आपात स्थिति में निजी अस्पताल में मरीज का बचना हुआ मुश्किल

मृत शरीर के साथ लाखों में बिल का बोझ भी उठाना पड़ा

सुशान्त कुमार

 

जहां मेडिकल की पढ़ाई की फीस करोड़ तक पहुंच चुकी हो, वहां के डॉक्टर से आप इंसानियत की उम्मीद कैसे रख सकते हैं। निजी अस्पतालों के गोरखधंधों पर कई रिपार्ट प्रकाशित हो चुकी है। ये सारे रिपोर्ट चर्चित रहे हैं। आईएमए और डॉक्टर्स सारे के सारे पत्रकारों, व्हीसल ब्लोवर और लेखकों के खिलाफ इन लाबियों की बड़ी बड़ी कहानियां है। 

3 जून 2024

सुबह 5:30 की बात है। फोन आया छोटे भाई को लकवा मार दिया, बोल नहीं पा रहा है, किसी तरह दोस्त के चारपहिया गाड़ी में लाद कर पहले बीएम शाह अस्पताल ले जाया गया जहां आयुष्मान से इलाज करने से मना कर दिया गया और उसके बाद हाईटेक हास्पिटल, भिलाई ले जाया गया। पता यह भी चला कि अस्पताल का प्रबंधक लोहा का नामी व्यापारी है। सरकारी अस्पताल में ले जाने के लिए लोग कतरा रहे थे। समय के बीतने के साथ भिलाई में सेक्टर-9 अस्पताल से लेकर हाईटेक तक सभी निजी और सरकारी अस्पताल बदहाल होते चले जा रहे हैं। 

सुबह 11:00 बजे

डॉ. नचिकेत दीक्षित इलाज कर रहे थे। उनसे बात की। उन्होंने बताया कि मरीज बहुत गंभीर स्थिति में हैं। बार-बार झटके आ रहे हैं। ऑप्शन में रखा हुआ था। बेहोशी के हालात में हैं और कुछ भी कह पाना मुश्किल है। इलाज और तबियत में किसी तरह की सुधार नजर नहीं आ रही थी बल्कि पहले दिन से ही बिल बढ़ता हुआ उपर चला जा रहा था। डॉक्टर बार-बार रिफर की बात कर रहा था लेकिन रिफर नहीं कर रहा था। किसी की स्थिति नहीं थी कि वहां इलाज करवा सके। मामला निजी अस्पताल हो या सरकारी अपने परिजनों की जान बचाना हैं तो पहले डॉक्टर पर भरोसा और मरीज को उसके सुर्पद कर दो और उसके बाद पैसों के लिए दर - दर की ठोकरे खाओं, उससे किसी के इंसानियत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता? 

4 जून 2024

मन बहुत भारी हुआ लग रहा था। अपने आप को समेट कर भिलाई में अस्पताल तक खुद को ले चलना मुश्किल हो रहा था। अपने परिजनों के साथ अस्पताल के सीढिय़ां चढ़ रहा था। रजिस्टर में नाम नोट करवाने के बाद मुलाकात करने के लिए लाइन में खड़ा था। तब तक दिल की धडक़नें काफी तेज हो चुकी थी। अपनी बारी का इंतजार करने के बाद मरीज से मुलाकात की बारी आई। प्लास्टिक का अप्रन को ओडऩे कहा गया और जूते निकलवा दिएं। जैसे ही आईसीयू पहुंचा 44 साल के भाई का हट्टा - कट्टा शरीर वेंटिलेटर में चीत लेटा पड़ा था। आंखें बंद। अस्पताल का धारीदार पेंट - शर्ट में वह नजर आया। जीभ हल्का मुंह से बाहर यानी दांतों में दबा हुआ था।

और दाहिने ओर चेहरा झुका हुआ था। कुछ मिनट खड़ा रह कर उसे निहारते रहा। बचपन से लेकर आज तक की उसके साथ खेलकूद, बदमाशी, मुलाकातों, बातचीत, मतभेद और प्रगाढ़ संबंधों की याद किसी चलचित्र की तरह मेरे मनमस्तिष्क में ताजा हो चल रहे थे। 1 तारीख को ही तो बात किया था...! मन रोने को हो रहा था। और आंसू बस निकलने वाले ही थे। परिवार वालों का रो - रो कर बुरा हाल था। मालुम नहीं सालों के अस्पताल में आने - जाने के अनुभव से लग रहा था कि भाई नहीं रहा और वेंटिलेटर भाई के पार्थिव शरीर की बोझ जीवित दिखाने का ढोंग कर रहा था। उसके बाद क्या बचा था सिर्फ और सिर्फ मेरे सम्पर्क में रसूख के लोगों को फोन लगाए जा रहा था।

और पैसों के इंतजाम के लिए हाथ-पैर मार रहा था...कुछ भी हासिल नहीं हो रहा था...विशेषज्ञ डॉक्टरों और जानकारों से सलाह ले रहा था। अंतत: मेरे छोड़ से कोई उम्मीद मरीज भाई के परिजनों को कर पाना मुश्किल था। मुश्किल से ‘दक्षिण कोसल’ के सहयोगियों से मिले 2 हजार रुपए मेरे खींसे में थे। आज मन भारी है, भाई को वेंटिलेटर पर रखा गया है। सोशल मीडिया में थकहार कर लिख ही दिया... कि मैं असहाय बना खड़ा हूं...। स्थिति ऐसा कि निजी अस्पताल होने से इलाज करवा पाना मुश्किल हो गया था। 

कई मित्र डॉक्टर, पत्रकार और ऊंचे ओहदे में कार्य कर चुके लोगों से लगातार सम्पर्क में था। कई के तो सरकार से सीधे सम्पर्क भी थे। लेकिन कहीं से भी भाई को बचाने की राहत नहीं पहुंच पा रही थी। अस्पताल बिल और दवाइयों की सूची लगातार हमारे हाथ चिल्ला चिल्ला कर थमाए जा रहे थे। और परिजन जिंदा लाशों की तरह इधर से उधर हो रहे थे। और परिवार के लोग भाई को बचाने इससे-उससे उधार कर इलाज में दवा जुटाने का काम कर रहे थे। रसूख के लोग और मेरे परिचित डॉक्टर्स सिर्फ और सिर्फ आवेदन-निवेदन और नीति शिक्षा तक की ताकत दे रहे थे। मेडिकल के क्षेत्र में कार्य करने वाले छत्तीसगढ़ के नामी शख्सियतों ने हाथ उठा लिया था।

मन को बताना और समझाना मुश्किल हो चला था कि भाई अब नहीं रहा और उसे कौन बचा पाएगा? आयुष्मान योजना, ईएसआई और मुख्यमंत्री सहायता योजना अस्पताल के काउंटर से होकर गुजरने और भाई को बचा पाने में नकारा साबित हो रहे थे। निजी अस्पताल इन योजनाओं को लूटने का कत्लखाना बनते जा रहा है। इस दौरान डर इतना कि क्या बताए...।

वेंटिलेटर के साथ एम्स, डीकेएस और मेकाहारा ले चलने की हिम्मत नहीं हो रही थी। और ना ही उस अस्पताल में इलाज करवाने की कोई उम्मीद बाकी थी। मैंने कई डॉक्टर और जानकारों से वहां के ‘डॉक्टर नचिकेत दीक्षित’ से बात कर उनकी ‘मंशा’ जान चुका था। वह इलाज की औपचारिकता पूरी कर रहे थे, जिसे कहते हैं कि डॉक्टर बचाने की पूरी कोशिश करता है....खैर... स्थिति बहुत गंभीर बन गया था। सिर्फ ‘वेट और वॉच’ के सिवाय हमारे पास कुछ भी संबल नहीं था। 

5 जून 2024

अंतत: भारी दबाव के बाद अस्पताल को बताना ही पड़ा...कोई लगभग 12:45 बजे आखिरकार भाई हमें छोड़ चला था। लोगों को फोन में जानकारी दे रहा था। परिवार के लोग दहाड़ मार-मार कर फोन में बिलख और सुबुक - सुबुक रो रहे थे। मंझला भाई और परिचितों की भीड़, मोहल्ले का पार्षद, भाई के निजी कम्पनी के कर्मचारी और अधिकारी बिल पटाकर मृत शरीर लेने के जुगत में थे। कोई तीन-चार लाख जेब से ढीला करने के बाद ही हमारे भाई का मृत शरीर हमें मिला। तीन दिन में पांच छह लाख रुपए पार। मंझला भाई को सिर्फ और सिर्फ अंतिम संस्कार के लिए मात्र 2000 रुपए ही दे पाया...

और सभी कर्ज में उतर चुके थे। मालुम नहीं यह कर्ज कब तक उतरेगा। परिवार पर इसका भी बोझ बढ़ चुका है। घर के लोग, बाहर के लोग और उसके विभाग जहां वह काम करता था सब जुट चुके थे और डॉक्टर से लगातार पूछताछ कर रहे थे। डॉक्टर और अस्पताल कागजी कार्यवाहियों में जुट चुका था, मृत शरीर के साथ एक मोटा फाइल और दु:ख के साथ लाखों का बिल हमारे हाथों था।

लगभग 120 पन्नों का मेडिकल रिपोर्ट की फाइल हमें मृत शरीर के साथ सौंपा गया। रिपोर्ट ऐसा कि आप इलाज को लेकर निजी अस्पताल मालिक और डॉक्टर के खिलाफ ऊंगली तक नहीं उठा सकते हैं। भविष्य की कार्यवाहियों के लिए एकदम ठसा हुआ। आपको बताऊं सरकारी फाइल इतने अपडेट नहीं होते...काश! इलाज भी उतना ही उम्दा और ठसा होता तो क्या कहना! मृत शरीर को सौंपने में लगने वाले पैसों का हिसाब - किताब चल रहा था। भाई ने अपने पीछे एक भरापूरा परिवार छोड़ गया है।

उनकी पत्नि और एक बेटी असहाय हो चुके हैं। भरण-पोषण और बच्चे की पढ़ाई औंधे मुंह खड़ा है। पार्षद, निगम, विधायक, ईएसआई, निजी विभागीय कार्य के अधिकारियों से संपर्क किया जा रहा है। ‘हाईटेक अस्पताल’ ने 26 तारीख को मृत्यु प्रमाण पत्र सौंपा है। जिसमें माता का नाम गलत लिखा हुआ है, इसके सुधरने के बाद परिवार के जान-माल के लिए आगे राहत और बचाव की कार्यवाही शुरू हो पाएगी। 

तीन दिन में, इन 120 पन्नों में सिर्फ दवाईयों और अनहोनी की बात रह - रह कर हमें पढऩे और जानने के लिए बार-बार पलटने को मजबूर करता है। इन पन्नों में लगभग डेढ़ लाख की मात्र दवाइयों की पर्ची ही है। शेष अंदाजा लगा लीजिए। जिसमें वेंटिलेटर, डॉक्टरी फीस और उस कार्पोरेट अस्पताल का बेड और अन्य फीस शामिल हैं। क्या दवाइयां दी गई, अस्पताल का कोर्स क्या था? मौत का कारण, डायग्नोसिस, ऑपरेशन्स (गतिविधि), वर्तमान इतिहास, भूत का इतिहास, जनरल परीक्षण, तापमान, बॉयलॉजिकल परिणाम, ईसीजी, सीटी स्कैन से जुड़े अध्ययन, छाती का एक्स-रे, सैरोलॉजी, बॉयोकेमेस्ट्री, सिकलिन टेस्ट, पैथोलॉजिकल रिपोर्ट, सभी खून जांच, लीवर फंक्शन टेस्ट, मोनोपोलार रन, पेशाब परीक्षण। इसमें डॉक्टर ने क्या सलाह दी उसकी मुख्य पर्ची भी शामिल हैं। 

रिपोर्ट में क्या लिख्खा है?

मृतक को लगातार आईसीयू में झटके आ रहे थे। सांस लेने में दिक्कत थी। ऑक्सीजन थेरेपी दी गई। बताया जाता है कि दाहिने दिमाग का नश फट गया था। ब्रेन स्ट्रोक, दिमाग की मांसपेशियां काम करना बंद कर दिया था। बचने की उम्मीद कम होते गई। अर्थात कोमा में था। आंख की पीपुल्स से रोशनी पहुंचना बंद हो गया था। ब्लड प्रेशर था। दिल का धडक़न रूक गया था। इस तरह कार्डिक अरेस्ट हुआ और और अंत में सीपीआर दिया गया।

रिपोर्ट के अनुसार यूरिक एसिड बढ़ गया था। ब्रेन हेमरेज था, बांए चेहरा कमजोर हो चला था। बीपी 140 से 90 बता रहा था। 

सीटी रिपोर्ट में खून का थक्का दाहिने माथे के सामने बगल में खसक गया था। वह बहुत फैल गया और सूजन भी था। कुछ के अनुसार पानी भर गया था। लंग्स गड़बड़ थे, बाएं फेफड़े में इन्फेक्शन था। यूरिक एसिड 9.0 था। इतना ही नहीं स्ट्रोक भयानक बताया जा रहा है। लंग्स काम नहीं कर रहे थे और हाइली एसिडिटी था। कुछ डॉक्टरों ने बताने की कोशिश की है कि लकवा, ब्लड प्रेशर और झटका के कारण मौत हो गई।

(नोट: इन जानकारियों में रिपोर्ट को समझने में डॉक्टरी नजरिए से त्रुटि हो सकती है।)

अंतिम संस्कार

परिवार ने हिंदू प्रथा के अनुसार समाज और लोकलाज को बचाने भाई का अंतिम संस्कार किया है। शरीर को पांच तत्वों में सुपुर्द करने के लिए अग्रि को सौंप कर अस्थियों को शिवनाथ के गोद में दे दिया गया। सैकड़ों लोग जुटे थे। सब अफसोस जाहीर कर रहे थे। ‘कोई कह रहा था मृत्यु ही सच है इसे स्वीकार करें।’ भाई के मृत शरीर को प्रकृति को सुपुर्दनामा करने में कुल 14 दिन लगे। और इस तरह उसके जाने से लेकर बाकी दिनों के लिए भाई का परिवार उधार और अन्य जरियों से पैसों का इंतजाम कर रहे हैं। कोई कुछ-कुछ सहयोग भी कर रहे थे।

लेकिन यह सहयोग ज्यादा दिन नहीं चलने वाला? एक स्थाई आय का जरिया उनके पत्नी को शुरू करना पड़ेगा। दसवें दिन सभी परिवार के पुरूष सदस्य मुंडन हो गए और ब्राह्मण के द्वारा अंतिम संस्कार के साथ श्राद्ध के काम को पूरा किया गया। यहां तक कई लाख रुपए लग चुके थे। ब्राह्मण को दक्षिणा के साथ कई हजार रुपए देने पड़े। साथ ही साथ परिवार ने मृत आत्मा की शांति के लिए गाय और बछड़ा भी ब्राह्मण को दान दे दिया था। अंतिम संस्कार तक सभी ने खान-पान को लेकर सावधानी बरत रखा था। दसवें दिन सभी ने मुंडन संस्कार के बाद मृत्युभोज के संस्कार को भी पूरा किया। 

5 जून 2024 के बाद की स्थिति

उनके परिवार की आर्थिक स्थिति काफी दयनीय हो गई है। मन कर रहा था कहीं सरकारी अस्पताल ले जाते तो, क्या भाई बच जाता? यह भी कि ऐसे अचानक कोई कैसे तीन दिन में ही बीमार और मौत को प्राप्त कर लेता है...। सोशल मीडिया में लिखा था कि आप कभी भी अपने परिजनों को बीमारी के हालातों में सरकारी अस्पतालों में लेकर ही जाइए लेकिन वह भी कितना कारगर है, बताना मुश्किल है। यह भी समझ आया कि सरकारी-प्राइवेट हॉस्पिटल को आयुष्मान योजना, ईएसआई जैसी बीमा, मुख्यमंत्री सहायता योजना से जोडक़र चिकित्सा को क्रूर बाजार में बदल दिया गया है। 

जाना और लिखा भी कि अस्पतालों में वेंटिलेटर जीवन के साथ खिलवाड़ का जरिया बन गया है? किसी ने लिखा कि यह मरीजों को लूटने का हथियार बन गया है। किसी ने यह भी लिखा कि सिस्टम में पैसा अमानवीयता की सारी हदें पार कर चुका है। प्रोफेशनलिज्म क्रूरता का पर्याय बन गया है।  

12 जून 2024

अपनी जानकारी को टटोल रहा हूं कि क्या डॉक्टर अपने मरीज के जीवन के साथ खिलवाड़ कर सकता हैं, क्या मेडिकल अपने एथिक्स से हटकर व्यवसाय बन चुका है?

13 जून 2024

राजनांदगांव में ‘संजीवनी अस्पताल’ में चिकित्सीय लापरवाही के मामले में एक पीडि़त परिवार के साथ एक राजनैतिक पार्टी के नेतृत्व में लोग संगठित हो रहे हैं। ‘हाईटेक अस्पताल’ के साथ इस तरह निजी अस्पतालों की कई कहानियां जुड़ते चले जा रही हैं। अस्पताल में मरीजों और उनके परिजनों द्वारा गलत इलाज, मरीजों की मौत के बाद भी वेंटिलेटर में इलाज, महंगी दवाईयों की पर्ची और आयुष्मान जैसे योजनाओं के बाद उगाही करने की बात लगातार उठ रहे हैं।

18 जून 2024

एक अपील ‘दक्षिण कोसल’ से किया है कि - राजनांदगांव, भिलाई, दुर्ग, रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा, बस्तर के लोग निजी और सरकारी अस्पताल द्वारा किए जा रहे चिकित्सीय लापरवाही से यदि परेशान हैं तो अपनी आपबीती और कहानी ‘दक्षिण कोसल’ को लिख भेजने में देर ना करे ऐसी एक गुहार लगाई हैं।

जब से भाई नहीं रहा रिपोर्ट का पुलिंदा हाथ में हैं। सिर्फ जानकारियों, आंकड़ों और सबूतों को खंगालने का काम चल रहा है। डॉक्टर्स दोस्तों की लंबी फेरहिस्त के बाद भी उनके मनोभाव कुछ और ही बयां कर रहे हैं...उनके एथिक्स के बाद भी जो जानकारी जुटा पाया हूं, वह यह है कि भाई को लगातार लकवा के झटके आ रहे थे और वह आईसीयू में था, उसे बचा पाना मुश्किल था? डॉक्टर्स और सभी इस मामले में नकारा साबित हुए।

बहरहाल हम नहीं थे तो क्या कमी थी यहां, हम न होंगे तो क्या कमी होगी। परिजनों का आरोप है कि अगर बचने की संभावना ही नहीं थी तो लाखों की दवाइयां और जांच किस काम का? वेंटिलेटर में रखना शंका को गहरा करता है...रिफर करवा देने की बात के बाद भी डॉक्टर रिफर नहीं कर रहा था। शुरू से ही मृतक के परिजनों को डॉक्टरों और स्टॉफ ने इतना डरा रखा था कि वे अपने बजट के अनुसार कहीं और ले जाने सोच ही नहीं पा रहे थे।

यही कारण है कि लोग धार्मिक अंधविश्वास, बाबाओं से, झाडफ़ूंक, तंत्रमंत्र, जादूटोना और गंडा-ताबिज के पीछे भागे चले जा रहे हैं। और कुछ जानकार होम्योपैथी, ईरानी, आयुर्वेदिक, प्राकृतिक, हर्बल चिकित्सा में शर्तिया इलाज खोज रहे हैं। इतना तो पता चल ही गया था कि मेडिकल का क्षेत्र ताकतवर लॉबी के सिकंजे में हैं। डॉक्टर्स, नर्सिंग होम संचालक, आईएमए, सीएमओ का दफ्तर, दवाई कंपनियां सब एक दूसरें को बचाने में लगे हुए हैं। और अंग्रेजी चिकित्सा व्यवस्था को बदनामी के भेंट चढ़ा दिया गया है।


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  • 04/07/2024 Vinaykumar wasnik

    बहुत सुंदर रिपोर्टिंग की है, हार्दिक बधाई????????

    Reply on 19/07/2024
    जी, शुक्रिया