छत्तीसगढ़ सरकार ने मूलवासी बचाओ मंच पर लगाया प्रतिबंध
बुद्धिजीवियों और विभिन्न राजनीतिक व मानवाधिकार संगठनों ने किया विरोध
सुशान्त कुमारबस्तर क्षेत्र में पिछले कुछ सालों से सक्रिय संगठन ‘मूलवासी बचाओ मंच’ पर छत्तीसगढ़ सरकार के गृह मंत्रालय ने प्रतिबंध लगा दिया है। सरकार द्वारा 30 अक्टूबर, 2024 को जारी एक परिपत्र में कहा गया है कि यह न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करते हुए एवं विधि द्वारा स्थापित संस्थाओं की अवज्ञा को बढ़ावा देते हुए तथा उनके द्वारा लोक व्यवस्था, शांति में बाधा एवं नागरिकों की सुरक्षा में खतरा उत्पन्न किया जा रहा है जो कि राज्य की सुरक्षा के प्रतिकूल हैं।
देश के नामी बुद्धिजीवी प्रोफेसर जी हरगोपाल, प्रोफेसर मनोरंजन मोहंती, प्रोफेसर जगमोहन सिंह ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री को खुला पत्र लिखा है-जिसमें मूलवासी बचाओ मंच पर प्रतिबंध हटाने का आग्रह किया गया है।
उनका कहना है कि मूलवासी बचाओ मंच (एमबीएम) बस्तर में आदिवासियों का एक लोकतांत्रिक जन संगठन है, जो पिछले 3 वर्षों से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहा है, कॉर्पोरेट लूट और सैन्यीकरण का विरोध कर रहा है जो उनके जीवन, आजीविका, पर्यावरण, संस्कृति और पहचान के लिए अस्तित्वगत खतरा है। एमबीएम पर प्रतिबंध लगाने का कदम न केवल आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करता है, बल्कि शांतिपूर्ण विरोध के प्रति सरकार की बढ़ती असहिष्णुता के बारे में भी चिंता पैदा करता है।
सभी बुद्धिजीवियों ने कहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा हाल ही में मूलवासी बचाओ मंच पर छत्तीसगढ़ विशेष सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत प्रतिबंध लगाने के निर्णय की कड़ी निंदा करते हैं। यह कदम न केवल आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करता है, बल्कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के प्रति सरकार की बढ़ती असहिष्णुता के बारे में भी चिंता पैदा करता है।
प्रतिबंध को उचित ठहराने वाली अधिसूचना इन समुदायों के जमीनी संघर्षों को स्वीकार करने में विफल रही, जो केवल विनाशकारी खनन परियोजनाओं के रूप में सैन्यीकरण और कॉर्पोरेट शोषण के हमले के खिलाफ अपने घरों, जमीनों और सम्मान की रक्षा कर रहे हैं।
मूलवासी बचाओ मंच आदिवासियों की आवाज़ रहा है, जो जबरन विस्थापन, पर्यावरण विनाश और उनकी सांस्कृतिक पहचान के क्षरण का विरोध करता रहा है। ऐसे संगठन को गैरकानूनी करार देना लोकतंत्र के सिद्धांतों का अपमान है और संविधान में निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। विकास के नाम पर बोलने की आज़ादी, शांतिपूर्ण सभा और सम्मान के साथ जीने के अधिकार को कुचला गया है।
हालाँकि, पिछले कई सालों से सरकार और नागरिक समाज संगठनों की रिपोर्ट चिंताजनक स्थिति को दर्शाती हैं, जहां विकास के नाम पर जिन आदिवासियों का विस्थापन उचित ठहराया जाता है, उन्हें बमुश्किल ही कोई स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा सुविधाएँ मुहैया कराई जाती हैं।
कहा जा रहा है कि पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) और संविधान की 5वीं अनुसूची जो आदिवासी समुदायों को स्वशासन के अधिकार की सुरक्षा और गारंटी देती है और उनके क्षेत्रों में परियोजनाओं के लिए उनकी सहमति अनिवार्य करती है, का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। खनन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए ग्राम सभाओं को या तो दरकिनार किया जाता है या उनका दुरुपयोग किया जाता है।
जिससे इन समुदायों की सुरक्षा के लिए बनाए गए लोकतांत्रिक सुरक्षा उपाय खत्म हो जाते हैं। उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के प्रति यह व्यवस्थित उपेक्षा सरकार की कॉर्पोरेट हितों के साथ बढ़ती मिलीभगत और लाभ के लिए आदिवासियों के जीवन और सम्मान का बलिदान करने की उसकी इच्छा के बारे में गंभीर चिंताएं पैदा करती है।
मूलवासी बचाओ मंच संविधान के तहत अपने सुरक्षा उपायों, पेसा के तहत कानूनी अधिकारों और जीवन और आजीविका के अधिकार के उल्लंघन के खिलाफ शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध कर रहा है; ब्लास्टिंग और ओपन कास्ट जैसे सदियों पुराने तरीकों का उपयोग करके किए जा रहे विनाशकारी खनन प्रक्रियाओं का विरोध कर रहा है, जो नदियों और पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मूलवासी बचाओ मंच पर प्रतिबंध लगाने और आदिवासी मांगों के लोकतांत्रिक मुखरता को दबाने के लिए छत्तीसगढ़ विशेष सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम पर भरोसा करना एक खतरनाक मिसाल है।
इस तरह के कानून इतिहास के काले अभिलेखों का हिस्सा हैं, न कि ऐसे देश में जहां लोग लोकतांत्रिक होने की आकांक्षा रखते हैं। मूलवासी बचाओ मंच पर प्रतिबंध केवल एक संगठन पर हमला नहीं है; यह सभी लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए एक संदेश है कि सरकार विरोध को बर्दाश्त नहीं करेगी, चाहे वह कितना भी शांतिपूर्ण या उचित क्यों न हो।
पीयूसीएल और रेड फ्लेग जैसे संगठनों ने भी मूलवासी बचाओ मंच पर प्रतिबंध हटाएं जाने इसके गिरफ़्तार सदस्यों को तुरंत रिहा करें और सैन्यीकरण और खनन प्रक्रियाओं का विरोध करने वाले आदिवासियों के साथ बातचीत करने कहा है। सभी का कहना है कि आगे का रास्ता दमन और हिंसा का नहीं हो सकता।
इसके बजाय, इसमें आदिवासियों की आवाज़ सुनना, उनकी स्वायत्तता का सम्मान करना और संविधान के साथ- साथ अन्य लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत उनके अधिकारों को बनाए रखना शामिल होना चाहिए। सैन्यीकरण और कॉर्पोरेट शोषण केवल घावों को गहरा करेगा और उस भरोसे को खत्म करेगा जो किसी भी वास्तविक संवाद या विकास के लिए ज़रूरी है।

राज्य सरकार ने अपनी अधिसूचना में कहा है कि सूचनाएं प्राप्त है कि मूलवासी बचाओ मंच संगठन केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में चलाये जा रहे विकास कार्यों तथा इन विकास कार्यों के संचालन हेतु निर्माण किए जा रहे सुरक्षा बल के कैंपों का लगातार विरोध करने तथा आम जनता को उसके विरुद्ध उकसाने का कार्य किया जा रहा है।
साथ ही न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करते हुए एवं विधि द्वारा स्थापित संस्थाओं की अवज्ञा को बढ़ावा देते हुए तथा उनके द्वारा लोक व्यवस्था, शांति में बाधा एवं नागरिकों की सुरक्षा में खतरा उत्पन्न किया जा रहा है, जो कि राज्य की सुरक्षा के प्रतिकूल है।
और यत:, मूलवासी बचाओ मंच के संबंध में, राज्य सरकार का समाधान हो गया है कि ऐसे संगठन को विधि विरूद्ध संगठन घोषित करना आवश्यक है। अधिसूचना में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, 2005 (क्रं. 14 सन् 2006) की धारा 3 की उप-धारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों को प्रयोग में लाते हुए, राज्य सरकार, एतद्वारा, ‘मूलवासी बचाओ मंच’ को, इस अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से एक वर्ष की कालावधि के लिये, ‘विधि विरूद्ध संगठन’ घोषित करती है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता मनीष कुंजाम ने प्रेस को कहा कि वे इस फैसले का विरोध करते हैं। ‘अगर इसके ऊपर यह आरोप है कि यह माओवादियों का छद्म संगठन है और सरकारी प्रतिबंध की वजह यही है तो, हमारा मानना है कि सरकार को इस पर पूरी जानकारी देनी चाहिए।
माओवादियों से इसका संबंध किस तरीके का है, कैसा है, यह सब बताना जरूरी है। हमारा मानना है कि जब तक कोई संगठन इस इलाके में संविधान पर आस्था रखते हुए, अहिंसक और शांतिपूर्ण तरीक़े से आंदोलन करता है तो उस पर प्रतिबंध नहीं लगाना चाहिए, बल्कि उसके साथ संवाद करना चाहिए।’
उन्होंने आगे कहा, ‘इसका एक और पहलू यह है कि ऐसा लगता है कि माओवादियों के साथ संबंध होने के बहाने सरकार इस संगठन को ही खत्म कर देना चाहती है. हमारी तरफ से बार-बार कहा जा रहा था कि सरकार माओवादियों के साथ भी बातचीत करे। बिना खूनखराबे के शांति और सुलह का कोई रास्ता ढूंढे।
आदिवासी कार्यकर्ता सोनी सोरी ने कहा कि उन्हें और मूलवासी बचाओ मंच पर प्रतिबंध के बारे में वॉट्सऐप संदेशों से पता चला है। उन्होंने कहा कि मूलवासी मंच के अध्यक्ष रघु मोडियम को कलेक्टर द्वारा नोटिस के जरिये कानूनी रूप से जानकारी देनी चाहिए थी। उन्होंने कहा, ‘हम पहले मूलवासी मंच के लोगों के साथ मिलेंगे और कलेक्टर के पास जाकर पूछेंगे कि बात क्या है. उसके बाद ही कोई कदम उठाएंगे।’
सोरी ने आरोप लगाया, ‘सरकार यहां अपने अधिकारों के लिए लडऩे वाले हर व्यक्ति की आवाज़ को दबाना चाहती है. मूलवासी बचाओ मंच में ज्यादातर यहां के युवा जुड़े हुए हैं। और सरकारी प्रतिबंध उन सारे युवाओं को निशाना बनाता है।’
उन्होंने कहा, ‘बस्तर में अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले हर शख्स को नक्सली के नाम पर जेलों में डालना आम बात हो गई है। वर्तमान में सरकार जो कर रही है, उसका मकसद यह लग रहा है कि नक्सलवाद के नाम पर आदिवासी समाज को खत्म कर दिया जाए।’
मूलवासी बचाओ मंच के अध्यक्ष रघु मोडियम ने प्रेस को बताया कि उन्हें प्रतिबंध के बारे में पता चला है। उन्होंने इसे गैरकानूनी करार दिया और बिना ग्राम सभा के सुरक्षा बलों द्वारा कैंप लगने पर ग्रामीणों द्वारा विरोध का सवाल उठाया है।
उन्होंने बताया कि यह खुले रूप में समाज में कार्य करने वाली संगठन है। कहा कि इस बारे में उनके कार्यकारी सदस्यों, जो अलग-अलग जिलों में हैं, के साथ बात करके अगले कदम के बारे में फैसला लेंगे। उन्होंने गिरफ्तार किए गए आदिवासियों की रिहाई की भी बात की है।

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