जानिए संविधान की हत्या का अर्थ

इस अश्लील निर्णय की निंदा करना चाहूंगा

प्रेमकुमार मणि

 

खबर है, गृहमंत्री अमित शाह ने घोषणा की है कि 25 जून की तारीख संविधान हत्या दिवस के रूप में सरकार प्रति वर्ष मनाएगी. 1975 में इसी तारीख को इंदिरा गाँधी सरकार ने इमरजेंसी लगाई थी. एक कम पचास साल पहले की उक्त घटना को मौजूदा सरकार जनता की स्मृति से विलोपित करना नहीं चाहती. शायद इससे उस वक्त की नेता इंदिरा गाँधी और उनकी पार्टी कांग्रेस के विरुद्ध नफरत का भाव पैदा करने में इसकी कुछ उपयोगिता हो.

सरकार ने घोषित किया है तो यह अमल में भी आएगा और अब स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की तरह संविधान हत्या दिवस भी एक राष्ट्रीय त्यौहार हो जाएगा. जिस हिंदुत्व पर संघ और भाजपा का जोर होता है और जिसे वह भारतीय राष्ट्रीयता का प्राण-तत्व कहता रहा है, उस में शोक-केंद्रित उत्सव आयोजित करने का कोई रिवाज नहीं है. नकार-केंद्रित उत्सव हमारी भारतीय परंपरा में नहीं है. ख़राब दिनों, शोक और नकारात्मक चीजों को हम भूलना चाहते हैं. हाँ, अरबी तहजीब में मुहर्रम आयोजित करने की और छाती पीटने की परंपरा है.

भारतीय मुसलमान भी मुहर्रम को त्यौहार के तौर पर मनाते हैं और शहीद हुसैन भाइयों की याद में ताज़िया निकालते हैं. लेकिन, इमरजेंसी लगाए जाने की तारीख को इस तरह सेलिब्रेट करने का कोई औचित्य मेरी समझ में नहीं आया. यदि ऐसा है तो 30 जनवरी को क्या भारत सरकार राष्ट्र हत्या दिवस के रूप में आयोजित करना चाहेगी, क्योंकि उस रोज राष्ट्रपिता गांधी जी की हत्या हुई थी.

इमरजेंसी को हमारी पीढ़ी ने झेला है. इस बार भी 25 जून को मैंने एक पोस्ट लिखा था. उसकी हर कोई निंदा करता है,यहाँ तक कि लगाने वाले तक ने इसकी निंदा की है. मुझे वह दिन याद है जब इंदिरा गाँधी और कमलापति त्रिपाठी ने पटना के गाँधी मैदान की जनसभा में सार्वजनिक तौर पर आपातकाल लगाए जाने केलिए जनता से मुआफी माँगी थी. अब ऐसे निन्दित मामले की अमित शाह जिन्दा करते हैं तो यह उनकी अपनी पसंद हो सकती है.

अमित शाह ने इमरजेंसी का खौफ नहीं देखा है. उनकी उम्र तब ग्यारह साल रही होगी. टॉफी खाने में मशगूल रहे होंगे. उनके आका नरेंद्र मोदी के बारे में कहीं पढ़ा था कि वह बड़ोदरा के जेल में अखबार पहुँचाया करते थे, जिस जेल में जॉर्ज फर्नांडिस भी थे. शायद उन्होंने खौफ का कुछ अंश देखा हो. लेकिन वास्तविक खौफ तो हमारे बिहार में था. क्योंकि जयप्रकाश आंदोलन का केंद्र पटना था.

मेरा दूसरा एतराज भाषा सम्बन्धी है. मैं भाषाविद नहीं हूँ. विद्वानों की राय जानना चाहूंगा. क्या 'संविधान-हत्या-दिवस ' स्वयं में संविधान और व्याकरण-सम्मत शब्द है? 1975 में जब इमरजेंसी लगाई गई थी तब उसका प्रावधान संविधान में था. यह जरूर था कि मनमानी की गई थी. जैसे कार्रवाई पहले शुरू हो गई और कैबिनेट का अनुमोदन 26 जून की सुबह हुआ. और भी कुछ गलतियां हुई थी.

सब से बड़ी बात तो यह थी कि एक गैरसंवैधानिक व्यक्ति संजय गाँधी के कण्ट्रोल में पूरे देश का प्रशासनिक ढांचा आ गया था. लेकिन यह सब संविधान का दुरुपयोग था, उसकी हत्या नहीं थी. अमित शाह जी! हत्या तो अंत होता है. क्या हत्या के बाद कुछ पुनर्जीवित हो सकता है? उसी संविधान की देख-रेख में 1977 का चुनाव हुआ. इंदिरा गांधी पराजित हुईं. इमरजेंसी हटा कर ही इंदिरा गाँधी ने अपनी सरकार का इस्तीफा दिया था. आने वाली सरकार ने संविधान में आवश्यक संशोधन कर ऐसी स्थिति बनाई कि फिर कोई इमरजेंसी नहीं लगा सके.

लेकिन आप तो संविधान की हत्या की बात कर रहे हैं. क्या आज चल रहा संविधान उस हत्या के बाद बना कोई दूसरा संविधान है ? इसे अमित शाह जी को स्पष्ट करना चाहिए.

शायद अमित शाह ने यह सब इसलिए किया है कि विपक्ष संविधान की प्रतियां लेकर इस बार संसद के सत्र में पहुंचे थे. विपक्ष का कहना है मौजूदा भाजपा सरकार लगातार संवैधानिक मर्यादा की तौहीन कर रही है. उनकी बातों में कुछ दम भी है. जांच एजेंसियों का जिस तरह दुरुपयोग हुआ है वह लोगों को दिख रहा है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस और उसके चरगट्टों ने संविधान की तौहीन नहीं की है. हकीकत यही है कि संविधान की मर्यादा दोनों पक्षों ने समय-समय पर तोड़ी है. और दोनों को इसका अभिज्ञान होना भी चाहिए.

संविधान की मर्यादा तब भी आहत हुई थी,जब शाहबानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना के लिए अध्यादेश निर्गत हुए थे और तब भी जब सुप्रीम कोर्ट में यथास्थिति बनाये रखने का वचन देकर भाजपा के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह हाथ पर हाथ धरे बैठे रह गए और विवादित ढांचा ध्वस्त कर दिया गया. इसलिए सब को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए कि वह कितना संविधान सम्मत हैं.

लेकिन, इससे सरकार के इस मूर्खतापूर्ण निर्णय का औचित्य सिद्ध नहीं होता. मैं कड़े शब्दों में इस अश्लील निर्णय की निंदा करना चाहूंगा.


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