अस्तित्व बचाने आदिवासी समुदाय ने सरकार को चेताया

दरवेश आनंद, सम्पादक लोक असर

 

प्रतिवर्ष 10 दिसंबर को शहीद वीर नारायण सिंह की शहादत को सलाम करते हुए स्मरण करते हुए कई छोटे-बड़े आयोजन होते हैं। मेला-मड़ई का आनंद उठाते राजनीतिक पार्टियों से आए नेताओं के भाषण सुन साथ ही साथ अमर योद्धा को याद करके उनके आदिवासी होने का गुणगान करते विदा हो जाते हैं। और पुनः 10 दिसंबर के आगमन की बाट जोहते रहते हैं, किंतु वीर मेला का यह तीन दिवसीय आयोजन पूरे भारत में आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन छीनकर उन्हें विस्थापित किए जाने का सिलसिला जारी है और भारत के करोड़ों आदिवासियों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा है। इसके चलते अब उनका अस्तित्व ही संकट में आ गया है। जिसे लेकर लगभग 7 वर्षों से राजा राव बाबा के तपस्थली राजा राव पठार जिसे वीर भूमि कहा जाता है।

जो कि रायपुर जगदलपुर नेशनल हाईवे पर धमतरी से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जहां महान् योद्धा अमर शहीद वीर नारायण सिंह की शहीदी को याद करते हुए छत्तीसगढ़ प्रदेश के साथ देश के अन्य प्रांतों से भी आदिवासी समाज के प्रतिनिधि शिरकत करते हैं। और महापंचायत में सरकार द्वारा किए जा रहे हैं संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन करते हुए जल जंगल जमीन से बेदखल किया जा चुका है और किए जा रहे हैं। इससे आदिवासियों की संस्कृति-सभ्यता के साथ जीवन का संकट आ गया है।  जिसे लेकर आदिवासी समाज करो या मरो का रास्ता अपनाकर शहीद वीर नारायण सिंह के व्यवहार को आत्मसात् करने का उद्गार करते दिखाई देते हैं। 

वीर मेला एक नज़र

शहीद वीर नारायण सिंह की शहादत दिवस को स्मरण रखने एवं उनकी शौर्य गाथा को नयी पीढ़ियों तक पहुंचाने के साथ बाबा राजाराव जी के तपस्थली में वीर मेला आयोजन समिति राजाराव पठार द्वारा विगत 7 वर्षों से आयोजन किया जा रहा है।  प्रतिवर्ष इस की ख्याति बढ़ती जा रही है। यह आयोजन एक निर्धारित समय में की जाती है। दिसम्बर माह के द्वितीय सप्ताह में 08 09 * एवं 10 दिसंबर को आयोजन में शुमार होते हैं। इस दौरान देवमिलन, आदिवासी हाट बाजार, आदिवासी लोक महोत्सव, आदिवासी प्रतिभा सम्मान, आदिवासी महापंचायत, शहीद वीर नारायण सिंह श्रद्धांजलि को अर्पित किया जाता है।

प्रत्येक आगंतुकों का स्वागत द्वार पीला चावल ललाट में लगाकर #सेवा जोहार के संग संग किया जाता है जो अपने आप में अलग पहचान है#आदिवासी सभ्यता और संस्कृति का अनुपम जोड़ है। वहीं पीला चावल एवं सफेद गमसा बांधकर #अतिथियों का स्वागत सत्कार किया गया। वीर मेला महोत्सव में नारायणपुर , बीजापुर, धमतरी, सिहावा- नगरी कांकेर एवं जिला बालोद के आदिवासी समाज के लोग शिरकत करते हैं। 

इस मौके में आदिवासियों के सिरहा, बैगा, राजवैद्य अपनी जड़ी बूटियों का प्रर्दशन करते हैं #विक्रय हेतु भी उपलब्ध कराई जाती है। अलावा इसके आदिवासियों में प्रचलित लोक नृत्य जो कि बेहद ही आकर्षक और मनमोहक होता है प्रस्तुत की जाती है।

जिसमें विशेषत:

हुलपी नृत्य  कोण्डागांव क्षेत्र में विशेष रूप से हल्बी लोक संस्कृति से लबरेज कलाकारों द्वारा प्रस्तुत हुलपी नृत्य न मन मोह लेते थे। रेला पाठा दुर्गु कोंदल पखांजूर क्षेत्र से आये कलाकारों ने रेला पाठा नृत्य से शमां बांधने में कोई कसर नहीं छोड़ी। करमा नृत्य छत्तीसगढ़ अंचल के कलाकारों ने भी वीर मेला में करमा नृत्य की प्रस्तुति दी। इसके अतिरिक्त गोंडी सुवा लोक गीत कांकेर क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किया गया। वेशभूषा साज सज्जा इस दौरान आदिवासी युवतियों के पहनावा भी आकर्षक का केन्द्र बना रहा। वहीं आदिवासियों के विलुप्तता के कगार तक जा चुके वाद्य यंत्रों को देखे जा भी कौतूहल भरा रहा दर्शकों के लिए।

वीर भूमि में वीर मेला            

विदित है कि प्रतिवर्षानुसार आठ, नौ एवं दस दिसंबर को राजा राव पठार में वृहद वीर मेला का आयोजन किया जाता है। वीर मेला के प्रथम दिवस आदिवासी समाज के मार्गदर्शकों के साथ जो समाज को लेकर चिंतन मनन करते हैं। समाज के विकास के लिए सतत् प्रयासरत हैं। उनके द्वारा आदिवासी लोक नृत्य संग ही डांग-डोरी लेकर देवी स्थापना, देव पूजन एवं देव मिलन आयोजन का आधारशिला रखते हैं। तत्पश्चात् कार्यक्रम का आगाज मेला स्थल में निर्मित विशाल मंच से किया जाता है।


इस मौके पर समाज के नेताओं ने सरकार से सवाल किया साथ ही आदिवासी समाज से जीतकर मंत्री विधायक और सांसद बनने वाले नेताओं की प्रतिनिधित्व पर भी सवाल खड़े किए। क्या हमारे पास ऐसे जनप्रतिनिधि हैं जो हमारी समस्याओं को समझे विधानसभा लोकसभा और राज्यसभा में रख सके जबकि आदिवासी समाज लगातार 73 वर्षों से जूझते आ रहे हैं, उन्होंने बताया कि 25 सालों से फर्जी जाति प्रमाण के मुद्दे को लेकर लड़ा जा रहा है। लगभग 780 फर्जी जाति प्रमाण पत्र होने का मुख्यमंत्री ने दावा किया है।  यदि एक 1 साल में 25-25 लोगों को निकालते तो सारे फर्जी मामला निकल चुके होते।  पदोन्नति में आरक्षण का संविधान में व्यापक व्यवस्था है, तो उसे क्यों रोका जा रहा है। यह चिंतन का विषय है। जबकि महाराष्ट्र में एक कमेटी है रत्नप्रभा कमेटी जिसने 1 माह में रिपोर्ट तैयार किया।  जिसे सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया।  आज वहां यह लागू कर दिया गया है।  इधर छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा 5 सदस्य समिति को गठित की है, लेकिन इसमें विभिन्न मुद्दों को सम्मिलित कर भटका दिया गया है,  और ताज्जुब की बात है कि इस कमेटी की आज पर्यंत एक बैठक तक नहीं हो सकी है।  जनगणना में आदिवासियों का अलग से कालम था 1951-52  तक। लेकिन इसके बाद से आदिवासियों को अलग से गिनना बंद कर दिया गया है। वहीं 1871 से लेकर 1951-52 तक अलग अलग नामों से पुकारा जाता था। जैसे 1871 में एब्रोजिल, ,1881 में एब्रोरिजिनल, 1891 में फारेस्ट ट्राइब, 1901 से 1911 तक एनिमिस्ट, 1921 में प्रिमिटिव, 1931 में ट्राइबल रिलिजन एवं 1941 से लेकर 1951 तक ट्राइब । इसके बाद से यह सब कालम बंद कर दिया गया है। अब सवाल है कि क्या आदिवासियों की संख्या बढ़ रही थी? जिसे रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है।  एक बड़ा मुद्दा है समाज के आगे। और इसे लेकर 6 दिसंबर 2020 को 12 राज्यों के आदिवासी समाज के मुखियागण आगामी जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग से कालम की मांग की है। इस प्रकार से पूरे भारत में आदिवासियों की संख्या कम हो रही है। इसके मुख्य कारण क्या है? किसी महापुरुष ने कहा है समाज के विकास र्थ्रीएम के बिना विकास संभव नहीं है। मनी, पावर एवं मेजॉरिटी। जब तक नहीं होगा विकास संभव नहीं है।  इसमें आज दो और बात जोड़ने होंगे एक मैन्युफैक्चरिंग एवं दूसरा मार्केटिंग नहीं होगा तब तक विकास संभव नहीं है।

बीएस रावटे, केंद्रीय अध्यक्ष हल्बा समाज 



हम 10 दिसंबर को सोनाखान के वीर सपूत की शहादत को याद करते हैं।  और यह वीर मेला आयोजित होती है।  ब्रिटिश सरकार के शोषण, अत्याचार के खिलाफ वीर नारायण सिंह अंतिम समय तक लड़े। अंत में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया। आज वीर मेला का स्वरूप क्या है? जब गोंड राजा हुआ करते थे तो किसी के घर में ताला नहीं लगता था।  चोरी नहीं होती थी। आज उसी परंपरा को पुनर्स्थापित करने में आदिवासी समाज लगा हुआ है। उन्होंने बताया कि आदिवासी समाज कभी भीख नहीं मांगता। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से जीवन जीता है। इसके बाद उन्होंने गीत के माध्यम से अभिव्यक्त किया - गढ़ धमधा म बाजा बाजे, बावनगढ़ ह नाचे रे। उपर उड़े चील परेवा नीचे मजुर झाल रे। बइला खुर म लावा लुटे सूलुंग सपट जाय तैना ना ... इस प्रकार से आदिवासी सेवा में सबसे पहले है। वहीं कभी भी गोंड समाज जातिगत भेदभाव नहीं किया।

मोहन मंडावी, सांसद कांकेर लोकसभा क्षेत्र


पूर्व सांसद सोहन पोटाई ने कहा कि पहली बार जब आदिवासी समाज की महापंचायत बैठी थी तो समस्याओं की बिंदु 16 थी। उसके बाद 34 बिंदु की समस्याएं हो गई। फिर 46 और आज 56 बिंदुओं की समस्याएं सामने है। इससे ऐसा लगता है कि आदिवासियों की आवाज में कोई दम नहीं है या फिर वीर नारायण सिंह की शहादत को एक मनोरंजन के तौर पर यहां वीर मेला जैसे आयोजन कर रहे हैं। जब हमारी आवाज ही बुलंद नहीं होगी, तो सरकार कहां सुनेगी। यही कारण है कि आदिवासियों की समस्याएं प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। राजाराव बाबा के आंगन में वीर मेला आयोजन का यह सातवां साल है। यही वह स्थल है जहां से 32% आरक्षण की मांग आदिवासियों ने की थी इसे लेकर कांकेर में भी 25 फरवरी 2010 को तकरीबन 500000 आदिवासियों ने हुंकार भरे थे। लेकिन, तत्कालीन भाजपा सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। तब इस जगह पर धरना प्रदर्शन एवं चक्का जाम आदिवासी करते थे और उसी का परिणाम है कि हमें 28% आरक्षण का लाभ मिलना शुरू हुआ। और शहीद वीर नारायण सिंह से प्रेरणा लेकर यहां पर वीर मेला का आयोजन होता है। आदिवासी महापंचायत में जो भी समस्याएं आती है।  सरकार से मिलकर उसका समाधान किया जाता है।  यहीं पर आगे की रणनीति भी महापंचायत बनाती है। 6 दिसंबर 2020 को समस्त आदिवासी समाज के लोग इकट्ठे होकर बैठक आहूत किए थे। जिसमें  अलग से धर्मकोड की मांग रखी गई है।  उन्होंने बताया कि 1871 से लेकर 1951 तक आदिवासी समाज के अलग से कलम थी। 1961 में उक्त कालम को हटा दिया गया।  आखिर वह कलम कहां गई यह सवाल है सरकार से।  इसे लेकर  आदिवासी महापंचायत ने मांग की है कि हमें पुनः उसी स्थिति में लाकर आदिवासी समाज की जनगणना किया जाए। वहीं पूरे भारत के आदिवासी एक बात से राजी हुए हैं, कि हमारा धर्मकोड सिर्फ आदिवासी हो। इसलिए कि भारत के किसी भी कोने में रहने वाले जनजातियां यह कहती हैं कि हम आदिवासी हैं। झारखंड में वहां की सरकार ने 'सरना' धर्मकोड के प्रस्ताव भेज दिया है। वह भी महापंचायत में सम्मिलित थे और उनका भी कहना है कि जब सभी आदिवासी लिखेंगे, तो हम सरना नहीं बल्कि आदिवासी लिखेंगे।  उन्होंने हर्ष के साथ कहा कि जशपुर क्षेत्र के आदिवासी भी यह लिखित में दिए हैं कि हम मूलरूप से आदिवासी ही हैं। हमारा कोई धर्म कोड  नहीं था,  इसलिए ईसाइयत अपनाएं  हैं। लेकिन जब अपना भी धर्म कोड आदिवासी मिलेगा, तो पुनः हम घर वापसी करेंगे। उन्होंने कहा कि यदि सरकार राजी नहीं होगी तो 1 फरवरी 2021 में पूरे देश में देश के आदिवासी श्रृंखलाबद्ध तरीके से सरकार को चेताएंगे। इसके बाद भी सरकार नहीं सुनती है तो मार्च 2021 में रेल रोको आंदोलन किया जाएगा।  इसी प्रकार समस्या छत्तीसगढ़ प्रदेश में भी है। आदिवासी महापंचायत में जो भी प्रतिवेदन पारित किया जाता है। उसे वीर मेला में पढ़कर मुख्य अतिथि को सुनाएं जाता है।  पिछले मर्तबा मुख्यमंत्री नाराज हो गए थे,  जबकि उनके द्वारा आदिवासी समाज को लेकर घोषणा पत्र में रखे थे। पहला,  पांचवी अनुसूची एवं पेशा कानून को कड़ाई से लागू कराना है।  दो साल बीत गए,  पेशा कानून का पता नहीं है,  लागू होगी नहीं होगी, कुछ कह नहीं सकते। जबकि 1996 में पहले से ही पेशा कानून बनाए जा चुके हैं। तो विधानसभा में पुनः जाने की जरूरत नहीं है।  फिर वहां जाता है।  तो कानून पेचीदा हो जाएगी।  इसलिए मसौदे को लेकर आदिवासी मंत्रणा परिषद में बुलाकर प्रस्ताव पारित कर राज्यपाल को भेज दिया जाए यह मेरी सरकार से सलाह है। दूसरी ओर फर्जी तौर पर नक्सली करार देकर जेल में बंद आदिवासियों को रिहा किया जाए।  इतना अवश्य है कि कुछ आबकारी प्रकरणों का निपटान किया गया है।  लेकिन, जो मूल घोषणा पत्र में उल्लेखित है कि फर्जी नक्सली जो जेल में बंद है उन्हें बेशर्त रिहा किया जाएगा। वहीं सामूहिक वन पट्टा अधिकार देने की प्रक्रिया चल रही है, जिसमें तेजी लाने की जरूरत है।  उन्होंने पखांजूर क्षेत्र के विधायक के संज्ञान में यह बात लाए कि वहां बंगाली वॉइस आदिवासी की लड़ाई है। उन्होंने बताया कि आदिवासियों की एफआईआर तक नहीं लिखी जाती। किसी भी मामले में। विपरीत इसमें आदिवासियों के खिलाफ ही प्रकरण बनाए जाते हैं। ऐसे शासन-प्रशासन में प्रतिनिधित्व करने वालों का कर्त्तव्य है कि समाज के भीतर क्या चल रहा है संज्ञान लेते रहे।

सोहन पोटाई, पूर्व सांसद



आदिवासी महापंचायत के संरक्षक अरविंद नेताम ने कहा कि समाज को आज की हालात को जानना चाहिए समझना चाहिए की क्या स्थिति निर्मित हो रही है कौन से कानून बदल रहे हैं नए नए बदलाव शासन प्रशासन के द्वारा किया जा रहा है ऐसे में हम पीछे रह गए तो भविष्य में कठिनाइयां आ सकती है समाज को लेकर सरकार के भरोसे नहीं रहना है सरकार के भरोसे में धोखा खा जाओगे स्वयं को ही अपनी लड़ाई लड़ना होगा कोई अब मदद करने इस देश में नहीं आने वाला है उस पीढ़ी के राजनेता अब नहीं रहे जो सेवा करते थे उन्होंने समाज की सबसे बड़ी समस्या बताते हुए यह रेखांकित किया कि शोषण शोषण एक ऐसा मजमून हो गया है वह चाहे सरकारी हो गैर सरकारी हो अथवा व्यक्तिगत समाज विशेष द्वारा हो आदिवासियों को जितना ठगना हो ठग लो यह चलन है और यह हमारे भोलेपन सीधा पन का कारण है जल जंगल जमीन की रक्षा करनी होगी इसके बगैर देश दुनिया एवं आदिवासी समाज का गुजारा नहीं हो सकता आदिवासियों की जमीन को लेकर विशेष बस्तर में मारामारी हो रही है जिन क्षेत्रों में सिर्फ आदिवासी लोग रहते हैं आज सभी जगहों में दूसरी जाति वर्ग के लोग कब्जा कर रखे हैं जंगल को सिर्फ आदिवासी ही बचा के रखा है इसलिए सारा दबाव केवल और केवल आदिवासी इलाकों में होगा उन्होंने बिना कोई नाम लिए डौंडीलोहारा विकासखंड के कथित बाबा पर तल्ख शब्दों में टिप्पणी करते हुए कहा कि आदिवासी इलाके में अतिक्रमण कर आश्रम बनाकर एक बाबा दादागिरी कर रहा है उन्हें भी सबक सिखाया जाएगा जमीन की रक्षा जंगल की रक्षा के लिए कानून बने हैं बहुत से उसका हमें उपयोग करना होगा महापंचायत में पेशा कानून को लेकर विशेष तौर पर बातचीत हुई है उन्होंने पंचायत मंत्री का आभार जताते हुए कहा कि कुछ इस दिशा में सरकार काम कर रही है उन्होंने पेसा कानून के संबंध में बताया कि 27 सालों बाद तब नियम बना रहे हैं अपने नेतृत्व काल का जिक्र करते हुए कहा कि हमने कैबिनेट में कानून बनवाए थे लेकिन उसके लिए नियम नहीं बना पैसा क्या है सभी आदिवासी जानते हैं उनके द्वारा समाज के लोगों से अपील किया गया कि पेशा कानून को कमजोर करने खत्म करने की साजिश होगी हो रही है इस परिपेक्ष में उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने का उसे भी पेशा कानून के विरुद्ध मानते हैं यह एक षड्यंत्र है उन्हें मालूम है कि जितनी भी खनिज संसाधन है संपदा है इस पेशा कानून से केंद्र और राज्य सरकारों को भी बहुत तकलीफ है नई पीढ़ी से आह्वान करते हुए कहा कि पेशा कानून को बचा सकते हो तो बचा लेना सरकारी से कब बदल देंगे भरोसा नहीं है जिस दिन पेसा कानून बदलेंगे आदिवासियों का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगासरकारी स्टॉक में है कि पेशा कानून बदल देंगे हालांकि अभी 2530 साल उम्र में इसे छूने की हिम्मत नहीं होगी लेकिन बहुमत पर कानून बनाते हैं और बदल देते हैं इसके प्रति समाज गंभीर रहें नक्सलवाद पर भी चर्चा की गई इस बात का फर्क करते हुए कहा कि पहली बार आदिवासी समाज नक्सलवाद देश एवं आदिवासी इलाके के सबसे बड़ी समस्या और चुनौती है हमारे इलाके की समस्या है हम चर्चा नहीं करेंगे तो कौन करेगा उन्होंने बताया कि नक्सलवाद से चर्चा करने आदिवासी समाज के लोगों को सरकार बुलाए सब से चर्चा किया जाए लेकिन दुर्भाग्य कि इस पर आदिवासी समाज को आज पर्यंत चर्चा में शामिल नहीं किया गया जबकि आदिवासी भी अपनी बात रखना चाहते हैं आदिवासी कितने सालों से कितने नजदीक से नक्सलवाद को झेल रहे हैं देख रहे हैं इसके लिए सरकार को समाज से सुझाव मांगने चाहिए उन्होंने नारायणपुर में 10000 आदिवासी जो पूरा अबूझमाड़ को रखे थे उनसे 15 दिनों की मोहलत लेकर समझाया यहां पर बहुत से विधायक बैठे हैं नक्सल समस्या आंदोलन विद्रोह हो उसमें जनप्रतिनिधियों को गंभीरता से चिंतन करने की हिस्सा लेने की जरूरत है दुख इस बात से होती है कि 10000 आदिवासियों से बात करने डिप्टी कलेक्टर को भेज दिया जाता है जो खत जो खदान अबूझमाड़ से लगा हुआ है श्री नेताम ने बस्तर के अधिकांश ग्राम सभा को फर्जी बताया और कहा कि शासन प्रशासन के माध्यम से ही ग्रामसभा फर्जी होगा तो न्याय कहां से मिलेगा यह बड़ा सवाल है यही नारायणपुर में हुआ है पेशा कानून बने 30 साल हो गया क्या प्रशासन को पता नहीं है कि ग्रामसभा कराना है संविधान की व्यवस्था असली कानून है ना की जनसुनवाई।

अरविंद नेताम, पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं आदिवासी महापंचायत संरक्षक


विधायक एवं वीर मेला आयोजन समिति के अध्यक्ष शिशुपाल सॉरी ने कहा कि यह वीरभूमि है यहीं पर आदिवासी ने हद वासियों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज बुलंद की थी आदिवासी समाज में आदिवासी जो समस्याएं व्याप्त है जो संस्कृति विलुप्त हो रही है बस्तर में जो तनाव। उन्होंने आदिवासियों की समस्याओं के संबंध में बताया कि एक केंद्रीय स्तर से संबंधित समस्या है दूसरा राज्य स्तर से संबंधित समस्या और तीसरा है स्थानीय स्तर की समस्याएं हैं जो कलेक्टरों के अधीन है सरकार अभी सही दिशा में चल रही है सरकार आती जाती रहती है किंतु वर्तमान सरकार की जो कमिटमेंट है मैं सरकार में मैन्युफैक्चरिंग कमेटी में सदस्य था पांचवी अनुसूची एवं पेशा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन का सूत्रपात भी इसी वीर मेला से हुई है सन 1995 96 से ऐसा कानून बना क्रिया अमन क्यों नहीं हुआ एकता को लागू करने नियम बनता है कैसे संबंध में होगा सरकार ने समाज से समस्याएं एवं उसके निराकरण के सुझाव मांगे हैं सरकार सर्वाधिक पीड़ितों से स्वयं बात करेगी आदिवासी इलाकों में जो अन्य समाज के लोग भी हैं जो वर्षों से रह रहे हैं वन अधिकार कानून लागू होगा भले ही सरकार की ताकत कम।

शिशुपाल सोरी, अध्यक्ष वीर मेला समिति राजाराव पठार व विधायक


आबकारी मंत्री कवासी लखमा ने आदिवासी संस्कृति आदिवासी मड़ाई मेला घोटुल प्रथा के संबंध में कहा कि इस वीर मेला में देवपूजन के बाद हमारे आदिवासी अंचल में मड़ई मेला की शुरुआत होती है।  वह चाहे नारायणपुर का मेला हो, सुकमा का मेला हो, बीजापुर का मेला मेला हो, नरहरपुर का मेला हो, पूरे देश में एक ही समाज है, आदिवासी समाज।  जिनकी संस्कृति, सभ्यता सदियों से रही है। बस्तर में जो आदिवासी लोक नृत्य है, गायन में सबसे आगे आदिवासी समाज के लोग हैं। भले काम धंधा में  पीछे हैं, व्यापार में पीछे हैं, बहुत चीजों में पीछे हैं, लेकिन लोक संस्कृति, लोक सभ्यता को बचाए रखने में सबसे आगे हैं। आदिवासी समाज के लोग मड़ई मेला, मुर्गा बाजार जाना पसंद करते हैं। आदिवासी समाज के लोग लड़ाई करने में भी आगे हैं। हमारे पूर्वज शहीद गुंडाधुर, शहीद बिरसा मुंडा से लेकर शहीद वीर नारायण सिंह जैसे योद्धा रहे हैं, लेकिन आज लड़ाई  हम किससे कर रहे हैं। आदिवासी, आदिवासी ही लड़ रहे हैं। जिसमें सिर्फ आदिवासी ही मर रहे हैं। चाहे प्रदेश में किसी की भी सरकार रही हो। बस्तर में सलवा जुडूम के समय सुकमा, बीजापुर,  दंतेवाड़ा जिला के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए है और आंध्र तेलंगाना में पलायन कर गए है उनकी वापसी के लिए भी समाज का प्रयास है। इस ओर सरकार से भी चर्चा चल रही है।

कवासी लखमा, आबकारी मंत्री एवं आदिवासी नेता


आदिवासी समाज की समस्याएं

  • वीर मेला समिति राजा राव पठार द्वारा 9 दिसंबर 2020 बुधवार को  संरक्षक अरविंद नेताम की अध्यक्षता में समाज के सम्मानीय पदाधिकारियों एवं समाज प्रमुखों की उपस्थिति में महापंचायत आहूत की गई। जिसमें निम्नानुसार निर्णय लेते हुए पूर्व वर्ष  लिए गए निर्णय पर भी चर्चा कर प्रस्ताव पारित किया गया जो निम्नानुसार है-
  • पेसा कानून पर विस्तार से चर्चा कर महापंचायत द्वारा निर्णय लिया गया कि 10 जनवरी 2021 को रायपुर में बैठक आयोजित कर छत्तीसगढ़ शासन को पेसा कानून ड्राफ्ट को पारित कराने हेतु सौंपा जावेगा।
  • राष्ट्रीय जनगणना 2021 में आदिवासी धर्म कालम के मांग हेतु सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया।
  • राम वन गमन पथ रैली का विरोध पूरे प्रदेश स्तर पर किए जाने का निर्णय लेते हुए ग्राम पंचायत के प्रतिनिधियों एवं ग्राम वासियों को अवगत कराने राम वन गमन रैली को अपने अपने गांव में प्रवेश न दिया जावे और अपने ग्राम का मिट्टी ना ले जाने देने हेतु निर्णय लिया गया। साथ ही इसकी सूचना सभी जिला अध्यक्षों को सूचना पत्र के माध्यम से दिया जावे।
  • पाटेश्वर धाम तूवेगोंदी ग्राम पंचायत तुमड़ीकसा विकासखंड डौंडीलोहारा जिला बालोद से प्राप्त आवेदन पर चर्चा करते हुए महापंचायत में निर्णय लिया गया कि प्रदेश स्तरीय सर्व आदिवासी समाज का अगला बैठक पाटेश्वर धाम तूवेगोंदी में आहूत किया जावे। साथ ही डीएफओ बालोद के द्वारा पाटेश्वर धाम में किए गए अवैध कब्जा के खिलाफ जो वैधानिक कार्य किया गया है। उसकी महापंचायत द्वारा भूरी- भूरी प्रशंसा करते हुए उनके स्थानांतरण रोके जाने हेतु उच्चाधिकारियों को अनुरोध करने का निर्णय लिया गया।
  • नक्सल पीड़ित परिवारों से प्राप्त आवेदन पर चर्चा करते हुए महापंचायत द्वारा तय किया गया कि नक्सल पीड़ितों के व्यवस्थापन करने हेतु भूमि प्रदान करने तथा नक्सल उत्पीड़न के निराकरण हेतु जगदलपुर में फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापना प्रारंभ करने की मांग किया जावे। इस हेतु शासन से सर्व आदिवासी समाज द्वारा मांग पत्र दिए जाने का फैसला हुआ है।
  • कुकरेल विकासखंड के संबंध में.नगरी तहसील के कुकरेल को तहसील का दर्जा दिए जाने का प्रस्ताव शासन द्वारा है जिसे तहसील बनाने में समाज को कोई परेशानी नहीं है, लेकिन उसे विकासखंड ना बनाया जाए। जिससे आदिवासी परिवार को क्षति हो। क्योंकि यह क्षेत्र पांचवी अनुसूची के अंतर्गत है। इसमें उप तहसील कुकरेल में मगरलोड ब्लाक का हल्का नंबर विलुप्त कर धमतरी तहसील का हल्का नंबर एवं मगरलोड का ट्राइबल क्षेत्र सिंगपुर को जोड़ें जाने का अनुरोध महापंचायत छत्तीसगढ़ शासन से करेगी।
  • नगरीय क्षेत्रों में जमीन पट्टा के नाम से राशि वसूली के विरोध में- छत्तीसगढ़ में पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में संचालित नगरी प्रशासन, नगर पंचायत / नगर पालिका/  नगर निगम में शासकीय जमीन का पट्टा देने के नाम पर कई वर्षों से निवासरत आदिवासियों से शुल्क वसूली की जा रही है। जो कि असंवैधानिक है। चूंकि प्रदेश के 37 नगरीय निकाय क्षेत्रों में संविधान के अनुच्छेद 243 (य)(ग) के तहत असंवैधानिक रूप से संचालित है। ऐसे में उन स्थानों पर पट्टा के नाम पर शुल्क वसूली गैरकानूनी है। महापंचायत द्वारा सर्वसम्मति से इस पर तत्काल समीक्षा करते हुए रोक लगाने की राज्य शासन से मांग करने का निर्णय लिया गया है।
  • आदिवासी महापंचायत में गत वर्ष 2019 में सर्वसम्मति से आदिवासी समाज के द्वारा 46 बिंदुओं पर लिए गए प्रस्ताव के संबंध में शासन को मांग पत्र दिया गया था। जिस पर अभी तक शासन प्रशासन के द्वारा कोई सार्थक कार्यवाही नहीं किया गया है। जिससे समाज में असंतोष व्याप्त है तथा यह भी कहा गया है कि समाज के प्रतिनिधि मंडल के द्वारा इस वर्ष2020 महापंचायत द्वारा लिए गए निर्णय एवं 2019 महापंचायत के  46 सूत्रीय मांग को शासन प्रशासन को पुनः अवगत कराया जावे। मांग नहीं सुनने पर सर्व आदिवासी समाज कठोर निर्णय लेकर आंदोलन करने के लिए बाध्य होगा। जिसकी जिम्मेदारी शासन प्रशासन की होगी।
  • महापंचायत द्वारा गंभीर चिंता व्यक्त की गई,  कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर शासकीय सेवा करने वालों के खिलाफ कार्यवाही हेतु न्यायालय स्तर पर जो कार्रवाई हो रही है, वह पर्याप्त नहीं है। इसके लिए समाज की ओर से इंटर विनर( थर्ड पार्टी) बनकर कोर्ट में सभी प्रकरणों पर अधिवक्ता नियुक्त करने और सरकार को सलाह देने के लिए जानकर व्यक्तियों को नियुक्त करने का निर्णय लिया गया।
  • नक्सल समस्या का स्थाई समाधान हेतु शांति वार्ता के संबंध में चर्चा हुई जिसमें बस्तर में नक्सल समस्या का स्थाई समाधान हेतु विस्तृत चर्चा कर अरविंद नेताम (पूर्व केंद्रीय मंत्री)  को महापंचायत द्वारा जिम्मेदारी सौंपी गई। यहां पंचायत ने सर्वसम्मति से निर्णय लेते हुए नक्सलियों और सरकार के बीच चर्चा हेतु स्थाई समाधान के लिए माननीय नेताम जी के नेतृत्व में कमेटी गठित कर तत्काल पहल शुरू की जावे। जिससे नक्सली के नाम पर मरने वाले निर्दोष आदिवासियों को बचाकर देश की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके।
  • लोगों की आस्था लगातार वीर मेला के प्रति बढ़ रहा है। इसलिए वीर मेला क्षेत्र राजाराव पठार के विकास हेतु मांग पत्र शासन प्रशासन को भेजा जावे।
  • शासन प्रशासन से वार्ता हेतु समिति गठित की गई जिसमें अरविंद नेताम, सोहन पोटाई, नवल सिंह नेताम,  बीएस रावटे, विनोद नागवंशी, प्रकाश ठाकुर एवं प्रदेश के अन्य गणमान्य समाज प्रमुखों को भी सम्मिलित करने का निर्णय लिया गया।
  • छत्तीसगढ़ में पांचवी अनुसूची प्रकोष्ट का गठन किया जाये। जिसके माध्यम से  मुख्यमंत्री द्वारा विशेष रूप से पेसा कानून वन अधिकारों की मान्यता अधिनियम तथा जनजाति उप योजना (TSP) की प्रत्येक माह में समीक्षा हो।
  • पांचवी अनुसूची क्षेत्र में नगरीय निकायों को जो कि संविधान के अनुछेद 243 (यग) के अंतर्गत असंवेधानिक है ,को पेसा कानून बनने तक तत्काल भंग किया जाये तथा ऐसे क्षेत्रों को ग्राम पंचायत में पुनः परिवर्तित कर पेसा कानून के अंतर्गत लाया जाये साथ ही ऐसे क्षेत्रों में गैर अनुसूचित वर्ग को हस्तांतरित सभी भूमि को अनुसूचित जनजाति वर्ग को वापस की जाये।
  • राज्य में काफी सारे अधिकारी जाति प्रमाण पत्र जांच में फर्जी पाए जाने के बाद भी पद पर बने हुए है। ऐसे लोगो को तत्काल सेवा से मुक्त करते हुए कानूनी कार्यवाही की जाये।
  • अनुसूचित क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति वर्ग की किसी भी भूमि को जिला के कलेक्टर अथवा अन्य कोई अधिकारी द्वारा गैर अनुसूचित वर्ग को हस्तांतरित की गयी है उसकी जांच करवाई जाये तथा ऐसी भूमि भू-राजस्व संहिता की धारा 170 (ख)(2-क) के अनुसार वापस की जाये।
  • ग्राम सभा को पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में एक निगमित निकाय का दर्जा देते हुए स्वयं का बैंक खाता संचालित करने की व्यवस्था दी जाये।
  • अनुसूचित क्षेत्रों में नगरी विकासखंड के जैसे मोहल्ला, मजरा, टोला, पारा स्तर पर ग्राम सभा का गठन किया जाए।
  • अनुसूचित क्षेत्र में सभी गौण खनिज के विदोहन का अधिकार अनिवार्य रूप से ग्राम सभा अथवा ग्राम सभा की सहमति उपरांत अनसूचित जनजाति की ही सहकारी समिति को दिया जाये।
  • सभी गौण वनोपज, जिसमे बांस भी शामिल है, का मालिकाना हक ग्राम सभा को दिया जाये जिसमे वन विभाग एवं लघु वनोपज सहकारी समिति का कोई भी हस्तक्षेप न हो।
  • अनुसूचित क्षेत्र में, विशेष कर के नगरीय क्षेत्रों में, किसी भी तरह के ब्याज पर लेन-देन की प्रक्रिया को नियंत्रित किया जाये। अनुसूचित क्षेत्र में किसी भी तरह का ऋण ग्राम सभा की अनुमति के बाद ही दिया जाए।
  • वन विभाग द्वारा अपने वन मंडल अनुसार जो कार्य योजना (वर्किंग प्लान) बनाया गया है जिसके अनुसार अगले 10 वर्ष में जिस भी गाँव के जंगल में कूप कटाई की जानी है उसके लिए वृक्षों का चिन्हांकन (मार्किंग) करने से पहले तथा वृक्षों की कटाई शुरू करने से पहले पेसा कानून और वन अधिकार मान्यता कानून के अनुसार ग्राम सभा का अनुमोदन लिया जावे।साथ ही ऐसी कूप कटाई से प्राप्त लकड़ी की नीलामी से होने वाली आय की राशि, जो अभी मात्र 20 प्रतिशत है, को पूरा 100 प्रतिशत ग्राम सभा को हस्तांतरित की जावे जो की वन अधिकार मान्यता कानून 2006 के नियम 4 (1)(f) केअंतर्गत गठित समिति के नियंत्रण में हो।
  • सम्पूर्ण पांचवी अनुसूची क्षेत्र में वन अधिकार मान्यता अधिनियम 2006 के अंतर्गत सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (Community Forest Resource Rights) तथा सामुदायिक अधिकार (Community Rights) दिए जाये तथा उसके अनुसार राजस्व तथा वन विभाग के बंदोबस्त तथा निस्तार रिकॉर्ड दुरुस्त किये जाये।
  • वन ग्राम को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने की प्रक्रिया युद्ध स्तर पर पूर्ण करवाई जाये।
  • टाइगर रिज़र्व क्षेत्र में जहाँ पर अनुसूचित जनजाति की बाहुल्यता है, जिसमे सीतानदी- उदंती, इन्द्रावती एवं भोरमदेव अभ्यारण्य क्षेत्र भी शामिल है, से गावों के विस्थापन पर पूर्णतः रोक लगाई जाये।साथ ही सीतानदी-उदंती बाघ अभ्यारण्य क्षेत्रों के 34 गाँव का विस्थापन निरस्त किया जाए।
  • अनुसूचित क्षेत्रों से किसी भी अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति को विस्थापित करने से पहले ग्राम सभा से अनिवार्य रूप से अनुमति ली जावे एवं विकास कार्यो के लिए किसी को विस्थापित न किया जावे।
  • सलवा जुडूम के समय बस्तर से विस्थापित लोग जो आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र तथा ओडिशा में निवासरत है उन्हें वापस लाने हेतु ठोस प्रयास किये जाए तथा इसके लिए स्थानीय आदिवासी व्यक्तियों की ही उच्च अधिकार प्राप्त समिति बनायी जाए जो इस हेतु कार्य को समन्वित करे।
  • वन अधिकार मान्यता अधिनियम 2006 के अंतर्गत मान्य की गयी कोई भी व्यक्तिगत वन अधिकार की भूमि अगर शासन द्वारा अधिग्रहित की जाती है तो उसका राजस्व भूमि की तरह ही अनिवार्यतः उचित मुआवजा दिए जाने हेतु प्रावधान किया जाए।
  • राज्य शासन द्वारा आदिवासी व्यक्तियों के खिलाफ चल रहे  न्यायिक प्रकरणों की जांच के लिए बनायीं गयी माननीय पटनायक समिति में अनुसूचित जनजाति के समाजिक प्रमुखों को भी शामिल किया जाए।
  • National Mineral Development Corporation (NMDC) द्वारा संचालित बैलाडीला की खदान से लौह अयस्क का परिवहन सिर्फ रेल मार्ग से किया जाए तथा ट्रक तथा अन्य मार्ग से परिवहन पूर्णतः प्रतिबंधित किया जाए।
  • बैलाडीला लौह अयस्क के निक्षेप क्रमांक 13 एवं अन्य निक्षेपों का संचालन सीधे तौर परNMDC तथा CMDC द्वारा किया जाये। Mine-Developer-cum-Operator (MDO) से कोई भी कार्य किसी भी निक्षेप में नहीं करवाया जाये।
  • NMDC का मुख्यालय हैदराबाद से बस्तर में स्थानांतरित किया जाए।
  • अनुसूचित क्षेत्र में सभी तरह के बड़े खनिज, जैसे कोयला तथा लौह अयस्क, के खनन को किसी भी तरह से निजी हाथों में दिए जाने पर पूर्णतः रोक लगायी जावे। अनुसूचित क्षेत्र में सभी खनिज खदान सिर्फ शासकीय निकायों अथवा अनुसूचित जनजाति द्वारा संचालित निकायों के माध्यम से किये जाए. नगरनार इस्पात सयंत्र का निजीकरण किसी भी हाल में न हो।
  • बड़ी खनन परियोजनाओ जैसे लौह अयस्क, कोयला, इत्यादि की बिक्री से प्राप्त होने वाले मुनाफे की राशि, भूरिया समिति की अनुशंसा अनुसार 26 प्रतिशत निवेशकर्ताओं, 50 प्रतिशत ग्राम सभा एवं 24 प्रतिशत परियोजना से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित व्यक्ति कोसीधे हस्तांतरित किये जाए।
  • अनुसूचित क्षेत्रों में कोई भी परियोजना, जिसमे बाँध और खनन परियोजना शामिल है ,को शुरू करने से पहले उससे प्रभावित होने वाली प्रत्येक ग्राम सभा से सहमति ली जाएतथा कोई भी नयी परियोजना तभी शुरू की जावे जब पूर्व में संचालित परियोजना सेलाभ ले पाना संभव नहीं हो।उदहारण हेतु रावघाट परियोजना से खनन शुरू करने से पहले बैलाडीला की खदान से भिलाई इस्पात सयंत्र को आपूर्ति सुनिश्चित किया जाए।
  • अनुसूचित जनजाति, विशेष कर विशेष पिछड़ी जनजाति समूह (PVTG), के बैकलॉग के पदों पर भर्ती जल्द से जल्द पूर्ण की जावे।
  • राज्य के आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग में सभी पद अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति तथा अन्य पिछडा वर्ग के व्यक्तियों के लिए ही आरक्षित रखे जाये।
  • अबूझमाड़ में पूर्व की तरह इनर लाइन परमिट लागू किया जाये तथा बाहरी व्यक्तियों के वहां पर प्रवेश को नियंत्रित करने के लिए संविधान सम्मत कानून बनाया जाये।
  • राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों में बसाये गए बांग्लादेशी शरणार्थियों को गैर अनुसूचित क्षेत्रों में बसाया जाये तथा अवैध रूप से आये घुसपैठियों को चिन्हांकित कर उन्हें उनके मूल देश वापस भेजा जाये तथा उनके कब्जे की जमीन को अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों को वापस सौंपा जाए।
  • राज्य के सुकमा तथा बीजापुर जिला को प्रभावित करने वाले पोलावरम बाँध की ऊँचाई सीमित रखी जाए जिससे सुकमा तथा बीजापुर जिले का कोई भी गाँव इसके डूबान क्षेत्र में न आये।
  • अनसूचित क्षेत्रों के जनपद तथा जिला पंचायत में ऐसे अनुसूचित जनजाति वर्ग के सदस्यों का नामांकन किया जाए जिनका उस स्तर पर कोई प्रतिनिधित्व न हो। इस हेतु प्रक्रिया बना कर अधिसूचित किया जाए।
  • राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों में कार्यरत सभी स्वयं सेवी संस्थाओं (NGO) की समीक्षा की जावे तथा फर्जी कार्य करने वाले संस्थाओं का पंजीकरण ग्राम सभा की अनुशंसा से रद्द किया जावे।
  • जशपुर, सरगुजा, सूरजपुर तथा बलरामपुर से महिलाओं की तस्करी रोकने हेतु ठोस कदम उठाये जाए तथा गाँव के किसी भी व्यक्ति को किसी भी कार्य के लिए गाँव से बाहर ले जाने के पूर्व ग्राम सभा की अनुमति लेना अनिवार्य की जावे।
  • आन्ध्र प्रदेश की तरह अनुसूचित क्षेत्रों में सभी शासकीय पद सिर्फ अनुसूचित क्षेत्र के अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों के लिए आरक्षित किये जाए।
  • अनुसूचित क्षेत्रों में विशेष रूप से प्राथमिक एवं माध्यमिक शालाओं में सिर्फ अनुसूचित जनजाति वर्ग के ही शिक्षक रखे जाए।
  • राज्य में अनुसूचित जनजाति के लिए संचालित आश्रम शालाओ, एकलव्य विद्यालयों एवं कन्या शिक्षा परिसरों में आदिवासियों की स्थानीय बोली-भाषा, संस्कृति एवं परंपरा अनुसार शिक्षा प्रदान की जाए एवं उनकी गुणवत्ता नवोदय विद्यालय के समकक्ष करने हेतु समीक्षा की जाये।
  • सभी खेल परिषदों में धनुर्विद्या को अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया जाए।
  • बस्तर में शान्ति, सुशासन, प्रशासन और नियंत्रण के लिए दुर्गम और पर्वतीय अंचल के बच्चो को केशकाल के पास मारी क्षेत्र के चिन्हित स्थानों में सीबीएसई कोर्स से KG 1 से PG तक उनकी बोली-भाषा, संस्कृति के साथ आवासीय शिक्षा सुविधा सुलभ करवाई जाए।
  • सभी कन्या आश्रम एवं छात्रावास में सुरक्षा एवं साप्ताहिक जांच हेतु पर्याप्त प्रबंध किये जाए जिससे झालियामारी जैसे भयावह कांड की पुनरावृति रोकी जा सके। इस हेतु कन्या आश्रम एवं छात्रावास में अनिवार्य रूप से अनुसूचित जनजाति के ही महिला अधीक्षक एवं होम गार्ड की नियुक्ति की जावे।
  • एकीकृत आदिवासी विकास परियोजना (ITDP) के प्रशासक के रूप में IAS अधिकारीयों की नियुक्ति की जावे।
  • आदिवासी इतिहास, कला एवं संस्कृति तथा विशेष रूप से पिछड़ी जनजाति (PVTG) के बारे में जानकारी स्कूल के पाठ्य पुस्तक में सम्मिलित की जावे।
  • जनजातिय सलाहकार परिषद् (TAC) की बैठक हर तीन माह में अनिवार्यतः आयोजित की जावे।
  • छत्तीसगढ़ राज्य जनजाति, संस्कृति तथा भाषा आकादमी का गठन तत्काल किया जावे।
  • बस्तर विश्वविद्यालय को केंद्रीय आदिम जनजाति विश्वविद्यालय का दर्जा दिलवाने हेतु पुनः प्रयास किया जाए।
  • बस्तर जिले की अमरीत भतरा जनजाति को भतरा जनजाति की सूची में शामिल किया जाए।
  • पांचवी अनुसूची क्षेत्र में ऐसे सभी गैर-अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों की जांच करवाई जाए जो अनुसूचित जनजाति की महिला को रख कर के अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ कर पद में आसीन है। ऐसे व्यक्तियों पर आत्याचार निवारण अधिनियम तथा धोखाधडी का मामला दर्ज कर एवं ऐसे व्यक्तियों के चुनाव की कार्यवाही संपन्न करवाने वाले अधिकारियों पर दंडात्मक एवं सेवा से पृथक करने की कार्यवाही की जाए।

वीर मेला राजाराव पठार महापंचायत 9 दिसंबर 2019 को पारित किया गया था (आर एन ध्रुव)


वीर मेला में उपस्थित आदिवासी समाज के , एवं छत्तीसगढ़ शासन के नेताओं में अनिला भेड़िया (मंत्री छत्तीसगढ़ शासन) अमर सिंह भगत (मंत्री छत्तीसगढ़ शासन), कवासी लखमा (मंत्री छत्तीसगढ़ शासन), मोहन मंडावी (सांसद)  अरविन्द नेताम (पूर्व केंद्रीय मंत्री), सोहन पोटाई (पूर्व सांसद), मोहन मरकाम (विधायक कोण्डागांव), अनूप नाग (विधायक अंतागढ़), शिशुपाल सोरी (विधायक कांकेर), इंद्रशाह मंडावी ( मोहला मानपुर), जी आर राना, बीएस रावटे, आर एन ध्रुव, सोनऊ राम नेताम, विनोद नागवंशी, शंकर लाल उइके, चंद्रीका प्रसाद, यू आर गंगराले, गजानंद प्रभाकर, जीवराखन लाल मरई, रमाकांत दर्रो, कमलकांत सोरी, सुमेर सिंह नाग, कुशल ठाकुर, केश कुमार ठाकुर, भागीरथी नागवंशी, कुलेश्वरी गावड़े, प्रभात ध्रुव, फूलो देवी नेताम (राज्य सभा सदस्य), जयलक्ष्मी ठाकुर, कमला नेताम, लक्ष्मी ध्रुव (विधायक सिहावा), कांति नाग, चंद्रप्रभा सुधाकर, सुभद्रा नेताम, संगीता सिंहा (संजारी बालोद), रंजना साहू (विधायक धमतरी), कुंवर सिंह निषाद (विधायक गुण्डरदेही), मीना साहू सहित अन्य पदाधिकारीगण शरीक हुए। 


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