शिव, राम और कृष्ण की पहेली

राम भक्ति शाखा में कोई शूद्र और मुसलमान कवि नहीं हुआ

प्रेमकुमार मणि

 

क्योंकि तीनों श्यामवर्ण हैं. यह गुत्थी भारतीय जनमन के अंतर्विरोध और उसकी जटिल संरचना को तो दर्शाते ही हैं, मेरी समझ से उस के विवेक को भी परिभाषित करते हैं. इसलिए इन पर विचार करना दिलचस्प हो सकता है, यदि हम खुले दिल से करें.

पहले ही स्पष्ट कर दूँ अपनी सोच में मैं विकासवादी हूँ, ईश्वरवादी नहीं. मुझे किसी सृष्टिकर्ता या ईश्वर पर यकीन नहीं है. इसकी जगह मैं इस सोच का कायल हूँ कि पूरी सृष्टि का विकास लगातार हो रहा है. सृष्टि लगातार बन और मिट रही है. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि मैं पौराणिकता को नकारता हूँ. हमारे पूर्वजों की यह ऐसी रचना है जिसकी जादुई ताकत पर मेरा विश्वास है. दुनिया की तमाम सभ्यताओं में पौराणिकता विविध रूप में है.

हिन्दू सभ्यता में जो है उसके कुछ अंशों से हम सब परिचित हैं. इन्हीं में शिव,राम और कृष्ण हैं. ये इतिहास से परे हैं. कुछ लोग अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति केलिए इसे इतिहास बना कर परोसने की कोशिश करते हैं, जिस से सांस्कृतिक विसंगतियां पैदा होती हैं. लेकिन इस विवाद में न उलझ कर हम सीधे अपने विषय पर आना चाहेंगे.

शिव हमारी पौराणिकता के सब से पुराने नायक हैं. सिंधु घाटी की सभ्यता में संभवतः यही पशुपति के रूप में हैं. अपने स्वरूप में ये अजन्मा हैं. कोई नहीं जानता इनके माता-पिता कौन हैं या ये किस स्थान पर पैदा हुए. शिव जन्म नहीं लेते. बस हैं. इनका कौन-सा जाति-वंश-वर्ण है, कोई नहीं जानता. अजन्मा, निर्जात, वर्ण से परे इनकी उपस्थिति है. भारत के उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक इनकी मौजूदगी है. राम और कृष्ण की तरह किसी महल में इनका कोई ठिकाना कभी नहीं रहा. बैल, डमरू, त्रिशूल, जटा-जूट, भांग-धतूरा से घिरा इनका जीवन-चरित है.

औघड़, भौतिकता से निर्लिप्त, उत्तेजना रहित भोले बाबा; जिन्हें न भक्ति की दरकार है, न पूजा-नमाज की. मस्त-मौला हैं. मस्त होने पर नाच सकते है और रंज होने पर तांडव भी कर सकते हैं. लेकिन इससे अधिक कुछ नहीं. किसी सेना, राजसत्ता या राजनीति से इनका कोई मतलब नहीं है. अपनी ही तरह के मस्त भूत-बैताल की एक भीड़ जरूर इनके साथ होती है. इससे अधिक कुछ नहीं है इनका. काल और छल-छद्म से परे इनके अस्तित्व की व्याख्या के लिए न कोई धर्म-ग्रन्थ है न महाकाव्य; बावजूद इनका नायकत्व सब पर भारी पड़ता है.

राम और कृष्ण समय में बंधे हैं. इनकी जाति भी है, वंश-वर्ण भी. इनका जन्म हुआ है. इन्होने अपने समय में राजनीति की और एक अयोध्यापति तो दूसरे द्वारिकाधीश हुए. दोनों ने महलों में जीवन बिताए और राजपाट भी संभाला. एक ने तीर-धनुष तो दूसरे ने सुदर्शन-चक्र धारण किया. दोनों ने युद्ध में हिस्सा लिया. जीते भी, हारे भी. दुनियादारी में आए तो इसके गुण-अवगुण के भी भागी हुए. एक ने अपने स्वार्थ केलिए बाली को छुप कर मारा, राजसत्ता बचाने केलिए शम्बूक का वध और सीता को वनवास दिया तो दूसरे ने महाभारत में अपने पक्ष की जीत के लिए जी-भर छल-छद्म किये. शिव से यह सब नहीं हुआ.

वह राजसत्ता से तो दूर ही रहे, परिवार से भी लगभग निरपेक्ष रहे. कुल मिला कर वह आदिम सभ्यता या सतयुग के देवता या नायक है, जिन्हें समझने केलिए उनके ज़माने में जाना होगा. लेकिन आखिर क्या है कि आज भी हिंदुस्तान की स्त्रियां उन्हें इतना प्यार करती हैं. वे सच्चे मायने में उनके आराध्य हैं. हर स्त्री की कामना होती है कि उसे शिव जैसा पुरुष पति चाहिए. थोड़ा अल्हड, मस्त और सम्पूर्ण प्रेमी. चाहे कुछ भी न हो उसके पास, उसके जैसी निष्ठा और विश्वास हो. शिव देवताओं के देवता हैं और सामान्य लोगों का जीवन जीते हैं. सर्वहारा जीवन. लोकगीतों में उनके इस जीवन की अभिराम उपस्थिति है.

उनकी जीवन संगिनी गौरा अपने बेलगाम पति, उनके बैल और उनके अनुयायियों को संभालने में परेशां होती हैं. घरेलु लड़ाई-झगड़े भी होते हैं. लेकिन गौरा यह भी जानती है कि उसका पति केवल उसका है. एकनिष्ठ प्रेम का प्रतीक. और उनका यही चरित्र हिंदुस्तानी स्त्रियों को आकर्षित करता है. अपने जीवन साथी में वह शिव की तलाश करती है. पूरे सावन महीने में हिंदुस्तानी महिलाएं अनुष्ठान करती हैं कि शिव उस पर आशीर्वाद बिखेरते रहें. वह शिवमय होना चाहती हैं.

हिन्दू सभ्यता के काल विभाजन में चार युग होते हैं. सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग. राम त्रेता और कृष्ण द्वापर का प्रतिनिधित्व करते हैं. दशावतारों में कलयुग का प्रतिनिधित्व बुद्ध करते हैं. लेकिन राम और कृष्ण की अवस्थिति विचित्र है. इनका खास परिवार और जाति-वर्ण में जन्म होता है, इन्हे अवतार भी माना गया है. यहीं गुत्थी गहरी हो जाती है. यानी इनका चरित्र दुहरा है. ये मनुष्य हैं, लेकिन कैसे मनुष्य! ईश्वर के अवतार. भारतीय दर्शन की अद्वैत-परंपरा जीव और ब्रह्म यानि ईश्वर को एकाकार मानती है.

हर जीव ईश्वर का अंश है. लेकिन राम और कृष्ण अंश नहीं, पूरे ईश्वर हैं. राम पूर्णावतार नहीं हैं; कृष्ण पूर्णावतार हैं. हालांकि यह एक घालमेल ही है. क्या ईश्वर विभाज्य है कि उसका एक अंश जीव होगा? यदि ऐसा है तो सोचना होगा कि यह सर्वशक्तिमान का कैसा पक्ष है. अद्वैत दर्शन तो हाथी और चींटी के जीव में कोई भेद नहीं करता. यदि ईश्वर विभाज्य होगा तो पूरी संरचना ही एक नयी व्याख्या चाहेगी. लेकिन इस बिंदु को यहीं विराम दे कर एक बार फिर हम अपने विषय पर लौटें.

राम की अवस्थिति कुछ दुरूह है. हमारी सभ्यता में दो तरह के राम हैं. एक निर्गुन राम हैं, जो विश्वासों में हैं. कबीर के राम ऐसे ही हैं. हजारों संत महात्माओं ने निर्गुण राम पर यकीन किया. उनके राम कभी देह रूप नहीं रहे. उनके विश्वासों में रहे. उनकी धड़कन का हिस्सा रहे. हर सांस में बने रहे. उनके राम जन्मने और मरने वाले राम नहीं रहे. वे राजा और फ़कीर नहीं, सांवले और गोरे नहीं, स्त्री और पुरुष नहीं,बस रामनाम रहे. इनकी व्याख्या हमारे निर्गुण संतों ने की. भारत के मिहनतक़श किसानों, शिल्पियों ने इसी राम की अराधना की.

यह राम उसके वजूद का हिस्सा होता है, इसलिए इसके पूजा और श्रद्धा की जरूरत नहीं होती. इसे महसूस करना होता है. ध्यान लगाना होता है. और इस अनुभूति मात्र से जीवन का व्याकरण बदलने लगता है. यह अनुभूति व्यक्ति को धार्मिक नहीं, आध्यात्मिक बनाता है. जब इस अनुभूति से मिहनतक़श जुड़ता है तो उसके सृजन में सौंदर्य उभरने लगता है. भक्ति आंदोलन के निर्गुनिये कवियों ने जब किसानों और कारीगरों को इस सांस्कृतिक धारा से जोड़ा था तो हमारी उत्पादन प्रणाली पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा था. मुगल कालीन जिस आर्थिक उत्कर्ष की विवेचना होती है, उस का आधार भक्ति का सांस्कृतिक आंदोलन था, न कि मुगलकालीन सामंतवादी राजनैतिक व्यवस्था.

लेकिन यह सांस्कृतिक आंदोलन सामाजिक स्तर पर अमरदेस की पृष्ठभूमि रच रहा था. ऐसी सामाजिक पृष्ठभूमि जिस में वर्चस्व की कोई भूमिका न हो. बड़े-छोटे का भेद नहीं हो. लेकिन समाज के वर्चस्वशाली लोगों को ऐसी व्यवस्था चाहिए थी, जिसमें कुछ लोग दिव्य और देव हों और शेष सर्वहारा. इसके लिए एक ऐसे नायक की जरूरत थी जो कुछ अजूबा गढ़ने में सक्षम हो. इसी सोच में सगुन राम की स्थापना हुई. ऐसा राम जो ईश्वर भी हो और राजा भी. जिसकी जाति हो माता-पिता हों, कुल-मर्यादा हो. एक तरफ से वह ईश्वर और दूसरी तरफ से मनुष्य हो.

उसे मर्यादा की समझ हो कि कुछ लोग बड़े होते हैं और अधिकतर लोग छोटे. सगुन राम अयोध्या के राजा बनते हैं कोसलपुर राजा. उनका मूल चरित्र गौ-द्विज हितकारी है. वह सीता को घरनिकाला दे सकता है और शम्बूक का वध कर सकता है. राजनैतिक स्तर पर वह गैर आर्य जातियों को आर्य संस्कृति का हिस्सा बना सकता है. यह राम वर्चस्व की मर्यादा स्थापित करने वाला मर्यादा-पुरुषोत्तम राम है. इसके दरबार में गैर आर्यों का प्रतिनिधित्व हनुमान के रूप में संभव है. पूंछ डुलाने वाला प्रतिनिधित्व.

राम की इस कथा योजना को कवियों ने तराशा. इसे काव्य का रूप दिया. बड़ी कोशिशें हुईं, लेकिन आम हिन्दुस्तानियों के मन पर निर्गुण राम ही सवार रहे. ऐसा प्रतीत होता है इसी अभाव भूमि पर कृष्ण की पौराणिकता विकसित हुई. कृष्ण राम की तरह राजा के घर पैदा नहीं होता. कारागार में उसका जन्म होता है. देवकी की कोख से. वसुदेव पिता हैं. जन्मते ही भादो की बरसाती रात में उसे जमुना पार कराया जाता है और नन्द के घर रख आया जाता है. वसुदेव की रक्षा केलिए शेषनाग ( बचे हुए नागों का एक झुण्ड) जाते हैं.

कृष्ण श्यामवर्ण है. गोरे ग्वालों के बीच उसका बचपन गुजरता है. ग्वालबाल उसे चिढ़ाते हैं. नन्द और जसुमति तो गोरे हैं तुम कलूटे कैसे हो बताओ?. क्या करे बिचारा बालक कृष्ण. इतने तानों के बीच उसका व्यक्तित्व उभरता है. वह ब्रजभूमि की गोपियों का नायक बनता है. उनके प्रेम का प्रतीक. लेकिन वह तो एक सामाजिक-राजनैतिक प्राणी भी है. वह मथुरा पर अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाता है. लेकिन ब्रजभूमि का वर्चस्वशाली तबका उसे पचा नहीं पाता. वह युवाओं का नायक है, विशेष कर गोपिकाओं का. लेकिन इससे क्या. उसका ब्रजभूमि में रहना असंभव है. उसे सुदूर द्वारिका में सागर तट पर जाना होता है. उससे अधिक अब वह भाग नहीं सकता था.

कृष्ण का जो कुछ है स्वयं का अर्जित किया हुआ. वह असाधारण है और कुछ समय केलिए द्वारिकाधीश भी रहा है. लेकिन उसका रूप राजा की तरह कभी नहीं बन सका. लोगों ने राजा राम जरूर कहा, लेकिन शायद ही किसी ने राजा कृष्ण कहा हो. उसका पूरा चरित राजा की तरह लगता भी नहीं. इस रूप में जमता ही नहीं. वह तो हमेशा बांसुरी बजाते एक लोक नायक की रहा, जिसे गोपियों ने खूब प्यार किया. वह ब्रजमंडल का अघोषित नायक बना. उसे प्यार करने वाले समाज के वंचित लोग रहे. स्त्रियां, शिल्पकार और किसान उसके अपने थे.

वह एक इशारे से द्वारिका को नगर बना सकता था और खांडव वन को इंद्रप्रस्थ में तब्दील कर सकता था. उसके समय का सबसे महत्वपूर्ण दौर तब आया जब महाभारत हुआ. उसने उन पांडवों के साथ होना चुना, जो पहचान के मारे थे. कौरव दल उनपर ऊँगली उठा रहे थे कि ये पाण्डुपुत्र नहीं किसी ऐरे-गैरे से जन्मे हैं. इन्हें तो सूई की नोक भर भी जमीन नहीं देंगे. कौरव दल में एक से एक महारथी थे. द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म, कर्ण जैसे पराक्रमी वहीँ थे. स्वयं दुर्योधन बलशाली था. इधर पांडव-पक्ष अपेक्षकृत बहुत कमजोर. लड़ने वाले तो अर्जुन और भीम ही थे.

शरीर से पिलपिले युधिष्ठिर को नैतिकता से ही फुर्सत नहीं थी और नकुल-सहदेव के होने न होने का कोई मतलब नहीं था. लेकिन इस पक्ष का साथ देना कृष्ण ने तय किया. अपने चरित में वह मूलतः युद्ध विरोधी है. युद्धों से भागते-भागते उसका एक नाम रणछोड़ हो गया है. महाभारत में भी वह हथियार न चलाने की शपथ लेकर शामिल हुआ है.

भृत्योचित सारथी के रूप में साथ होना स्वीकार किया है. लेकिन उसके शामिल होते ही महाभारत का अर्थ बदल जाता है. वह इसे धर्मयुद्ध घोषित करता है. यतो धर्मो ततो जयः. जहाँ विचार अथवा धर्म होता है जीत उसी की होती है. कृष्ण ने बता दिया कि यह युद्ध कौरवों और पांडवों का नहीं कृष्ण के पक्षकारों और उसके विरोधियों का है. महाभारत में ब्रजमंडल का वह नायक जीतता है. तमाम महारथी चाहे वे भीष्म हों या द्रोणाचार्य, कर्ण हों या दुर्योधन हत होते हैं. मारे जाते हैं.

राम को पूर्णावतार नहीं कहा गया, कृष्ण पूर्णावतार हैं. भारतीय मनीषा के इस निर्णय का अर्थ तय करना आसान नहीं है. क्या है कृष्ण में जो राम में नहीं है. मेरे मन में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि राम जिस प्रकार सगुन और निर्गुण में विभाजित हुए कृष्ण क्यों नहीं हुए. कृष्ण अपने व्यक्तित्व और चरित में एकरूप रहे. क्यों? वह राजा हो कर भी बांसुरीवाला ही क्यों बने रहे? वह जनता से इस तरह अविभाज्य क्यों और कैसे हैं? अयोध्यापति राम का जीवन भी कभी आराम का नहीं रहा. किन्तु वह इतने प्रश्नों से घिरे क्यों रहे?

मर्यादा सँभालने में वे भीष्म की बराबरी करते हैं. जानते हुए भी कि यह गलत है किये जा रहे हैं क्योंकि मर्यादा पालन करना है. ऐसी उन्होंने प्रतिज्ञा कर ली है. शबरी के जूठे बेर खाने वाला, अहिल्या को सामाजिकता देने वाला राम एक समय स्त्री और शूद्रों का विरोधी कैसे बन जाता है? कृष्ण ऐसा क्यों नहीं बनता? सोलह हजार उन स्त्रियों का वह वरण करता है जिनका कोई पति नहीं है. कृष्ण की घोषणा है जिसका कोई पिता नहीं, जिनका कोई पति नहीं, उनका पिता और पति मैं होना स्वीकारता हूँ. यह कितनी बड़ी सामाजिक क्रांति थी. जिस राधा के साथ उन्होंने कभी फेरे नहीं लिये वह उनसे वैसी चपकी की सब स्त्रियां पीछे हो गईं.

कृष्ण और राधा प्रेम के प्रतीक बन गए. कृष्ण को मर्यादा नहीं, न्याय पसंद है. वर्चस्व नहीं, प्रेम पसंद है. वह प्रेम के प्रतीक बनते हैं. प्रेम में पगी तमाम स्त्रियां कृष्ण की छाती पर माथा रख कर अपना राग सुनाना चाहती हैं. उन्हें शिव का आशीष चाहिए और कृष्ण का उन्मुक्त प्रेम. कृष्ण का प्रेम मर्यादामुक्त है, उन्मुक्त और अल्हड़ प्रेम है. मानो शिव का मर्यादित प्रेम प्रगल्भ हो अल्हड़पन में तब्दील हो जाता हो.

इसीलिए मुझे शिव और कृष्ण का पौराणिक व्यक्तित्व आकर्षित करता है. कृष्ण का कुछ अधिक. इसलिए कि कृष्ण के व्यक्तित्व में थोड़ी जटिलता है. जद्दो-जहद है. इस व्यक्तित्व में हमें अपने ज़माने के कुछ सवालों के जवाब मिलते हैं. कभी हिंदी कवि मुक्तिबोध ने सवाल किये थे कि क्या कारण है सगुन भक्ति धारा की राम भक्ति शाखा में कोई शूद्र और मुसलमान कवि नहीं हुआ, लेकिन कृष्ण भक्ति धारा में रसखान ताज बीवी और अनेक कवि हुए.

यह सब अकारण नहीं है. कृष्ण की पौराणिकता बड़े सरोकारों से हमें जोड़ती है. गीता में भले ही कृष्ण वर्णधर्म की विवेचना करते दीखते हैं, किन्तु महाभारत कथा और कृष्ण कथा का पूरा ताना-बाना वर्ण-धर्म को नकारता है, उसे तोड़ता है. इसीलिए मुझे अनुभव होता है गीता का वर्णधर्म -प्रसंग प्रक्षिप्त है. क्योंकि महाभारत और कृष्ण के मूलचरित्र को यह खंडित करता है.


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