्डकोर भाजपाई राजनीति, हिंदुत्व की विफल हो चुकी साफ्ट कांग्रेसी राजनीति और जड़ पकड़ने से पहले ही निर्मूल हो गई भ्रमित इतिहास-दृष्टि और कर्महीन वामपंथी राजनीति से.
औरंगजेब भारत की उस इतिहास-धारा का प्रतिकूल प्रवाह था, जो उसके पहले की ढाई सदियों में मुगल साम्राज्य के दौरान सही मार्ग पर आ सकी थी. गुप्त-काल के बाद भारत की सीमाएं विदेशी हमलावरों के लिए खुल गई थीं, 1526 में बाबर की दिल्ली विजय के पहले की लगभग छह-सात सदियां अराजकता, लूट-पाट, विध्वंस की सदियां थीं. बाबर के पहले के इस्लामी धर्मावलंबी शासकों में एकाध को छोड़कर योग्य शासक नहीं हुए.
उन शासकों का दृष्टिकोण संकीर्ण, असहिष्णु और उत्पीड़क था. मुगल शासक बेशक मुसलमान थे. इस्लाम के नाम पर अनाचार भी इस काल में हुए, परंतु मोटे तौर पर राज्य-सत्ता का स्वरूप धर्मनिरपेक्ष था. इसी काल में एक ओर भारतीय उपमहाद्वीप का भूगोल सुनिश्चित हुआ. सीमाएं रक्षित हुईं. वहीं दूसरी ओर कृषि, सिंचाई, लगान आदि का समुचित एक तंत्र भी बना. भारत आर्थिक प्रगति की राह में बढ़ा.
इतिहास जब भी जिस भी दिशा में बढ़ता है, उसके उस प्रवाह के समांतर कई अन्य संभावनाएं अवश्य रहती हैं. अनेक संभावनाओं में से किसी एक ओर इतिहास की गति होने का अर्थ यह नहीं है कि वही संभावना किन्हीं अदृश्य शक्तियों द्वारा सुनिश्चित कर दी गई थी. इसका कारण कुछ अन्य बहुत मामूली और निष्प्रभावी लगने वाली बातों में भी छिपा होता है, जिनके होने न होने के पीछे कोई तर्क नहीं दिया जा सकता. चीज़ों के अपने ही उलझाव और सुलझाव होते हैं.
आज हम जिस भारत में रहते हैं, उसका इतिहास बाबर की विजय के बाद जिस रास्ते होते हुए वर्तमान तक पहुंचा है, वहां हमारे लिए यह सोचना बहुत निरर्थक हो सकता है, पर किसी समय यह इतिहास की एक प्रबल संभावना थी कि रूस के साम्राज्यवादी ज़ार की सेनाएं मध्य-एशिया को पार करती हिंदुस्तान में दाखिल होतीं.
यदि रूसी-इतिहास, मध्य-एशियाई इतिहास और भारत की तत्कालीन स्थिति के समांतर उस युग के दस्तावेज़ और अन्य विवरणों को ध्यान में रखा जाए तो मुगल साम्राज्य का हिंदुस्तान की धरती को सबसे बड़ा योगदान उसे अंग्रेजों से भी पहले मध्य काल में ही महाउत्पीड़क जार का साम्राज्य बनने से रोक देना है. मुगल-सत्ता का यह वैशिष्ट्य था कि उसने पूर्ववर्ती इस्लामी शासकों के मुकाबले अपना तेज़ हिंदुस्तानीकरण किया और अपने आपको इस देश के हितों के अनुसार ढाल लिया.
हिंदुत्व की नवोदित राजनीति के चश्मे से किया गया इस काल का सारा आकलन उसी तरह सारहीन है, जिस प्रकार उस पर आधुनिक प्रगतिशील सत्ता होने का कुछ समूहों का आरोपण, वह एक मध्य-कालीन राज-सत्ता थी. इस्लाम सत्ताधारियों का धर्म था. इन दोनों के नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह के प्रभाव भी राजनीति और समाज पर थे, परंतु जैसा कि पहले कहा गया कि एक विशाल उपमहाद्वीप की राजसत्ता के रूप में यह उस युग में अधिकतम संभव धर्मनिरपेक्ष राजसत्ता भी थी और इसने हिंदुस्तान को मजबूत आर्थिक और सांस्कृतिक सूत्र में गूंथा था.
बाबर से लेकर शाहजहां तक योग्य, अत्यधिक योग्य और औसत योग्य शासकों ने जिस साम्राज्य को बनाया था, उसमें एक व्यवस्था थी, उसकी एक अग्रगति भी थी. इस अवधि की सकारात्मक प्रक्रियाओं को अब एक उछाल की आवश्यकता थी. यह आवश्यकता इसलिए थी कि विश्व इतिहास के रंगमंच पर नई शक्तियां आकार ले चुकी थीं.
ये शक्तियां सिर्फ सैन्य-विजय और राज्य-साम्राज्य के आधार पर नहीं खड़ी थीं. इनके पीछे विज्ञान और उत्पादन के मेल, ज्ञान और आधुनिकता के संश्लेषण की महाशक्त्ति थी. इतिहास के इस मोड़ पर भारत को एक उदार, दृष्टि-संपन्न, सहिष्णु, सर्वसमावेशी शासक की आवश्यकता थी जो कि बेशक दारा शुकोह था. परंतु यहीं से इतिहास पलट गया. वह अप्रत्याशित घटनाओं का अवलंब लेते हुए औरंगजेब की ओर मुड़ा.
तत्कालीन और परवर्ती दोनों तरह के इतिहासकारों की यह एक प्रवृत्ति-सी बन गई कि औरंगजेब के मुगल गद्दी पा लेने को इतिहास के एक स्वाभाविक परिणाम के रूप में वर्णित किया जाए. इस प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला औरंगजेब के योद्धा व्यक्तित्व के प्रबल होने और दारा शुकोह के दर्शन और चिंतन के क्षेत्र में झुकाव से. इसी आधार पर अतिवादी निष्कर्ष निकाले गए. दारा के समर्थकों तक ने इतिहास की इस परिणति को इसी रूप में स्वीकार किया, जबकि इतिहास के सारे तथ्य ऐसे सरलीकृत निष्कर्षों के विरुद्ध जाते हैं.
बाद में औरंगजेब की सैन्य-विफलताओं ने ही हिंदुस्तान को आर्थिक रूप से जर्जर कर दिया. मुगल साम्राज्य औरंगजेब के अवसान के बाद नहीं अस्त हुआ. वह उसके काल में ही भीतर से टूट चुका था, उसके परिदृश्य से हटते ही वह टूटन धराशायी भर हुई. औरंगजेब की जीवन-कहानी उसकी सैन्य-विफलताओं की कहानी है-यदि इसका आकलन समस्त युद्धों और उनके परिणामों तथा उन पर लगे समय और संसाधनों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में किया जाए.
लोग यह बात भी भूल जाते हैं कि दारा शुकोह औरंगजेब से यूं ही नहीं हार गया था. सामूगढ़ में औरंगजेब की पराजय आसन्न थी. दारा शुकोह लड़ कर हारा था. विजय के बिल्कुल करीब पहुंचकर हारा था. उसके विरुद्ध सिर्फ औरंगजेब नहीं था. उसके तीन भाई और राजसत्ता से जुड़े समस्त कट्टरपंथी इस्लामी तत्व उसके ख़िलाफ थे और ऐन मौके पर जयपुर के राजा जयसिंह और जोधपुर के राजा जसवंत सिंह ने भीषण विश्वासघात किया था.
अतः दारा की पराजय को दारा की अव्यावहारिकता, सैन्य अकुशलता आदि के खांचे में डाल कर यह नियतिवादी निष्कर्ष निकाल लेना कि औरंगजेब ही स्वाभाविक विजेता और मुगल-सत्ता का स्वाभाविक उत्तराधिकारी था, भ्रामक और इतिहास-विरुद्ध है. सामूगढ़ के युद्ध का सिर्फ यह एक विवरण ही स्थिति स्पष्ट करने के लिए काफी है-
औरंगजेब ने दक्षिण की ओर से पहले इस मोरचे पर हमला बोला. 12 मार्च, 1659 को सूर्यास्त से लेकर 13 मार्च की रात तक इस मोरचे पर तोपों की अविरत मार की जाती रही. ऊंची और सुरक्षित जगह पर होने के कारण दारा के तोपचियों ने औरंगजेब के असुरक्षित तोपखाने और पैदल सैनिकों पर 'न भूतो न भविष्यति' हमला किया. औरंगजेब की सेना में मृत्यु का तांडव शुरू हो गया.
वहीं दारा के इस हमले का औरंगज़ेब कोई प्रभावशाली जवाब नहीं दे पा रहा था. वहां खुदवाई गई खंदकों के कारण उसके शत्रुओं को कोई नुक़सान नहीं पहुंच रहा था.
इतिहास को सिर्फ सफलता का चारण नहीं होना चाहिए. उसे असफल लोगों और उनकी असफलता का भी वस्तुनिष्ठ और समुचित विश्लेषण करना चाहिए. दारा और औरंगजेब में जो अंतर था, वह सैन्य रणनीति और कौशल का अंतर नहीं था. वह अंतर धूर्तता और मूल्यहीनता का अंतर था. औरंगजेब ने मुराद और शुजा को तख्त का लालच देकर उन्हें पहले अपने पक्ष में किया फिर क्रूरता से उन्हें हटा दिया.
औरंगजेब की सफलता को आज इस दृष्टि से देखे जाने की जरूरत है कि इतिहास के जिस मोड़ पर हिंदुस्तान को जिस तरह के शासक और जिस तरह की राजसत्ता की आवश्यकता थी, वह उसके बिल्कुल माकूल नहीं था. उसने अपना दीर्घ उत्तर जीवन दक्षिण के पठारों में सदियों से संचित मुगल-सत्ता के आर्थिक संसाधनों को ऐसे युद्धों में नष्ट करते हुए बिताया, जिसका परिणाम था, समस्त उत्तर भारत का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक रूप से विशृंखल होते जाना.
औरंगजेब को हिंदुत्ववादी राजनीति की तर्ज पर खल-चरित्र के रूप में चित्रित करना भी इतिहास-विरुद्ध है. उसमें ढेरों निजी गुण थे. वह बहुत से मामलों में मध्य युग के शासकों से बहुत सक्षम और योग्य भी था, बस बात इतनी थी कि हिंदुस्तान के इतिहास का वह युग जिन गुणों की दरकार कर रहा था, ये गुण उसके काम के नहीं थे. मध्य-युग के मुहाने पर अधिकतम संभव आधुनिक दृष्टिकोण वाले शासक की जगह मध्य-युगीन गुणों वाले शासक के हाथों में भारत आधी सदी के लिए बंध कर रह गया. इसी चोर-दरवाजे से भारत में विघटन, विखंडन और गुलामी दाखिल हुए.
उपनिवेशवाद क्या था? उसने भारत की अर्थ-व्यवस्था, समाज, संस्कृति और मनोबल के साथ क्या किया? इसकी समुचित समझ और इन मसलों के प्रति सरोकार न होने की वजह से हिंदुत्व की राजनीति उपनिवेशवाद को मात्र राजनीतिक गुलामी में अपघटित करके देखती है एक ऐसी राजनीतिक गुलामी के रूप में जिसने उससे कहीं ज्यादा अस्वीकार्य इस्लामी गुलामी के हजार वर्षों से उसे मुक्ति दी, इसी कारण औरंगजेब की उसकी आलोचना गलत जमीन पर खड़ी है.
औरंगजेब कहीं अधिक गंभीर आलोचना का पात्र है- बजाय सतही हिंदू-विरोधी शासक के रूप में अवमानित किए जाने के. औरंगजेब की आलोचना का मुख्य विषय जो तत्कालीन हिंदुस्तान की बर्बादी का कारण बना, वह मुल्क के आर्थिक ढांचे पर अपनी सैन्य-महत्वाकांक्षाओं का बोझ डालना था. उस ढांचे को फिर से खड़ा कर पाना आसान न था. उसके लिए आधी सदी का समय और दृढ़-संकल्पी और दृष्टिवान सत्ता की आवश्यकता थी.
उसके वंशजों के लिए इससे ज्यादा आसान था अब भी राजकोष की अकूत संपदा के आधार पर विलास की जिंदगी बिताना और शराबनोशी करते हुए खुद इतिहास की क़ब्रगाह में जाते हुए मुगल साम्राज्य और हिंदुस्तान दोनों को ढाई सदियों की लूट, अकाल, बर्बादी के ऐसे महाविध्वंस के हवाले कर देना, जिसके आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, मनोगत और सभ्यतागत दुष्परिणामों से यह पूरा उपमहाद्वीप आज तक मुक्त नहीं हुआ है.
और आने वाली एक सदी तक उसका मुक्त होना संभव भी नहीं है खासकर उस स्थिति में जबकि समूचे उपमहाद्वीप की सत्ताएं और उनके आधार व शक्तिस्रोत वर्ग, विश्व-साम्राज्यवाद से नाभिनालबद्ध होकर प्रतिक्रियावाद की धार्मिक हिंदू राष्ट्र और इस्लामी राष्ट्र की राजनीति की विध्वंस-लीला में पूरे आत्मविश्वास और नृशंसता से संलग्न हों.
औरंगजेब की राजनीतिक तंगजहनी इस देश को बहुत भारी पड़ी न कि उसका कल्पित हिंदू-विरोध
भारत एक बहुत बड़ा देश है. इस विशालता ने केंद्रीय-शासन के लिए जो चुनौतियां पैदा कीं, बहुत पहले अशोक ने उन्हें समझ लिया था और सोलहवीं सदी में अकबर ने भी. इतने बड़े देश पर केंद्रीय-शासन के लिए मध्य-युग में युद्ध और सैन्य-विजयें तो अनिवार्य थीं, पर उसके अलावा संधि, मैत्री, सीमित अधिकार आदि बहुत से स्तरों पर काम करना आवश्यक था. औरंगजेब की तंगजहनी और सैन्य आत्मविश्वास ने अन्य प्रक्रियाओं के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी थी.
उसका समूचा जीवन-इतिहास अंध-हिंदू विरोधी शासक का इतिहास नहीं है. उसने मंदिर तोड़े. हिंदू शासकों और हिंदू प्रजा पर अत्याचार भी किए. परंतु यह सब उसकी राजनीतिक सुविधा-असुविधा और जरूरतों से तय होता था भले ही इस पर वह या उसके दौर के इस्लामी कट्टरपंथी इस्लाम का मुलम्मा भी चढ़ा देते रहे हों.
यदि आज 21 वीं सदी में औरंगजेब की जिंदगी के पुनर्पाठ की आवश्यकता है तो इसीलिए है कि उसे और उसके युग को ठीक से समझे बिना भारत के वर्तमान की गांठें सुलझ नहीं पाएंगी. औरंगजेब की कट्टरता और हिंदू-विरोध के मिथक के समांतर मुस्लिम विरोध और हिंदू कट्टरता का आहवान उन दुष्परिणामों को ही और गहरा करेगा, जो औरंगजेब की तंगज़हनी के कारण सत्रहवीं सदी में पैदा हुई थीं और जो इस उपमहाद्वीप के इतिहास का दुखता घाव आज तक बनी हुई हैं.
इस घाव से निजात औरंगजेब को उसके संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में समझने और उसकी मिथक छवि से मुक्ति पाने से ही मिल सकेगी. इस घाव से निजात के लिए औरंगजेब के अटिल मनो-विज्ञान और अत्यंत जटिल बहुस्तरीय जीवन को समझने और उसकी संरचना के प्रतिरूपों को अपने भी जहन में जांचना जरूरी है. और हमें औरंगजेब को क्षमा भी करना पड़ेगा कि इतिहास ने उसे इस उपमहाद्वीप के महान निर्माता होने का दायित्व सौंपा था -- अकबर से भी महान -- क्योंकि निश्चित रूप से वह हुमायूं, जहांगीर, शाहजहां से ज्यादा क्राबिल, संकल्पी, कर्मठ, इच्छाशक्ति-संपन्न शासक था.
उसकी ऊर्जा और स्वास्थ्य का स्तर अपने इन सारे पूर्वजों से उम्दा था. आधी सदी की चुनौतीहीन सत्ता उसे मिली - यह बात अलग है कि उसने अपने लिए अनावश्यक चुनौतियां पैदा कर लीं और उनसे उलझा रहा, जबकि युग एक अलग ही परिवर्तन की दहलीज पर खड़ा था.
यहां यह भी कह देना आवश्यक है कि भारत का पढ़ा-लिखा वृहत्तर जनसमुदाय यदि राजनीतिक रूप से तनिक भी सजग होता है तो वह इतिहास के बारे में मनोगत धारणाएं बनाना आरंभ कर देता है. यही धारणाएं राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी होकर जनमत निर्माण करती हैं. यह वर्ग एक ओर तो औरंगजेब को भारत के विघटन का दोषी मानता है, इस कारण से कि उसने हिंदू राजाओं के साथ दुर्व्यवहार किया, जबकि इतिहास का सत्य यह है कि उसके अधिकांश युद्ध मुस्लिम सत्ताधारियों के ख़िलाफ थे.
यही वर्ग दूसरी ओर इस बात से भी सुकून महसूस करता है कि औरंगजेब की नीतियों ने अगर भारत को जर्जर न किया होता तो भारत में केंद्रीय मुगल-सता कभी विघटित न होती, ब्रिटिश-साम्राज्य भारत पर काबिज़ न हो पाता और भारत आज भी मुगलों का गुलाम होता.
यह इतिहास का गलत पाठ है. इस पूरी स्थिति को दुनिया भर में आकार ले रही शक्तियों के संदर्भ में ही सही ढंग से समझा जा सकता है. पहले तो इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि बाबर से लेकर बहादुर शाह ज़फ़र तक भारत की केंद्रीय सत्ता का स्वरूप अधिकतम धर्मनिरेपक्ष था जितना कि मध्य-युग में संभव है. ऐसा इसलिए नहीं था कि मुगल शासक धर्मनिरपेक्षता की किसी विचार-प्रणाली से प्रेरित थे.
ऐसा इसलिए था कि हिंदुस्तान जैसे बहुधर्मी, बहुसांस्कृतिक विशाल देश पर शासन हेतु किसी भी केंद्रीय सत्ता के लिए धर्मनिरपेक्ष होना ही एकमात्र शर्त थी. यह बात जितनी सत्य मध्य-युग के लिए थी, उसके शताधिक गुना सच वर्तमान के लिए है, और सहस्र गुना सत्य उस भविष्य के लिए होगी, जिसके लिए हिंदू राष्ट्र की स्वैर कल्पनाओं ने आज राजनीतिक बल के रूप में स्वयं को गठित कर लिया है.
यहीं पर हमें एक और कल्पना करनी पड़ेगी
1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद लगातार अराजकता, लूट-पाट, अव्यवस्था, कृषि, उद्योग आदि का विध्वंस हो गया. पूरा उपमहाद्वीप असंख्य स्थानीय युद्धों की ऐसी रणभूमि बन गया जिसमें फ्रांस, आयरलैंड, ब्रिटेन और यूरोप से गरीब-फटेहाल युवक समंदरों की दूरी पारकर मराठों, मुगलों, रुहेलों आदि की सेनाओं में रोजी-रोटी कमाने आने लगे - व्यापार के लिए आए अंग्रेजों और उनकी सेनाओं-कर्मचारियों के अलावा.
इन युद्धों ने भारत को राजनीतिक रूप से सैकड़ों टुकड़ों में बांट दिया. औरंगजेब के काल में ध्वस्त हुई अर्थ-व्यवस्था को तबाही के अंतिम बिंदु पर ला दिया. उसके बाद ब्रिटिश साम्राज्य और उसकी विधिवत व्यापक लूट और संसाधनों के दोहन का दुखद इतिहास है.
कल्पना हमें यह करनी पड़ेगी कि इन ढाई सौ सालों में भारत की जो पूंजी और प्राकृतिक संसाधन अवशोषित हुए उनका निवेश और पुनर्निवेश यदि भारत में ही होता तो भारत में यूरोप से भी बड़ी औद्योगिक क्रांति होकर रहती. पर इसकी लिए जिसे स्थायित्व, शांति, राजनीतिक एकता व सुशासन की आवश्यकता थी, वह औरंगजेब के काल में ही नष्ट हो चुका था.
यह उदाहरण देने का मंतव्य यह था कि जैसे ही आप इतिहास के भौतिक सत्यों की रोशनी में वस्तुनिष्ठ होते हैं तो आप धार्मिक आधार पर नायक-खलनायक बनाने से ऊपर उठते हैं और वास्तव में इस देश की धरती और जन के हित के राजनीतिक विचारों से समृद्ध होते हैं और उस राजनीति का आधार बनते हैं, जो वास्तव में राष्ट्र और समाज को निर्मित करने वाली धर्मनिरपेक्ष राजनति होती है भले उसे आप सेक्युलरिज्म के किसी अन्य बेहतर अनुवाद से रेखांकित कर लें.
औरंगजेब की जिंदगी का यह वृहत पाठ आज अत्यंत प्रासंगिक है इसीलिए कि उसके जीवन की ठीक समझ के लिए 'सवा मन जनेऊ उतरवाने और 'लाखों मंदिर तुड़वाने की किंवदंतियों और दंतकथाओं से परे उसके लंबे जीवन की वास्तविक घटनाओं के विवरण से गुजरना न केवल हमें इतिहास की बेहतर समझ देगा, बल्कि हिंदू. राष्ट्र के काल-विगत स्वप्नों के दिमागी जालों को झाड़ कर एक आधुनिक धर्मनिरपेक्ष, समावेशी भारत के निर्माण की प्रेरणा बनेगा.
जदुनाथ सरकार ने मध्य-काल के इतिहास पर गहन अनुसंधान किया. उस युग की सच्ची और प्रामाणिक तस्वीर रचने में वे सफल हुए. औरंगजेब के जीवन पर उन्होंने 5 वृहत खंडों में अंग्रेजी में महाग्रंथ का प्रणयन किया, ये पांचों खंड उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेजी आदि के सैकड़ों पत्रों व दस्तावेज़ों से भरे पुरे हैं.
जदुनाथ सरकार ने इन पांचों खंडों की सामग्री के आधार पर एक खंड में औरंगजेब की इस जीवनी का लेखन किया था. इस पुस्तक के किंचित संपादित हिंदी अनुवाद का भी आधी सदी से भी पहले प्रकाशन हुआ था. हमने यह आवश्यक समझा कि इस पुस्तक का आज की हिंदी में एक अधिक परिपूर्ण और असंक्षिप्त अनुवाद प्रस्तुत किया जाए. जदुनाथ सरकार की यह पुस्तक आज भी औरंगजेब और उसके युग को समग्रता में समझने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण और विश्वसनीय स्रोत है.
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