शिक्षिका सावित्री बाई फुले ने 18 स्कूल खोलें, 1852 महिला मंडल का किया गठन 

महिलाओं ने मनाई भदंत आनंद कौसल्यायन की जयंती

दक्षिण कोसल टीम

 

अतिथियों ने सर्वप्रथम सावित्री बाई, भदंत आनंद कौसल्यायन तथा शौर्य स्तम्भ व महापुरूषों के तैलचित्रों के समक्ष अगरबत्ती मोमबत्ती प्रज्वलित की, पुष्प अर्पित किए तथा अतिथियों का माल्यार्पण किया। अतिथियों को प्रशस्ति पत्र और पौधा सम्मान में दिया गया। 

महिला सशक्तिकरण संघ जिला राजनांदगांव द्वारा आयोजित कार्यक्रम को संबांधित करते हुए वरिष्ट सामाजिक कार्यकर्ता कन्हैयालाल खोब्रागढ़ ने कहा कि भदंत आनंद कौसल्यायन का जन्म अम्बाला में खत्री परिवार में हुआ। लाहौर से उन्होंने स्नातक की पढ़ाई की। वह शहीद भगत सिंह के सहपाठी थे। वह 21 वर्ष की उम्र में घर छोडक़र देशाटन में निकल गए थे।

उन्होंने सारनाथ में रहकर महाबोधि सभा का काम भे देखा। 1956 में नेपाल में आयोजित चतुर्थ बौद्ध सम्मेलन में सम्मिलित हुए। वहां उनकी मुलाकाल डॉ. भीमराव आम्बेडकर के साथ हुई। कौसल्यायन राहुल सांकृत्यायन की प्रेरणा से भदन्त आनंद बौद्ध धर्म की ओर आकृष्ट हुए थे। तथा श्रीलंका में पाली भाषा में त्रिपिटक का गहन अध्ययन किया।  

साथ ही 1 जनवरी 1818 भीमा कोरेगांव शार्य दिवस पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यहां 500 महार सैनिकों ने 25000 ब्राह्मण पेशवाओं की सेना को परास्त किया। इस महार अंग्रेजी सेना की क्षमता 834 थी, जिसमें लगभग 500 महार की पैदल सेना, 300 के आसपास घुड़सवार और 24 तोपें एवं 2-6 पाऊंडर तोपें थी। वहीं पेशवाओं की 28000 की संख्या में लगभग 20 हजार घुड़वार और 8 हजार पैदल सेना थी। जिसमें 2000 ने भाग लिया था। 

पूर्व शिक्षा अधिकारी जानकी रंगारी, नंदा मेश्राम, शिक्षिका लक्ष्मा गजभिए तथा भदंत धम्मपाल ने कहा कि उनका जन्म 3 जनवरी 1831 में नायगांव महाराष्ट्र में माता लक्ष्मी बाई पिता खन्दोजी नेवासे पाटिल के यहां हुआ था। वह बचपन से ही बहुत बहादुर थी। उनका 9 बर्ष की आयु में ज्योतिबा फुले से 1840 में विवाह हो गया।

उन्हें शिक्षा, संपत्ति आत्मसम्मान से वंचित किया था। स्त्रियों की दशा और भी खराब थीं, धार्मिक पाखण्ड,अंधविश्वास, रूढि़वाद, अस्पृश्यता, बहुविवाह, बाल विवाह, अनमेल विवाह महिलाओं और शूद्रों के शारीरिक मानसिक होता था जो जितना धनी उसकी उतनी ज्यादा पत्नियां आदमी की उम्र कुछ भी हो लेकिन शादी 7 से 9 वर्ष की लडक़ी से करता था, बाल विवाह के कारण पति की मृत्यु के बाद सती प्रथा के कारण जिंदा जलाया जाता था। कुछ जगह विधवा के सिर के बाल मुंडवा कर एक समय का रूखा सूखा खाने को दिया जाता था। 

घर में बेटी पैदा होते ही मार दिया जाता था। विधवाओं के साथ व्यभिचार व मनुवाद का परचम बुलन्द था। ज्योतिबा अपने ब्राह्मण मित्र सखाराम बल्लर के भाई की बारात में शुद्र होने के कारण अपमानित हुए तो उन्होंने शूद्रों और स्त्रियों को पढ़ाने का निश्चय किया कामकाज के बीच मे अपनी पत्नी को पढ़ाया और अमेरिकन मिशनरी गर्ल्स स्कूल अहमदनगर में शिथिया फरार से अध्यापिका प्रशिक्षण तथा बाद में नार्मल स्कूल पुणे में फ्रांस की संस्था से प्रशिक्षण प्राप्त कर प्रथम महिला शिक्षिका ब प्रधानाचार्य 1 जनवरी 1848 में पहला स्कूल भिड़ेवाड़ा पुणे में शुरु किया। 

मनुवादियों द्वारा विरोध किया गया। और ससुर को नरक जाने का डर दिखाया उन्होंने सावित्री बाई को पति सहित घर से बाहर निकाल दिया। ज्योतिबा दम्पत्ति को  उस्मान शेख व उनकी बहन फातिमा शेख ने उन्हें अपने घर में रहने तथा स्कूल चलाने के जगह दी। फातिमा शेख भी उनके साथ अध्यापिका बनी जब वह स्कूल जाती तब मनुवादी लोग उन पर कीचड़, गोबर मल मूत्र फेंक देते व पत्थर मारकर सिर लहूलुहान कर देते उसके बाद भी स्कूल का रिजल्ट अच्छा आता।

1852 में सावित्रिी बाई को स्कूल निरीक्षक समिति ने आदर्श शिक्षका का सम्मान पत्र दिया। उन्होंने 18 स्कूल खोलें तथा 1852 महिला मंडल का गठन कर महिलाओं की दशा सुधारने के लिए संसथागत कार्य किया महिलाओं को एकत्र कर उनके हक अधिकार की जानकारी देकर संघर्ष कर नेतृत्व करना सिखाया। विधवा महिलाओं के मुंडन को रोकने के लिए नाईयों को समझाया जिससे नाईयों ने महिलाओं के बाल काटने से मना किया। 

विधवा के साथ व्याभिचार होने तथा गर्भवती होने सेेे वह अपनी जान दे देती, बच्चा होने पर सुनसान में फेक देते, जिससे दोनों परिस्थितियों में मौत हो जाती थी इसको रोकने के लिए सावित्री बाई ने 1852 में बालहत्या प्रतिबन्धक गृह की स्थापना की 1854 में बड़े पैमाने में अनाथाश्रम व विधवा आश्रम की स्थापना की। 

एक काशिबाई विधवा गर्भवती हो गई आत्महत्या करने जा रही थी उसकी प्रसूति अपने घर में कराई व उसके बेटे यशवंतराव को गोद लिया व डॉक्टर बनाया। 1855 में उन्होंने मजदूरों किसानों तथा अछूत कामगारों के लिए संध्याकालीन स्कूलों को खोला। पानी की समस्या होने पर उन्होंने अपने घर का कुंआ 1868 में अछूतों के लिए पानी भरने के लिए दिया। 

1976  महाराष्ट्र में अकाल  पडऩे पर उन्होंने अनाज संग्रहण योजना बनाई और गरीबों को अनाज का वितरण किया। बाद में पक्का भोजन बांटने के 52 केंद्र खोलें ज्योतिबा ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की, उनकी मृत्यु के बाद 1890 में सावित्री अध्यक्ष बनी और पति का अंतिम संस्कार खुद किया।

 1897 में प्लेग फैलने पर सत्यशोधक समाज के कार्यकर्ताओं और पुत्र यशवंत राव की मदद से रोगियों की सेवा की एक अछूत बच्चा पीडि़त था कोई साधन न मिलने पर उसे अपनी  पीठ पर लादकर अस्पताल ले गई जिससे वो भी प्लेग से संक्रमित हो गई। 10 मार्च 1897 में 66 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। 

कार्यक्रम की शुरूआत और आभार वक्तव्य बुद्धमित्रा वासनिक ने की। डॉ. सुजाता वासनिक, डॉ. संध्या दामले, माया वासनिक, वंदना मेश्राम, एमबी अनोखे, प्रशांत सुखदेवे, देवपाल रामटेके, मीना खोब्रागढ़े, आशा जामुलकर, वंदिता गजभिए, रविता लकड़ा, बिन्दा डोंगरे, वंदना बोरकर, शारदा मेश्राम, सुनिता सिंह, सुनिता ढारसे, पार्षद पूर्णिमा नागदेवे, निर्मला रामटेके, सुनिता मेश्राम, प्रोफेसर, प्रियांकी गजभिए, सरला नोन्हारे, दयाल मेश्राम, शिला शेंडे, माला उके, हषिका गजभिए, पुष्पा सावरकर, माया खोब्रागढ़े, , अजय डोंगरे, रितेश गजभिए, कौशल खोब्रागढ़, रामप्रसाद नंदेश्वर, राजेन्द्र रामटेके, मिलिन्द तथा पत्रकार सुशांत कुमार की उपस्थिति रही। कार्यक्रम का संचालन सुनिता इलमकर कर रही थी।


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