क्या इस हड़ताल से निजीकरण रूक जायेगा?

विशद कुमार

 

निजीकरण के खिलाफ बैंक कर्मियों का दो दिवसीय हडताल आज समाप्त हुआ। कल बीमा कर्मी भी इसी सवाल पर हडताल करेंगे। सवाल है कि क्या सरकार इस हड़ताल से  निजीकरण का फैसला वापस ले लेगी? सच तो यह है कि मोदी सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग पाया है।

वहीं बैंक के अधिकारियों—कर्मचारियों के संगठन ने जनता से एक अपील की है कि अब समय आ गया है जागृत होने का, आत्मचिंतन, आत्ममंथन और विचार करने और ठोस निर्णय लेने का।

क्योंकि यह केवल बैंक का मसला नहीं है और न ही किसी दल का मुद्दा है। मुद्दा है अपने देश की संपत्ति बिकने का, और देश को पुनः एक बार गुलामी की दलदल में ले जाने का। बैंक के बिकने से सबसे ज्यादा कौन प्रभावित होंगे? कभी आपने सोचा है?

आप एक बार जरूर सोचियेगा। बैंक के राष्ट्रीयकरण के पहले यानी 1969 के पहले देश की क्या स्थिति थी और आज की स्थिति क्या है? हरित क्रांति के कारण, औद्योगिक क्रांति के कारण आज देश हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो चुका।

आपने कभी सोचा कि ऐसा क्यों संभव हो सका?यह केवल और केवल सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों और अन्य सरकारी उपक्रमों के कारण ही संभव हो पाया है। कल तक जो गरीब और मध्यमवर्गीय आय वाले, साहूकारों और महाजनों के चंगुल में जकड़े रहते थे, आज वे उनसे आज़ाद है, किसके कारण? केवल सरकारी बैंकों के उदारवादी नीति के कारण।

आज हमें दलगत भावना से ऊपर उठकर सोचना होगा। क्या हम देश की बागडोर 5% पूंजीपतियों के हाथ में दे सकते है? क्या हम वही पुरानी महाजनी व्यवस्था लाना चाहते हैं? जिसके तहत हमसे ब्याज के साथ  साथ हमारा खून भी चूस लिया जाता था! क्या हम फिर वही समाज बनाना चाहते है?

समाज में फैले आर्थिक विषमता को पाटने का काम भी सरकारी बैंकों ने ही किया है, हर वर्ग, हर धर्म को समभाव दृष्टिकोण से भी देखा है। तो क्या हम चाहते हैं कि हमारा समाज, हमारा राज्य, हमारा देश एक बार फिर आर्थिक, सामाजिक असंतुलन के दौर से गुजरे?

अतः 15 और 16 मार्च के देशव्यापी बैंक हड़ताल को देशहित में जनता के सहयोग की अपेक्षा के साथ संगठन की अपील रही कि देश के अन्नदाता किसान भाइयों, लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ देश के मीडिया कर्मियों, देश के सशक्त प्रहरी वीर जवानों, देश के नागरिकों सरकारी बैंक आपकी अपनी सम्पति है।

इसे बिकने से और पूंजीपतियों के हाथों में जाने से बचा लीजिये।क्योंकि बैंक बिका समझो देश बिका। सन 1600 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी व्यपारी बनकर आया और देश को गुलाम बना लिया।

इस  बार देश के अन्दर के कुछ व्यपारी (अम्बानी, अडानी आदि) देश को गुलाम बनाना चाहते हैं और इसके लिए सरकार की हरी झण्डी भी मिल चुकी है। क्या हम ऐसा होने देंगे? कभी नहीं, कभी नहीं। आपसे बारम्बार अनुरोध है कि आप सभी एक बार फिर आत्ममंथन करें और भारत को पुनः गुलामी की जंजीर में जकड़ने से बचा लें।

 उल्लेखनीय है कि एक ओर मोदी सरकार ने सभी सार्वजनिक संस्थाओं व उपक्रमों का निजीकरण करने का बीड़ा उठा लिया है और बिना किसी प्रतिरोध की परवाह किये अपने रास्ते पर आगे बढ़ती चली जा रही है, इनका सिद्धांत अपनी नीतियों का विरोध स्वीकार करना नहीं है।

वहीं दूसरी ओर आँख बन्द करके मोदी सरकार की हर गतिविधि का समर्थन करने वाला वर्ग निजीकरण के फायदे बताने में अपनी पूरी शक्ति लगा रहा है।

जब मोदीजी ने नारा दिया था कि "मैं देश नहीं बिकने दूँगा" तब भी यह वर्ग समर्थन करता था और जब मोदीजी ने पूर्ण निजीकरण की घोषणा कर दी है, तब भी यह वर्ग मोदी के समर्थन में खड़ा है।

इसका अर्थ यही हुआ कि यह वर्ग नीतियों के आधार पर नहीं व्यक्ति के आधार पर समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है। जिन्हें अपने और देश के भविष्य की जगह मोदी के भविष्य की चिंता है, तो क्या हमें इन कूप मंडूक श्रेणी के लोगों की बातों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है?

इन लोगों की बातों पर ध्यान देने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि कूप मंडूक समाज के निचली कतार के लोगों को ही प्रभावित करते हैं। मोदी का दर्प और प्रतिरोध के प्रति लापरवाही इसी बिंदु पर टिकी है। हम देख चुके हैं कि किस तरह किसानों के आन्दोलन को बदनाम करने के लिए कैसे सभी हथकंडे इस्तेमाल किये गये और किए जा रहे हैं।

मोदी के आभामंडल से घिरे 'कूप मंडूक' समाज के निचली कतार के लोगों के बीच आज भी किसान आंदोलन को देशद्रोही, खालिस्तानी का षडयंत्र बता रहे हैं। जबकि सवाल उठता है कि यदि वे देशद्रोही, खालिस्तानी हैं तो उनसे वार्ता का क्या औचित्य, उन्हें तो तत्काल जेल में डाल दिया जाना चाहिए।
 
दूसरी तरफ कुछ लोग जो अभी इस भ्रम में हैं कि उनके पास तक मोदी के इस कदम की आँच नहीं पहुँचेगी तो समय के साथ उनका भ्रम भी दूर हो जायेगा।

बता दें कि केंद्रीय कर्मचारियों का मँहगाई भत्ता फ्रीज करने का प्रयोग सफलतापूर्वक किया जा चुका है, लेकिन कोई विरोध का स्वर नहीं उठा। अत: वे आगे इसी दिशा में कदम बढ़ने वाले हैं। ऐसा भी समय आ सकता है जब आपको मूल पेंशन पर ही बिना मँहगाई भत्ते के गुजर करना पड़े। देशभक्ति की असली परीक्षा तभी होगी।

इस बावत एक बैंक अधिकारी का मानना है कि अभी केवल दो दिन की हड़ताल को बहुत बड़ी कुर्बानी समझने वाले बैंकरों को यह समझ लेना चाहिए कि इतने से ही काम नहीं चलेगा।

आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था में सरकारी बैंकों का इतना हिस्सा है कि वे अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा करके सरकार के मंसूबों पर पानी फेर सकते हैं। एक-दो दिन की हड़ताल तो वेतन समझौते के लिए भी आवश्यक दबाव नहीं बना सकती। यह एक जबरदस्त संक्रमण काल है आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे।
 

वे आगे कहते हैं कि आज से पहले किसी सरकार को इतना आर्थिक संकट नहीं हुआ, भले सोना गिरवी रखना पड़ा हो, पर आम जनता को इतना दबाव कभी महसूस नहीं हुआ। देखते जाइये यह हिंदू-मुस्लिम का खेल देश को कहाँ ले जाता है!


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