सम्मान या अपमान: दलित पहचान में फंसा बहुत बारीक तरीका में बात
नाम के साथ जुड़ा हुआ जातिवाचक सरनेम हटाने का
बुद्धिलाल पाल/शरद कोकाससाहित्य में किसी के जन्मदिन पर किसी को दलित साहित्यकार, आदिवासी, स्त्री, मुस्लिम, ईसाई, हिंदू साहित्यकार, ठाकुर, यादव, ब्राह्मण साहित्यकार आदि के रूप में याद न किया जाकर उसे मनुष्य के रूप में याद किया जाए तो कितनी अच्छी बात हो। विश्वास करो साथी जब हम ऐसा कर उस व्यक्ति को बधाई देते हैं। हम उस दिन ऐसा कर उसे संकुचित दायरे के भीतर फिट कर देते हैं। मेरी बात पर यह प्रश्न तो उठता है कि क्या उसे देवता बनाकर याद किया जाए? ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए कोई भी जाति धर्म से या साहित्य से कोई व्यक्ति देवता नहीं होता है।

कपूर वासनिक से मेरा कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं है। न ही चेहरा देखा हूं। आज उनका जन्मदिन हैं उन्हें ह्रदय से जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं। वह इसलिए कि मैंने जो फेसबुक से और मित्रों से जाना है पुस्तक संस्कृति को बढ़ाने में उनका अच्छा खासा योगदान है। जो कि हम फेसबुक से भी यह बात जानते हैं। इसलिए उनके प्रति अलग किस्म का सम्मान है।
पर आज के दिन शरद कोकास द्वारा उनकी जन्मदिन की पोस्ट लगाई गई उसे पढक़र देखकर बहुत हैरानी हुई। शरद ने बधाई देने में कपूर वासनिक को दलित होने का अहसास अपनी पोस्ट में दिलवा ही दिया है। अपने को इस तरह प्रस्तुत किया है जैसे वह सवर्ण में ब्राम्हण हो उसी भाषा शैली में उसे बधाई दी गई है। यह तरीका यह प्रस्तुति इस तरह से बधाई देना निंदनीय काम है।
यह निर्लज्जता है ब्राम्हणवादी शातिर तरीका है। किसी की बड़ाई करो और ऐसे समय में उसे दलित होने का अहसास कराकर अपने को उच्च होते हुए प्रगतिशील बताकर अपने को और थोड़ा बड़ा कर लो। लज्जा आनी चाहिए। शरद वैज्ञानिक समझ होने के दावा में अपने को उच्च वर्ण होने के रूप में होने जैसा और देखो मैं दंभ छोड़ता हुआ उच्च जाति का प्रगतिशील व्यक्ति हूं जैसा करता हुआ होता है। इसमें लज्जा नहीं आती है भाई जाति से बढ़ई कारपेंटर हो उसके साथ कोकास, तिवारी, चौबे, चतुर्वेदी आदि लिख लेने से कोई ब्राम्हण नहीं हो जाता है।
ऐसी इतनी अति तो बधाई में ब्राह्मण भी नहीं करता होगा। वैसे किसी ओबीसी को चुल उठती हैं तो वह अपने को उच्च जाति का सा दर्शाता हुआ ब्राम्हणवादी तरीका में ब्राह्मणों को भी मात देता हुआ होता है। इस बधाई में शरद कोकास ने यही किया है। भाई काहे को अपने को प्रगतिशील मनोवैज्ञानिक, मनोविज्ञानी, विज्ञान का इतिहास वाला होने का दावा करते हो।
मनोविज्ञान एवं विज्ञान के पैर इस तरह की पोस्ट जैसे नहीं होते हैं। आदमी के गिरने के शातिर होने के पैर ही इस तरह के होते हैं। वैसे मेरी यह पोस्ट पढऩे वाले साथियों यह नहीं कहना कि उसकी पोस्ट में उसने कहां उसे दलित लिखा है। तो वह इस तरह है पोस्ट में वह अपनी बात करते हुए उसकी बात करता है तो उसमें स्वत: ही ऐसा स्पष्ट अर्थ है। ऐसी ही प्रवंचना है। मेरा मतलब किसी के ओबीसी ब्राह्मण दलित आदि से नहीं है। वह कोई भी हो किसी को बधाई देते समय या अन्य कोई जगह इस तरह नहीं होना चाहिए।
बुद्धिलाल पाल
‘70 के दशक में एक आंदोलन चला था अपने नाम के साथ जुड़ा हुआ जातिवाचक सरनेम हटाने का। मैं भी बहुत दिनों तक अपना नाम शरद जगमोहन लिखता रहा।
उन्हीं दिनों हमारे एक दोस्त हुए जो मराठी के बड़े अच्छे कवि हैं उनका नाम तो है कपूर वासनिक लेकिन वे ‘डब्लू कपूर’ के नाम से मराठी में कविताएं लिखते हैं।
कपूर से मेरी मुलाकात 1987 में ब्रह्मपुरी महाराष्ट्र में दलित साहित्य सम्मेलन में हुई। उस वक्त तो वह दोस्ती परवान नहीं चढ़ी लेकिन फिर धीरे-धीरे हम लोगों की मुलाकातें बढ़ती गई। कपूर वासनिक बिलासपुर में रहते हैं उस वक्त बैंक ऑफ महाराष्ट्र में नौकरी करते थे और मैं स्टेट बैंक में।
थोड़ा बहुत मराठी में लिखना मैंने भी शुरू किया था। फिर हम लोगों ने यहां पर छत्तीसगढ़ मराठी साहित्य परिषद की शुरुआत की। मित्र कपूर के साथ अनेक यात्राएं भी की सोलापुर पुणे कर्नाटक हंपी आदि।
यह तो मेरे व्यक्तिगत परिचय की बात हो गई लेकिन वास्तव में कपूर वासनिक बहुत अच्छे कवि हैं, संगठक हैं, वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष हैं।
और सबसे अच्छी बात यह है कि इन्होंने पूरे छत्तीसगढ़ में लोगों को पढऩे का संस्कार उत्पन्न किया है। पिछले 40 वर्षों से यह पुस्तकें और पत्रिकाएं मंगवाते हैं और लोगों को देते हैं।
एक समय था जब वे साइकिल से घर-घर जाकर लोगों को पुस्तकें व पत्रिकाएं दिया करते थे। आज इनका साहित्य प्रसार केंद्र बहुत मशहूर है आपको कोई भी पत्रिका या कोई भी पुस्तक चाहिए तो बस आप इन्हें फोन कर दें पुस्तक आपके घर बैठे मिल जाएगी।
भाई कपूर वासनिक को जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं। लोगों में पढऩे की रुचि पैदा करने का काम और उनका लेखन निरंतर चलता रहे।’
शरद कोकास
साहित्य में किसी के जन्मदिन पर किसी को दलित साहित्यकार, आदिवासी, स्त्री, मुस्लिम, ईसाई, हिंदू साहित्यकार ठाकुर,यादव, ब्राह्मण साहित्यकार आदि के रूप में याद न किया जाकर उसे मनुष्य के रूप में याद किया जाए तो कितनी अच्छी बात हो। विश्वास करो साथी जब हम ऐसा कर उस व्यक्ति को बधाई देते हैं। हम उस दिन ऐसा कर उसे संकुचित दायरे के भीतर फिट कर देते हैं। मेरी बात पर यह प्रश्न तो उठता है कि क्या उसे देवता बनाकर याद किया जाए?
ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए कोई भी जाति धर्म से या साहित्य से कोई व्यक्ति देवता नहीं होता है। वह भी मनुष्य रहा होता हैं अच्छाई के साथ उसकी भी कुछ कमी बेशी होती है उसी तरह याद किया जाए तो वह अच्छी बात है। देवता के रूप में किसी को याद किया जाना तो वह और भी सबसे बुरी बात है।
भाई मनुष्य हो तो किसी के जन्म दिन पर साहित्य में ऐसा कर कि दलित मित्र स्त्री मित्र यादव मित्र ब्राह्मण मित्र मुस्लिम मित्र हिंदू मित्र के रूप में उकेरकर उसे जन्मदिन की बधाई देना साहित्य में निंदनीय होना चाहिए। दूसरी तरह की अन्य बात में दिल नहीं मानता है कसीदा पढ़ते ही बधाई देना है तो वैसा ही कर दें। पर ऐसा तो नहीं करना चाहिए। दलित साहित्यकार को स्त्री साहित्यकार को भी जन्मदिन के दिन आपस में ऐसे संबोधन से बधाई नहीं देना चाहिए हां किसी परंपरा से जोडक़र बधाई दें तब वह अलग बात।
बुद्धिलाल पाल
सोशल मीडिया में जन्मदिन के अवसर पर दलित ब्राह्मण विमर्श पर आधारित गंभीर चर्चा।
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