एक पटवारी की व्यथा
ट्रेनिंग में भी जाएंगे और आरआई बन जाएंगे
संजीव खुदशाहयह कहानी उन पटवारियों की है जो छत्तीसगढ़ में मध्य प्रदेश के समय यानी की साल 2000 के आसपास नियुक्त हुए। इन्हें लगता था की हर साल में राजस्व निरीक्षक के होने वाले ट्रेनिंग में भी जाएंगे और आरआई बन जाएंगे। वरिष्ठ पटवारी से वे ज्यादा शिक्षित और सक्रिय थे।

मैं यहां बताना चाहूंगा कि वर्ष 1996 यानी संयुक्त मध्य प्रदेश के शासनकाल में राजस्व निरीक्षक की आखिरी ट्रेनिंग हुई थी। उस समय राजस्व निरीक्षक बनने के लिए पटवारी में कम से कम 7 वर्ष की सेवा पूर्ण करने की शर्त होती थी। साल 2000 में छत्तीसगढ़ बना और प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने यहां पर बंदोबस्त डिपार्टमेंट पूरी तरह से खत्म कर दिया।
पहले राजस्व विभाग का पूरा नाम भू अभिलेख और बंदोबस्त विभाग था। इस कारण उस समय बंदोबस्त विभाग में काम कर रहे आरआई एक्सेस हो गए। याने राजस्व निरीक्षक की संख्या स्वीकृत पद के तुलना में तीन से चार गुना हो गई। इस कारण करीब 15 से 20 साल के दरमियान पटवारी से आरआई का कोई एग्जाम नहीं हुआ। न ही कोई प्रमोशन हुआ।
शासन प्रशासन में यह भी चर्चा चल रही थी कि आरआई की कोई जरूरत नहीं है। पटवारी सीधे तहसीलदार को रिपोर्ट करेंगे। यानी राजस्व निरीक्षक को डाईंग केडर बनाने की योजना चल रही थी।
वरिष्ठ पटवारी ने अपने आप को फील्ड में खपा दिया और यह कब कनिष्ठ से वरिष्ठ बन गए पता भी नहीं चला। आज जब कोई पूछता है कि तुम्हारा प्रमोशन क्यों नहीं हुआ? तो जैसे तन-बदन में आग लग जाती है। इसी बीच यह अफवाह फैलाई गई की पटवारी तो प्रमोशन ही नहीं चाहता हैं।
लेकिन यह सफेद झूठ है। कुछ पटवारी हो सकते हैं जो निजी कारणों से प्रमोशन नहीं लेते, लेकिन ऐसा सभी पटवारी करते हैं ऐसा मानना गलत है। इस कारण छत्तीसगढ़ बनने के बाद पहली बार साल 2016 में परीक्षा हुई और ट्रेनिंग साल 2017 में शुरू हुई। जब परीक्षा हुई तो बहुत सारे लोग 20 से 30 साल नौकरी कर चुके थे।
इस परीक्षा में ज्यादातर नए पटवारी जो कि पीएससी या दूसरे एग्जाम की तैयारी कर रहे थे वही सफल हुए। पुराने पटवारी एक्का-दुक्का ही पास हो पाए और हर एग्जाम में लगभग ऐसी ही स्थिति बनी रही। यहां बताना जरूरी है कि साल 1996 के पहले पटवारी से राजस्व निरीक्षक प्रमोशन के लिए एग्जाम नहीं होता था।
हर साल प्रत्येक तहसील से दो पटवारी जो वरिष्ठ हो या इच्छुक हो उन्हें राजस्व निरीक्षक ट्रेनिंग में भेज दिया जाता था। बाद में जहां पर जरूरत होती वहां पर प्रमोशन करके इन्हें राजस्व निरीक्षक बना दिया जाता था। एग्जाम की परंपरा साल 2015 से शुरू हुई।
जैसा कि मैंने पहले बताया कि छत्तीसगढ़ में राजस्व निरीक्षक एक्सेस हो गए थे। इसके कारण पटवारी से राजस्व निरीक्षक में प्रमोशन तो नहीं हुआ साथ-साथ ऐसे लोग जो कि राजस्व निरीक्षक पद पर सीधे भर्ती हुए थे, उनका भी एएसएलआर या नायब तहसीलदार के लिए प्रमोशन नहीं हुआ।
हम लोगों ने उन राजस्व निरीक्षकों को राजस्व निरीक्षक पद पर ही रिटायर होते देखा हैं। कुछ राजस्व निरीक्षकों का प्रमोशन हुआ लेकिन वह भी रिटायरमेंट के समय। छत्तीसगढ़ में राजस्व विभाग के अधिकारी अपना प्रमोशन तो ले रहे थे लेकिन पटवारी राजस्व निरीक्षकों के प्रमोशन की फाइल लगभग बंद थी।
आज पटवारी में 20 साल के आसपास की सेवा कर चुके लोग इस पीड़ा को बेहतर समझ सकते हैं और अपने जीवन का संघर्ष कर रहे हैं। बावजूद इसके वे नए पटवारी को सरहाते हैं, उन्हें दुलार करते हैं, क्योंकि वह नहीं चाहते जो परेशानी उन्होंने झेला है नए पटवारी भी झेलें।
मुझे याद है उस दौरान जो पटवारी पद पर नियुक्त हुए उस समय पटवारियों की स्थिति बहुत खराब थी। तहसील में चेयर पर बैठकर मीटिंग लेना सपनों की बात थी। दरी में बैठाकर पटवारी आरआई की मीटिंग ली जाती थी। हम लोग उस समय नए-नए कंप्यूटर सीख कर आए थे, तो जमीन पर बैठकर इस तरह से काम करना अपमानजनक लगता था।
आज जिस प्रकार तहसीलदार एसडीएम, पटवारी को बराबर का सम्मान देते हैं चेयर में बैठाकर मीटिंग लेते हैं। पहले ऐसा नहीं होता था। यह सम्मान पाने के लिए पटवारी संघ ने बड़ा संघर्ष किया। वेतन पहले लिपिक से भी काम था। सुविधा नहीं मिलती थी।
लेकिन पुराने पटवारी का संघर्ष आज पटवारी को इस स्थिति में लाया हैं, इस तरह वह सम्मानजनक ढंग से काम कर सकते हैं। नहीं तो पहले कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति पटवारी नहीं बनना चाहता था। इसका पूरा श्रेय पटवारी संगठन और पुराने पटवारियों को जाता है जिन्होंने संघर्ष करके हमारे लिए यह सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई।
Add Comment