मिर्जा मसूद का जाना छत्तीसगढ़ में एक युग का है चले जाना

पत्रकारिता भी पढ़ाते थे

सुशान्त कुमार

 

उनके हिस्से में उन्होंने कई नाटक लिखे और उनका निर्देशन भी किया। छत्तीसगढ़ राज्य शासन का चक्रधर सम्मान और चिन्हारी सम्मान सहित दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में भी विशेष सम्मान प्राप्त मिर्जा मसूद 80 साल की उम्र पार करने के बाद भी वे थियेटर के लिए समर्पित रहे। कई नाटक लिखे और उनका निर्देशन भी किया।

नाटकों की लंबी फेहरिस्त

मिर्जा मसूद की देखरेख में ही जहाज़ फूट गया है, जंगीराम की हवेली, जुलूस, बकरी, जिन लाहौर नई वेख्या, जांच पड़ताल, कालिगुला, कैम्प आदि अनेक नाटकों का निर्देशक और चार पीढिय़ों ने उनसे रंग संस्कार हासिल किया। सब रंग मोह भंग, अंधा युग, अन्धों का हाथी, बकरी, लोक कथा 78, गोदान, एक और दुर्घटना, संया भये कोतवाल, कबीरा खड़ा बाजार में, आदि आदि नाटकों की इतनी लम्बी सूचि है कि जो पूरी उपलब्धियों का अध्ययन किया जाये तो होश उड़ जाएंगे।

मिर्जा मसूद के निर्देशन में देखा गया हर नाटक ने लोगों को हर बार समृद्ध किया है, उनके हर नाटक के क्या हसीन तेवर थे क्या लहजा था। उनके नाटक देखने के बाद दिल का अजब हाल हो जाता था, न रात कटती थी न नींद आती थी। चलते नाटक में लगातर उनके इल्म की बारिश होती रहती थी। आपके हर नाटक देखने के बाद दर्शक अपनी अक्ल की सतह से थोड़ा और ऊपर उठ जाता था।

पत्रकारिता भी पढ़ाते थे

महंत लक्ष्मीनारायण दास महाविद्यालय में पत्रकारिता की कक्षा में अतिथि प्राध्यापक के रूप में कार्य कर चुके थे। पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाते समय वे अक्सर कहा करते थे-  ‘सभी छात्रों को शहीद भगत सिंह की जीवनी जरुर पढऩी चाहिए। यदि आप ये जीवनी नहीं पढ़ते हैं, तो आप सही अर्थों में जवान कहलाने के हकदार  नहीं हैं’। पत्रकारिता के विषय में उनका कहना था कि पत्रकारिता अब गांव में ही बेहतर हो सकती है। नई खबरें और कहानियां तो गांव से ही निकलेंगी। अपने सिद्धांतों और उसूलों के लिए वे इतने आग्रही रहते थे कि इसमें रत्ती भर भी समझौता उन्हें पसंद नहीं था।

वे कहते थे कि वंचितों और पिछड़ों के लिए खबर लिखना और उनके अधिकारों के लिए कलम चलाना ही सही अर्थ में पत्रकारिता है। उनके व्यक्तित्व को किसी एक खास तरह के खांचे में नहीं बांधा जा सकता। वे रंगकर्म के बहुत ही माहिर और प्रतिभावान व्यक्ति रहे हैं। वे रंगमंच को बहुत गहराई से समझते थे और रंगमंच उनकी रग-रग में समाया हुआ था। 

उद्घोषणा तो कोई उनसे सीखे

इसके अलावा उन्होंने आकाशवाणी में उद्घोषक के रूप में अपना लम्बा कॅरियर बिताया। ढ, ध, भ, फ जैसे अक्षरों का उच्चारण करते हुए हमारे मुंह से जो श्वास निकलती है, उसकी हवा माइक्रोफोन से टकराने न पाए और उसका  स्वर-आघात इतना ज्यादा न हो, कि कानों को अप्रिय लगने लगे। जाहिर है, यह सलाह ध्वनि-विज्ञान का कोई मर्मज्ञ ही दे सकता है।

उसूलों से समझौता पसंद ही नहीं 

उनके व्यक्तित्व का सबसे प्रेरक पक्ष यह है कि अपनी शर्तों पर काम करते हुए भी उन्हें अनेक सम्मान और पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्हें छत्तीसगढ़ राज्य शासन का चक्रधर सम्मान और चिन्हारी सम्मान सहित दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में भी विशेष सम्मान प्राप्त हो चुका था। इनके अलावा भी उन्हें अन्य अवसरों पर विविध सम्मान प्राप्त हो चुके थे। लेकिन वे स्वयं नाटकों के मंचन के समय दर्शकों की प्रतिक्रिया को ही अपना सबसे बड़ा पुरस्कार और प्रतिसाद मानते थे। 

पूर्व मुख्यमंत्री ने उन्हें आर्थिक मदद पहंचाई थी

पूर्व मुख्यमंत्री ने मिर्जा मसूद को मुख्यमंत्री सहायता कोष से दो लाख रुपए की आर्थिक मदद पहुंचाई थी। सुप्रसिद्ध रंगकर्मी की जरूरत के समय राज्य शासन की ओर से की गई इस पहल पर प्रदेश के सभी साहित्यकारों एवं संस्कृतिकर्मियों ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का धन्यवाद व आभार जताया था। गौरतलब है कि बीते लम्बे समय से रंगकर्मी मिर्जा मसूद स्वास्थ्यगत परेशानियों से जूझ रहे थे। इस बीच उन्हें आर्थिक परेशानियों का भी सामना करना पड़ रहा था। 

इतिहास के पन्नों से

रायपुर आकशवाणी के सबसे वरिष्ठ उद्घोषक, समाचार वाचक, कॉमेंटेटर, नाटककार जनाब मिर्जा मसूद रायपुर की एक अत्यंत प्रतिष्ठित शख्सियत रहे हैं। आप भले ही इन्हें न जानें किन्तु यदि आप अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी से पूछेंगे जो रायपुर आकशवाणी सुनते थे तो वो सब इन्हें बहुत अच्छी तरह से जानते हैं क्योंकि तब उस समय इस तरह अखबार का इतना प्रचलन नहीं था और सभी लोग रेडियो सुनते थे और रेडियो में सबसे अधिक कार्यक्रम मिर्जा मसूद के ही होते थे।

वे ज्ञान के पिपासु थे

वे अपने काम के सलीके के लिए जाने जाते थे। वे दृश्यों की मुंडेर पर बैठकर सुपरविजन नहीं करते थे बल्कि वे दृश्यों में उतरकर उसकी मरम्मत करते थे, उसे तराशते थे, पालिश करते थे।

हिंदी और उर्दू के साथ ही मिर्जा मसूद दुनिया के श्रेष्ठ अंग्रेजी साहित्य पर भी दुर्लभ जानकारियां रखते थे। अंग्रेजी साहित्य में  विक्टर ह्यूगो, अर्नेस्ट हेमिग्वे, जार्ज ओरवेल, टीएस इलियट, फ्रेंज काफ्का, अल्बर्तो मोराविया, एन्तन चेखव सहित ना जाने कितने नए-पुराने साहित्यकारों की किताबों और उनके पात्रों का जिक्र सरसरी तौर पर कर दिया करते थे।

उन्हें याद भी खूब रहता था

आश्चर्य की बात तो यह है कि यह सब कुछ उन्हें याद भी खूब रहता था। उनके अध्ययन कक्ष में हर विषय की दुर्लभ किताबों का जो संग्रह था, वह उनके ज्ञान-पिपासु होने की तस्दीक करता है। इतने के बाद भी वे खुद को साहित्य का विद्यार्थी ही कहना पसंद करते थे। बच्चों के मनोविज्ञान की गहरी समझ उन्हें थी। इस आधार पर उन्हें व्यवहार-विज्ञानी कहना भी गलत नहीं होगा। 

रंगमंच के साथ रेडियो प्रसारण के पुरोधा मिर्जा मसूद की शख्सियत जहन में उभर आती है। पत्रकारिता और कला अन्य विधाओं के बीच सामाजिक जीवन में रहते हुए हममें से हर किसी को एक से बढक़र एक बुद्धिजीवी, कलाकार, साहित्यकार, विचारक और बहुआयामी प्रतिभा के धनी लोगों के संपर्क में आने के मौके मिलते रहते हैं। इनमें कुछ शख्स ऐसे भी होते हैं, जिनकी छाप हमारे दिलो-दिमाग में काफी गहरे तक पड़ जाती है। 


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