प्रज्ञागिरी में बुद्ध प्रतिमा की स्थापना भदंत मानके ने की ना कि भदंत ससाई
विनोद खांडेकर मांगे माफी, कृष्णा नन्देश्वर ने की गलत बयानी
सुशान्त कुमारससाई के सहयोगी कृष्णा नन्देश्वर ने अम्बागढ़ चौकी के बौद्ध मंच से प्रज्ञागिरी की विशाल प्रतिमा की स्थापना भदंत ससाई द्वारा किए जाने की बात कह कर इतिहास को झुठलाने तथा बौद्धों को दिग्भ्रमित करने का काम किया है। इसके लिए प्रज्ञागिरी ट्रस्ट समिति के अध्यक्ष तथा पूर्व विधायक विनोद खांडेकर को माफी मांगना चाहिए क्योंकि उनकी उपस्थिति में बौद्ध समाज में भ्रम फैयाला जा रहा है और यह सरासर झूठ है।
सामाजिक कार्यकर्ता कन्हैयालाल खोब्रागढ़े ने उपरोक्त आरोप लगाते हुए ‘दक्षिण कोसल’ को बताया कि वनांचल अम्बागढ़ चौकी में 29 तारीख को वयोवृद्ध प्रसिद्ध भदन्त नागार्जुन सुरेई ससाई द्वारा जब विश्व के शांतिदूत महाकारूणिक भगवान बुद्ध की भव्य प्रतिमा का अनावरण किया गया तब उनके सहयोगी कृष्णा ने डोंगरगढ़ विधायक और अन्य लोगों के समक्ष इतिहास को झुठलाने गलत बयानी की है।
उन्होंने पूरे मामले की तह में जाते हुए बताया कि इस कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ से लेकर महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों से कुछ अनुयायियों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। उन्होंने भदंत ससाई और भदंत मानके के बारे में बताते हुए कह रहे हैं कि बाबा साहब आम्बेडकर की कर्मभूमि नागपुर में अपना सारा जीवन बौद्ध धर्म उत्थान में लगाने वाले भदंत ससाई का जन्म जापान के निमी शहर के शुगो गांव में हुआ। उनकी माताजी बौद्ध धर्म की अनुयायी थी। धर्मप्रिय माता के आंचल में पल बढ़ कर ससाई का झुकाव बौद्ध धर्म की ओर पड़ा।
उन्होंने भंदत ससाई के बारे में आगे कहा कि बालपन में उनका नाम मिनेरू ससाई था श्रामणेर दीक्षा लेने के बाद उनका नाम सुरेई ससाई रखा गया। जापान के ताकाकोसाव बुद्ध विहार में उनकी श्रामनेर दीक्षा हुई। उन्होंने जापान में दीन-दुखियों की सेवा करते हुए एक मासिक पत्रिका ’जिरसेन बुक्यो’ अर्थात (काम करते रहो) प्रकाशित करते रहे हैं।
उन्होंने भदन्त सुरई ससाई के विद्वता पर कहा कि इसमें कोई दो मत नहीं कि भदंत ससाई सिंगोम सम्प्रदाय, मुन्शु सम्प्रदाय, निजीकेत सम्प्रदाय का गहन अध्ययन किया। जापान के सप्रिसिद्ध विश्वविद्यालय (थोईशो से स्नातक की परीक्षा पास की हैं।) भदंत आज जिस मकाम पर खड़े हैं उसके लिए उनको कठिन परीक्षाओं से होकर गुजरना पड़ा हैं।
प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में भदंत ससाई को भारत की नागरिकता प्रदान की गई। थाईलैण्ड में उनकी उपसम्पदा हुई और नाम ‘सव्यातन’ रखा गया। वहां उनको स्थिवरवाद का पवित्र चीवर प्रदान किया गया। उन्होंने फूजी गुरू के मार्ग दर्शन में राजगृह में बननेवाले शांति स्तूप में मनोयोग के साथ कार्य किया।
उन्होंने पूरे मसले पर खुलासा किया है कि भदंत ससाई ने ही भदंत संघरत्न मानके को बाल्यावस्था में जापान भेजा था। डोंगरगढ़ की प्रज्ञागिरी पहाड़ी (नंगाड़ा डोंगरी) पर 30 फुट की विशाल बुद्ध की प्रतिमा भदन्त मानके ने स्थापित की है ना कि भदन्त ससाई। गौरतलब है कि भदंत मानके ने ही प्रज्ञागिरी को अन्तरराष्ट्रीय पहचान दिलाई एवं प्रतिवर्ष 6 फरवरी को उन्हीं के प्रेरणा से अन्तरराष्ट्रीय बौद्ध मेला आयोजित किया जाता है।
बहरहाल अम्बागढ़ चौकी के बौद्ध मंच से इतिहास को लेकर गणमान्य व्यक्तियों के बीच गलतबयानी वाकई में इतिहास को झुठलाने का प्रयास है। इस पर जिम्मेदार व्यक्तियों और दोषियों को बौद्ध समाज से माफी मांगनी चाहिए। और अपने मन में बैठा चुके गलत जानकारी और इतिहास को दुरूस्त करना चाहिए।

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