बहुजन नायक छत्रपति शिवाजी महाराज को किया उनके जयंती पर याद
16 साल की उम्र में तोरण किले पर अधिकार कर दिखाया
सुशान्त कुमारइतिहासकारों के अनुसार छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी, 1630 को हुआ था। उनके पिता का नाम शाहजी भोंसले था। उनके पिता बीजापुर में एक मराठा सेनापति थे। उनकी माता का नाम जीजाबाई था यह तो आपने जान लिया लेकिन कम उम्र में ही उन्होंने अपनी वीरता का परिचय साल 1646 में तोरण किले पर अधिकार करके दिखा दिया था।

राजनांदगांव के ऐतिहासिक बूढ़ासागर तालाब में स्थित बहुजन नायक वीर शिरोमणि पूज्य राजे छत्रपति शिवाजी महाराज के विशाल प्रतिमा के समक्ष 19 फरवरी उनके जन्मदिन पर नगर के वरिष्ठ समाजसेवी कन्हैयालाल खोब्रागढ़े एवं दक्षिण कोसल के संपादक सुशांत कुमार प्रतिमा पर पुष्प अर्पण करते हुए उन्हें विनम्र आदरांजलि दी।
उनके गौरवशाली महान इतिहास को याद करते हुए खोब्रागढ़े ने -‘छत्रियकुलवंतास छत्रपति शिवाजी - महाराज, मराठी लेखक -कृष्णा अर्जुन केलुसकर’ का हवाला देते हुए कहा कि भोंसले वंश में मालोजी एवं वीठोबाजी दोनों सगे भाई थे। मालोजी का विवाह निंबारकर परिवार की बेटी दीपाबाई से हुआ था। वीठोबाजी के आठ पुत्र थे।
लंबे समय तक मालोजी और दीपाबाई के संतान न होने पर दु:खी रहा करते थे। कुछ वरिष्ठजनों ने मालोजी भोंसले को सलाह दी कि वे उस समय के ख्यातनाम फकीर शाहजी शरीफ जी के चौखट पर हाजिरी देकर मन्नत मांगे तो उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति अवश्य होगी।
फकीर के नाम पर नामकरण
लोगों के सलाह का अनुसरण करते हुए मालोजी एवं दीपाबाई उस फक़ीर के पास जाकर दान पुण्य करने लगे। दीपाबाई ने फकीर से विनती कि यदि मुझे पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी तो मैं उसका नाम शाहजी रखूंगी। कालांतर में उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका मलोजी ने शाहजी नाम रखा। आगे चलकर एक और पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम उसी फकीर के नाम पर शरीफजी रखा इसलिए शाहजी और शरीफजी सगे भाई थे।
युवा होने पर शाहजी का विवाह जीजाबाई के साथ हुआ। प्रथम पुत्र का नाम संभाजी रखा गया। बालक ‘संभाजी’ की उम्र जब 7- 8 वर्ष की थी उस समय माता जीजाबाई को एक पुत्र की और प्राप्ति हुई जिसका नाम ‘शिवाजी’ रखा गया। शिवाजी ने अपने बाहुबल से आदिलशाही-कुतुबशाही-मुगलशाही का डट कर मुकाबला कर अनेक गढ़ किले जीते और विशाल साम्राज्य स्थापित किया।
इतिहासकारों का माने तो छत्रपति राजे को मुस्लिम विरोधी बताया यदि वे सिर्फ मुस्लिम विरोधी होते तो उनके सेनाओं के प्रमुख बहादुर मुसलमान नहीं होते। उनका तोपखाना, जलसेवा, घुड़सवार सेना ऐसे अनेक सैनिक रिसालों के उच्च पदों पर मुसलमान विराजमान थे।
मुसलमानों से जातिभेद नहीं किया
बीजापुर की निजामशाही से नाराज हुए लगभग 500 पठान सैनिकों को उन्होंने अपनी सेना में सम्मानपूर्वक जगह दी। औरंगजेब के आगरा कैद खाने से भागते समय भी नेहतर मदारी जैसे वीर सूरमाओं ने उन्हें साथ दिया।
वीरशिवाजी सुरक्षापूर्वक आगरा से निकल गए लेकिन मदारी मेहतर और सीवानाई को औरंगजेब के सिपाहियों ने पकड़ कर बड़ी क्रूरता के साथ हत्या कर दी। सिद्धि हिलाल जैसे मुसलमान शिवाजी के सेवा में विश्वासपात्र सूरमाओं में से थे। उनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती 19 फरवरी को मनाया जाता है। उनकी जन्म तारीख को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं लेकिन सारा देश इस महानायक के जन्मदिन की 19 फरवरी को मनाते आ रहे हैं।
वीरता और साहस के लिए वह सभी लोगों के लिए आदर्श हैं
छत्रपति शिवाजी महाराज की गिनती महान योद्धाओं में की जाती है। हर वर्ष पूरा राष्ट्र 19 फरवरी को छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती मनाते हैं। यह दिन भारत में मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरता और साहस को याद करने का है।
उनका जीवन हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके द्वारा किए गए कार्य और उनकी कुशल रणनीति और युद्ध कौशल की चर्चा आज भी होती है और यह हमारे लिए गर्व की बात है।
जन्म और शुरुआती जीवन
इतिहासकारों के अनुसार छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी, 1630 को हुआ था। उनके पिता का नाम शाहजी भोंसले था। उनके पिता बीजापुर में एक मराठा सेनापति थे। उनकी माता का नाम जीजाबाई था यह तो आपने जान लिया लेकिन कम उम्र में ही उन्होंने अपनी वीरता का परिचय साल 1646 में तोरण किले पर अधिकार करके दिखा दिया था।
इस समय वे एक किशोर थे और उनकी उम्र मात्र 16 वर्ष की थी। इतनी कम उम्र में भी वीरता का परिचय देकर जीत हासिल की। इस तरह वीरता और नेतृत्व के दम पर उन्होंने मराठा साम्राज्य की नींव रखी थी। इस दिन को हर वर्ष छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती के रूप में मनाया जाता है।
औरंगजेब को आजीवन यह मलाल रहा
मुगल शासक औरंगजेब ने वर्ष 1666 में अपने किले पर संधि करने के लिए शिवाजी को बुलाया पर वहां पर उन्हें कैद कर लिया गया। लेकिन अपनी बुद्धिमानी के दम पर शिवाजी महाराज वहां से निकलने में सफल रहे। साल 1674 में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक रायगढ़ के किले में पूरा हुआ था।
विवादों के बावजूद उन्हें छत्रपति की उपाधि भी मिली। उन्होंने मराठा साम्राज्य को आगे बढ़ाया। छत्रपति शिवाजी का जीवन हमारे इतिहास का बहुत ही गौरवशाली समय है। उनका जीवन हमें कई प्रकार से प्रेरणा देता है। उनकी मृत्यु वर्ष 1680 में हो गई थी।
दैनिक समाचार पत्र के सूचना के अनुसार आज यह कार्यक्रम मराठा कुनबी और मराठा तेली समाज द्वारा मनाया जा रहा है। जिसमें सभी नगरवासी सम्मिलित हो रहे हैं।
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