भोरमदेव क्षेत्र में बौद्ध एवं जैन धर्म के प्राचीन अवशेष
दक्षिण कोसल में प्रसिद्ध बौद्ध चीनी यात्री व्हेनसांग
अजय चंद्रवंशीदक्षिण कोसल में बौद्ध धर्म की प्रारंभिक जानकारी प्रसिद्ध चीनी यात्री व्हेनसांग के यात्रा विवरण से मिलती है। व्हेनसांग सातवीं शताब्दी में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में यात्रा की थी। इस दौरान वे क्यिावसलो (कोसल/दक्षिण कोसल) भी आए थे।
प्राचीन काल में दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़ क्षेत्र) में बौद्ध एवं जैन धर्म के पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं।
दक्षिण कोसल में बौद्ध धर्म की प्रारंभिक जानकारी प्रसिद्ध चीनी यात्री व्हेनसांग के यात्रा विवरण से मिलती है। व्हेनसांग सातवीं शताब्दी में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में यात्रा की थी। इस दौरान वे क्यिावसलो (कोसल/दक्षिण कोसल) भी आए थे। अपनी यात्रा विवरण में उसने लिखा है-
राजधानी का क्षेत्रफल 40 ली है..., विधर्मी और बौद्ध दोनों यहां पर हैं जो उच्च कोटि के बुद्धिमान और विद्याध्ययन में परिश्रमी हैं। राजा क्षत्रिय और बुध-धर्म को मान देता है। उसके गुण और प्रेम आदि की बड़ी प्रशंसा है। कोई सौ संघाराम और दस हजार से कुछ ही कम साधु हैं, जो सबके सब महायान संप्रदाय का अनुशीलन करते है। कोई बीस मंदिर अनेक मत के विरोधियों से भरे हुए हैं।
यद्यपि वर्णित कोसल क्षेत्र को लेकर विद्वानों में मतभिन्नता है मगर अधिकांशत: इसे श्रीपुर तथा राजा को महाशिवगुप्त बालार्जुन मानते हैं। बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन का संबंध भी इसी क्षेत्र से जोड़ा जाता है। महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासन काल में बौद्ध धर्म काफी फला -फूला जिसके पर्याप्त अवशेष सिरपुर में दिखाई पड़ते हैं।
इसके अतिरिक्त सातवीं सदी के शासक भवदेव रणकेसरी के भांदक अभिलेख से बुद्ध मंदिर के निर्माण की जानकारी, कलचुरी शासक जाजल्लदेव प्रथम के गुरु रुद्रशिव जो दिङनाग के न्याय के भी ज्ञाता थे, से बौद्ध धर्म के प्रसार की जानकारी मिलती है।छत्तीसगढ़ में बौद्ध अवशेष मुख्यत: सिरपुर, मल्हार, तुरतुरिया भोंगापाल (बस्तर) में मिलते हैं जो मोटे तौर पर उत्तर गुप्तकाल के हैं।
कलचुरी परम शैव थे, इसलिए इस काल में मुख्यत: शैव और वैष्णव संप्रदाय को अधिक महत्व मिला और तदानुरूप मंदिरों का निर्माण हुआ।
छत्तीसगढ़ में जैन धर्म के साक्ष्य के संदर्भ में द्वितीय शताब्दी के कुमार वरदत्त के गुंजी अभिलेख में उल्लेखित ऋषभ तीर्थ को प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ से संबंधित माना जाता है।
छत्तीसगढ़ में जैन धर्म से संबंधित पुरातत्विक साक्ष्य मुख्यत: आरंग (भाड़ देवल मंदिर), नगपुरा, मल्हार, सिरपुर, धनपुर, नेतनगर, उरुसपाल (बस्तर), बकेला में मिलते हैं। ये साक्ष्य मुख्यत: सातवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य के हैं जो सोमवंशी, फणिनागवंशी, कलचुरी, छिंदक नागवंशी काल के हैं। कलचुरियों के परम शैव होने से उनके समय में जैन धर्म के साक्ष्य कम मिलते हैं।
भोरमदेव क्षेत्र के फणि नागवंशियों (9वीं - 15वीं शताब्दी) को कलचुरियों के अधीनस्थ माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से भी वे कलचुरियों की तरह शैव परम्परा से अधिक संबद्ध जान पड़ते हैं। बावजूद इसके भोरमदेव क्षेत्र में वैष्णव और शाक्त परम्परा के देवी देवताओं की मूर्तियां पर्याप्त संख्या में मिली है।
भोरमदेव क्षेत्र में फणि नागवंशियों से पूर्व की स्थिति पर लगभग बात नहीं होती क्योंकि भोरमदेव मंदिर परिसर में इसके साक्ष्य दिखाई नहीं पड़ते, लेकिन पचराही में लगभग सातवीं -आठवीं शताब्दी के सोमवंशी काल के अवशेष मिले हैं। 2008 - 2009 में प्रसिद्ध कंकाली टीला के उत्खनन से ईंट निर्मित जो मूल ढांचा प्राप्त हुआ है उसे कलचुरी पूर्व का उत्तर गुप्त कालीन (सोमवंशी) माना गया है।
उत्खनन के पूर्व भी पाचराही से सोमवंशी कालीन अवशेष प्राप्त हुए थे जो संप्रति खैरागढ़ कला एवं संगीत विश्वविद्यालय के पुरातत्व संग्रहालय में संरक्षित हैं। इनमें द्वारपाल की दो मूर्ति तथा द्वार शाखा के खंड हैं। इनको सातवीं - आठवीं शताब्दी का माना गया है। इस तरह की एक द्वार शाखा का खंड कवर्धा के छोटे राम मंदिर में भी है। सम्भवत: वह भी सोमवंशी कालीन है। वर्तमान में उसके ऊपर पेंट कर देने के कारण पहचानने में समस्या है।
फणि नागवंश के पूर्व यह क्षेत्र किस शासक के अधीन था इसका कोई अभिलेखिय साक्ष्य नहीं मिलता।
यद्यपि फणि नागवंशी, शैव, वैष्णव, शाक्त जैसे देवी -देवताओं के उपासक थे यहीं इसके उत्कर्ष काल (11वीं '2वीं शताब्दी) में बौद्ध एवं जैन प्रतिमाओं का प्राप्त होना उनके धार्मिक सहिष्णुता को प्रकट करता है। अवश्य इस क्षेत्र में बौद्ध उपासकों, विद्वानों, तांत्रिकों का प्रभाव रहा होगा।
बौद्ध प्रतिमाएं (वि. वि. खैरागढ़ के संग्रहालय में संग्रहित)
(1) बुद्ध (अक्षोभ्य)- संग्रहालय में प्रदर्शित अक्षोभ्य बुद्ध की प्रतिमा सिली-पचराही (कवर्धा) से प्राप्त हुई है। यह अनेक स्थानों से खण्डित है, जिसे जोडक़र प्रदर्शित किया गया है। इसका परिमाप 138 x 84 x 45 से.मी. है। यह धूसर बलुआ प्रस्तर पर निर्मित है। ये 12वीं सदी ई. की अनुमानित है। सिंहासन पर पद्मासनस्थ बुद्ध की प्रतिमा भूमिस्पर्श मुद्रा में प्रदर्शित है। बायीं ओर से प्रतिमा खण्डित है।
पीछे प्रभामण्डल में कमल पुष्प का अंकन है। बुद्ध के कुंचित केश, कर्ण की लोर लम्बी और गले में तीन रेखाओं का अंकन है, जो महापुरूष की परिचायक है। बुद्ध ने चीवर धारण कर रखा है। ध्यानावस्थित बुद्ध के नेत्र अर्द्धनिमीलित है। मुख मुद्रा शांत एवं गम्भीर है। पादपीठ पर वज्र का अंकन है, जिससे प्रतीत होता है कि यह अक्षोभ्य है तथा वज्रयानी है। सिंहों के नीचे परम्परागत बौद्ध मंत्र उत्कीर्ण है।
‘ये धर्मा हेतु प्रभवा हेतुं तेषां तथागतो ह्यावचत्,
तेषां च यो निरोध: एवं भवादीत् महाश्रमण:
दाहिने परिकर में बुद्ध के जीवन से संबंधित घटनाओं को सुन्दरता से उकेरा गया है। ऊपर से नीचे की ओर क्रमश: महापरिनिर्वाण, सन्यासी वेश में अनुचरों सहित भ्रमण करते हुए, धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में, दो मृगों के मध्य चक्र का अंकन है। नीचे खड्ग लिए पुरूष, मल्ल युद्ध, कपि आदि का अंकन है। पादपीठ पर उपासक-उपासिकाओं का अंकन किया गया है। यह प्रतिमा मार-विजय के प्रसंग से संबंधित है।
(2) तारा- सिली-पचराही से प्राप्त धूसर बलुआ प्रस्तर पर निर्मित प्रतिमा का परिमाप - 115x83x48 से.मी. हैं। यह 12वीं शती ई. की अनुमानित है। बौद्ध देवी तारा की बहुअलंकृत एवं कलात्मकता से परिपूर्ण प्रतिमा कमल पर ललितासन में विराजमान है।
देवी का सिर बायीं ओर झुका हुआ दोनों हाथ आंशिक रूपों से तथा दाहिना पैर कमलाकृति युक्त पादपीठ पर स्थित है। प्रतिमा करंडमुकुट, कंठहार, स्तनहार, केयर, वलय, कटिमेखला पादवलय एवं पादजालक आदि से सुशोभित है।
देवी के पार्श्व भाग में प्रभामंडल सुरक्षित परन्तु उर्ध्वभाग खंडित है। नीचे की ओर सेविकाओं का अंकन तथा पादपीठ के समीप लता - वल्लरी का अलंकरण है। पादपीठ के नीचे की ओर वादन एवं नर्तन का दृश्य अंकित है। समीप में उपासक एवं उपासिका अंजलीबद्ध मुद्रा में अंकित है। पादपीठ पर उत्कीर्ण लेख इस प्रकार हैं-
‘ये धर्म हेतु प्रभवा हेतुं तेषां तथागतो ह्यावचत्,
तेषां च यो निरोध: एवं भवादीत् महाश्रमण:’
जिस प्रकार हिन्दुओं में लक्ष्मी को जो स्थान प्राप्त है वही स्थान बौद्धों में तारा को प्राप्त है।
(3) द्वारपाल (शीर्षविहीन) - कवर्धा से प्राप्त पीला बलुआ प्रस्तर पर उत्कीर्ण प्रतिमा का माप 112x 62x 23 से.मी. है। यह लगभग 7वीं शती ई. की प्रतीत होती है।शीर्षविहीन चतुर्भुजी एवं स्थानक प्रतिमा का बायाँ पैर कुछ मुड़ा अवस्थित है।दक्षिणाध: क्रम से दाहिना निचला हाथ वक्ष:स्थल पर वितर्क मुद्रा में, दाहिना ऊपरी हाथ में भाला (खण्डित), ऊपरी बायाँ हाथ खण्डित, निचले बायें हाथ से वस्त्र-पट्ट पकड़े हुए हैं। अधोवस्त्र (धोती) पाद तक विस्तारित है। प्रतिमा कंठहार, एकावलि, केयूर, वलय तथा यज्ञोपवीत से सुशोभित है।
(4) द्वारपाल- कवर्धा से प्राप्त पीला बलुआ प्रस्तर पर उत्कीर्ण प्रतिमा का माप 196x62x23 से.मी. है। यह लगभग 7वीं शती ई. की है। चतुर्भुजी स्थानक प्रतिमा का दाहिना पैर कुछ झुका हुआ है। प्रतिमा की मुखमुद्रा अण्डाकार अर्धनिमीलित नेत्रयुक्त है। शीर्ष के पार्श्व में प्रभामण्डल उत्कीर्ण है। सिर पर बालों का जूड़ा बंधा है।
प्रतिमा का दाहिना निचला हाथ वक्ष:स्थल पर वितर्क मुद्रा में, दाहिने ऊपरी हाथ में भाला, बायाँ ऊपरी हाथ कलाई से खण्डित तथा बायें निचले हाथ से वस्त्र-पट्ट को थामें है। प्रतिमा मुकुट, कुण्डल, कंठहार, एकावलि, केयूर, वलय तथा यज्ञोपवीत से आभूषित है। प्रतिमा कलात्मक रूप से समानुपातिक एवं सुन्दर है।
द्वारपाल की उक्त दोनों प्रतिमाएं कवर्धा से प्राप्त हुईं थीं, जो हमारी समझ से पचराही से कवर्धा लायी गई रही होंगीं।
अन्य मूर्ति
(1) ध्यानी बुद्ध - डॉ सीताराम शर्मा ने भोरम देव क्षेत्र - पश्चिम दक्षिण कोसल की कला में इस मूर्ति का वर्णन किया है। उस समय यह मूर्ति राजमहल कवर्धा में थी। वर्तमान में यह कहां है इसकी हमें जानकारी नहीं। सीताराम शर्मा ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है-
प्रतिमा अभिधान - ध्यानी बुद्ध
काल - लगभग 12 वीं ई. सदी
प्रतिमा सामग्री - काले रंग का चिकना पत्थर
कवर्धा राजमहल (मोतीमहल ) में संग्रहित अनेक मूर्तियों में यह भी उल्लेखनीय प्रतिमा है। भगवान बुद्ध पद्मासन में बैठे हैं, उनके सिर पर कुंचित केश और केशान्त में जुड़ा बंधा हुआ है। इनके लम्बे कर्ण कंधे को स्पर्श करते हुए अंकित हैं। दोनों हथेलियां एक पर एक धरी हुई पाद तल पर अवलंबित हैं।
चौड़ा वक्षस्थल, क्षीण कटि और मांसल देहयष्टि न्यानाभिराम है। मुख मण्डल के दोनों ओर आकाशचारी आकृतियाँ माला लिए हुए है। इन्हे गन्धर्व या विद्याधर होना चाहिए। नीचे के दोनों पार्श्वों में दो स्त्री आकृतियां है। संभवत: इन्हे तीन देवियों के अंतर्गत (कुरूकुल्ला, भृकृटि, महासितवती) कोई भी दो देवियां होना चाहिए। बुद्ध के शीर्षभाग के पीछे वर्तुलाकार प्रभामंडल है।
जैन प्रतिमाएं (वि. वि. खैरागढ़ के संग्रहालय में संग्रहित)
भोरमदेव क्षेत्र में जैन प्रतिमाएं मुख्यत: बकेला-पचराही से प्राप्त हुई हैं। पचराही-बकेला संलग्न ग्राम हैं। हाफ नदी के दाहिने किनारे पर पचराही तथा बाएं किनारे पर बकेला ग्राम स्थित है। इसके अलावा फणि नागवंश के वृहत क्षेत्र को लिया जाय तो दक्षिण में बोरतलाव, डोंगरगढ़, पुतली-पुलिया, कृतबांस, बिरखा, गंडई से भी जैन पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इससे पता चलता है कि दक्षिण पश्चिम कोसल में फणि नागवंश के शासन काल में जैन धर्म की भी प्रतिष्ठा थीं और इस क्षेत्र की मूर्तिकाल में भी उसका अहम योगदान हैं।
(1) ऋषभनाथ (पद्मासन) - इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ में प्रदर्शित ऋषभनाथ (आदिनाथ )की प्रतिमा घोरतलाब (डोगरगढ़) से प्राप्त हुई है। भूरे बलुए प्रस्तर पर निर्मित यह प्रतिमा समानुपातिक है तथा लगभग 65x55x20 से.मी. परिमाप की है। शीर्षविहीन ऋषभनाथ ऋषभनाथ को चौकी पर पदमासनस्थ दिखाया गया है। इस प्रतिमा में केशराशि दोनों स्कन्धों पर गिरी हुई है। वक्ष: स्थल पर श्रीवत्स चिह्न का अंकन है।
अधोभाग में दोनों पार्श्वों में एक-एक लघु आकृति उपासकों की है। क़टि पर अधोवस्त्र इस बात का प्रमाण है कि यह प्रतिमा श्वेताम्बर सम्प्रदाय से संबंधित हैं। यह प्रतिमा लगभग 12वीं शती ई. की है। ब्रह्माणपुराण में ऋषभदेव पृथ्वी पर क्षत्रियों के आदि पुरूष माने गये हैं। उनके सौ पुत्रों में से भरत सबसे बड़े थे। (ब्रह्माण पुराण पर्व 11, 14)। शिवपुराण में ऋषभनाथ शंकर के योगावतारो में से एक माने गये है।
(शिवपुराण पर्व 11, 9. 3)
(2) ऋषभनाथ (कायोत्सर्ग) - कवर्धा से प्राप्त आदिनाथ की यह प्रतिमा दिगम्बर सम्प्रदाय से संबंधित है। इसका परिमाप 100x36x23 से.मी. है। यह प्रतिमा निर्माण की दृष्टि से असमानुपातिक है। इसका उर्ध्वभाग लघु तथा अधोभाग अपेक्षाकृत लम्बवत् हैं। इस कायोत्सर्ग प्रतिमा के उर्ध्वभाग में अलंकृत छत्रावली है, जिसके ऊपर की ओर मृदंगवादक का अंकन है। छत्र के उभय पार्श्वों में अलंकृत हाथियों का सुन्दर अंकन है, जो जलाभिषेक कर रहे हैं। मस्तक के उभय पार्श्वों में उडिड्यान विद्याधरों का अंकन है। आदिनाथ ध्यान मुद्रा में अवस्थित हैं।
शीर्ष तथा स्कन्ध पर कुंचित केशराशि विस्तृत है। गले में त्रिवली का स्पष्ट अंकन है। वक्ष के मध्य में अलंकृत श्रीवत्स चिह्न दृष्टव्य है। वक्ष:स्थल चौड़ा तथा चूचुक वृत्तांकित है। भुजाएँ अजानुबाहु है। कटि क्षीण तथा नाभि-प्रदेश मांसल है। प्रतिमा के पादपीठ के दोनों ओर स्थानक चंवरधारी उत्कीर्ण है तथा उनके आगे अंजलि मुद्रा में उपासक एवं उपासिका प्रदर्शित है।
(3) धर्मनाथ- कृतबाँस (गण्डई) से पन्द्रहवें तीर्थंकर धर्मनाथ की पद्मासनस्थ प्रतिमा प्राप्त हुई है, जो सम्प्रति इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ संग्रहालय में प्रदर्शित है। प्रतिमा का परिमाण 120x72x40 से.मी. है। ये भूरे बलुआ प्रस्तर पर निर्मित है। धर्मनाथ की इस प्रतिमा में उनके दोनों हाथ एक दूसरे के ऊपर पैरों के तलुओं पर अवस्थित है। उनके शीर्ष पर कुंचित केश राशि अर्धनिमिलित नेत्र, कानों की लम्बी लोर (कर्णचाप), वक्ष:स्थल पर श्रीवत्स का चिहन् अंकित है। पार्श्व में सादा वृत्तायत प्रभा मण्डल का अंकन है। प्रतिमा की नाभि गहन तथा शारीरिक सौष्ठव, समानुपातिक एवं आकर्षक हैं। मुख आंशिक क्षरित है।
प्रतिमा फलक के उर्ध्वभाग में अलंकृत त्रिछत्रावली तथा मृदंगवादक का अंकन है। उनके उभय पार्श्व में दो गजों द्वारा पवित्र जल से जलाभिषेक किया जा रहा है। गजारोहियों की भी लघु आकृतियां अंकित है। मस्तक के दोनों पार्श्वो में उडिड्यान - मालाधारी गन्धर्वों का अंकन है। स्कन्धों के उभय पार्श्व में लघु तीर्थकर प्रतिमाएं पद्मासनस्थ उत्कीर्ण है। उनके नीचे दोनों ओर स्थानक चामरधारी परिचारक प्रदर्शित है।
प्रतिमा फलक के अधोभाग में पादपीठ पर मध्य में वज्र का अंकन है। उनके नीचे उपासिकाओं, सिंह तथा गजों का मनोहारी प्रदर्शन है। शिल्प की दृष्टि से प्रतिमा अत्यन्त आकर्षक सुघढ़ एवं भव्य है। कालक्रम की दृष्टि से प्रतिमा 12वीं शती ई. की अनुमानित हैं।
(4)पार्श्वनाथ- तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा सर्प की गेण्डुरी (कुण्डली) पर पद्मासन में विराजमान है। शान्त मुद्रा में परमेष्ठि पार्श्वनाथ के दोनों हाथों की हथेलियां एक दूसरे पर रखी हुई पैरों के तलुए पर अवस्थित है जिस पर शुभ चिह्न का अंकन है । मुख भाग अंशत: खण्डित है। प्रतिमा के शिरोभाग पर सप्तफणों का आटोप है। मुख, बायाँ वक्षभाग, बायाँ हाथ एवं बायां परिकर खण्डित है। कर्ण लोर स्कन्ध को स्पर्श करती हुई प्रदर्शित है। गले में त्रिवली तथा वक्ष पर श्रीवत्स का अंकन हैं शीर्ष के पीछे अलंकृत प्रभामण्डल उत्कीर्ण है।
प्रतिमा के उर्ध्वभाग में त्रिछत्रावली है, पार्श्वनाथ 12वीं शती ई. डोंगरगढ़ ऊपर में मृदंगवादक को दिखाया गया है। उसके दोनों पार्श्वों में गजों द्वारा जलाभिषेक किया जा रहा है। नीचे मालाधारी गन्धर्व उड़ते प्रदर्शित है, जिसमें दायें भाग का गण अवस्थित है बायां भाग खण्डित है। परिकर के मध्य भाग में दोनों और स्थानक मुद्रा में तीर्थंकर को प्रदर्शित किया गया है। दाहिने परिकर में इनके ऊपर पद्मासनस्थ तीर्थंकर प्रदर्शित है। प्रतिमा के अधोभाग में सिंहासन प्रदर्शित है। तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ जो एक ऐतिहासिक महापुरुष थे, को प्रोफेसर रिज डेविड्स ने जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक बताया है।
(5) तीर्थंकर प्रतिमा- कवर्धा से प्राप्त तीर्थकर प्रतिमा विश्वविद्यालय संग्रहालय में प्रदर्शित है। भूरे बलुए प्रस्तर पर निर्मित इस प्रतिमा का परिमाण 74x49x18 से.मी. है। कुंचित केश, सादा प्रभामण्डल अर्धउन्मीलित नेत्र तथा लम्बी कर्णलोर स्कन्ध को स्पर्श करती प्रदर्शित है। मुख पर शांति का भाव है। दोनों हाथ एक दूसरे पर पैरों के तलुए पर अवस्थित है। प्रतिमा के उर्ध्वभाग में त्रिछत्रावली तथा उसके दोनों ओर गजों द्वारा जलाभिषेक का दृश्य अंकित है। प्रतिमा के पादपीठ पर नागिरी लिपि मैं दो पंक्ति का लेख उत्कीर्ण है।
अन्य मूर्तियां
(1) पार्श्वनाथ की मूर्ति - बकेला से प्राप्त यह मूर्ति वर्तमान में पंडरिया के जैन मंदिर में अवस्थित है।इसका क्षेत्रीय नामदेव गनगुरु है।इस मूर्ति का वर्णन डॉ सीताराम शर्मा ने इस प्रकार किया है-
प्रतिमा –अभिधान - जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ
आकार - 4 फूट ल. 2 फूट चौ.
स्थान - बकेला(बोड़ला)
काल - लगभग 11वीं सदी
प्रतिमा सामग्री - काले रंग का चिकना पत्थर
ग्राम सिलीपचराही से लगभग 2 किमी उत्तर की ओर हांप नदी के किनारे बकेला ग्राम के सीमान्त में पार्श्वनाथ की मूर्ति भग्नावस्था में प्राप्त हुई थी। यह मूर्ति श्रभिलेखसहित है जो सम्प्रति पंडरिया (बिलासपुर) में नवनिर्मित जैन मन्दिर में प्रतिष्ठित कर दी गई है। यह मूर्ति पद्मासन की स्थिति में है । दोनों हथेलियां एक साथ (बांयी हथेली के ऊपर दाहिनी हथेली) पैर के तलुओं से टिकी हुई है।
सिर के ऊपर सर्पफण का आटोप है। दोनों पाश्र्वों में मालाधारी विद्याधर-प्राकृतियां बनी हैं। कान लम्बे तथा दोनों कन्धों को स्पर्श कर रहे हैं । वक्षस्थल उभरा हुआ तथा श्रीवत्स के प्रतीकचिह्न से युक्त है। नेत्र प्रर्द्ध-निमीलित हैं तथा नासिकाग्र बताया गया है । चौकी के नीचे अभिलेख है जिसमें ‘देवगनगुरू’ भी उत्कीर्ण है। लिपि 11 वीं'2वीं सदी की देवनागरी में इस अभिलेख को उत्कीर्ण किया गया है। आसपास के लोग अभिलेख में प्रयुक्त देवगनगुरू शब्द के कारण प्रतिमा का नामकरण उक्त नाम से ही जानते हैं।
इस अभिलेख में प्रतिमा-निर्माण तथा मन्दिर में प्रतिष्ठित करने वाले व्यक्ति के पुण्यों का उदय होने का उल्लेख किया गया है। इस क्षेत्र की जैन-प्रतिमाओं में यह विशिष्ट कोटि की है जिसकी साम्यता नगपुरा (दुर्ग) स्थित पार्श्वनाथ प्रतिमा से की जा सकती है।
(2) अष्टधातु निर्मित महावीर स्वामी की मूर्ति - कवर्धा के जैन मंदिर में स्थापित यह मूर्ति इस क्षेत्र की एक मात्र धातु निर्मित जैन प्रतिमा है। इस मूर्ति के बारे में डॉ सीताराम शर्मा ने लिखा है।
प्रतिमा–अभिधान - जैन तीर्थंकर स्वामी महावीर
स्थान - जैन मंदिर कवर्धा
आकार - 3 फूट ल. और 2 फूट चौ.
काल - लगभग 15वीं या 16वीं ई. सदी
प्रतिमा–सामग्री - अष्टधातु निर्मित
तीर्थंकर महावीर को पद्मासन की स्थिति में दिखाया गया है। दोनों हथेलियां एक दूसरे के ऊपर तलुओं से टिकी हुई हैं। सिर के पीछे आरेदार प्रभामण्डल दिखाई देता है । इनका सिर मुण्डित है। कर्णाभूषण कन्धे तक लटक रहे हैं। वक्षस्थल उभरा हुआ तथा श्रीवत्स के चिह्न से विभूषित है। देहयष्टि सुडौल और मांसल है। शीर्षभाग पर दोनों श्रोर गज अभिषेक कर रहे हैं। उनके नीचे दोनों श्रोर पद्मासन की स्थिति में दो यति बने हुए हैं तथा उसके नीचे उपासक दम्पति अंकित हैं।
सबसे नीचे भाग पर यक्षसदृश्य आकृतियां हैं, जिनके दोनों छोरों पर सिंह की आकृतियाँ हैं। चौकी के नीचे मृदंग वादन करते हुए दो पुरुष आकृतियाँ भी बनी हैं। मूर्तिकला में धातु का प्रयोग उत्कृष्टता के साथ किया गया है। यह प्रतिमा इस क्षेत्र की एकमात्र धातुनिर्मित जैनप्रतिमा है।
(3) घटियारी से प्राप्त जैन तीर्थंकर – सीताराम शर्मा के समय (1990 से पूर्व) यह प्रतिमा मंदिर परिसर में थी।वर्तमान में यह कहां है इसकी जानकारी मुझे नहीं है। इस मूर्ति के बारे में डॉ सीताराम शर्मा ने लिखा है-
मन्दिर प्रांगण में जैन तीर्थंकर की इस दिगम्बर प्रतिमा को स्थानक और समपाद स्थिति में अंकित किया गया है। इसे कायोत्सर्ग मुद्रा कहा जा सकता है। प्रतिमा सुडौल और मांसल शरीर लिए हुए है। वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न दिखाई दे रहा है। मुखमण्डल खण्डित है परन्तु प्रभा-मण्डल का आरेखण स्पष्ट है। बांयी ओर मालाधारी गन्धर्व को प्रदर्शित किया गया है।
नीचे दोनों ओर उपासक आकृतियाँ हैं। चौकी के नीचे मध्य भाग पर उपासक युगल को भी अंकित किया गया है । अर्हत प्रतिमा (तीर्थंकर) के सभी सामान्य लक्षण इस प्रतिमा में देखे जा सकते हैं, जिसका वर्णन वृहत्संहिता में भी मिलता है।
घटियारी शिवमन्दिर प्रांगण में इस प्रतिमा का विद्यमान होना अनेक संभावनाओं की ओर संकेत करता है-
1. समीपस्थ टीलों में कोई जैनमन्दिर का अवशेष छिपा हो।
2. धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक स्वरूप उक्त जिन-प्रतिमा को मन्दिर प्रांगण में स्थापित किया गया हो।
3. इस परिक्षेत्र में दिगम्बर सम्प्रदाय से सम्बन्धित जैन धर्मावलम्बियों की आबादी घन रही हो।
(4) इसी तरह भोरमदेव मंदिर परिसर संग्रहालय में भी जैन तीर्थंकरों की खंडित प्रतिमाएं देखी जा सकती है। डॉ सीताराम शर्मा के अनुसार भोरमदेव मंदिर के बाह्य दीवारों में उत्कीर्ण कुछ प्रतिमाओं को जैन तीर्थंकरों के रूप में माना गया है।पचराही उत्खनन में भी कुछ जैन धर्म से संबंधित स्थापत्य खंड प्राप्त हुए हैं। इस संबंध में ’Excavation At Pachrahi’ में उल्लेखित है।
Jain Image Slab
...The excavation in area III at Pachrahi revealed a slab contains two Jain figures. This slab is made up of sand stone. The two Jain figures are separated from each other by a rounded pillar. The scholars identified first one as Jain Tirthankar and second one as Jaina sadhu. The elongated limbs and ears shows its artistic view. The second one wears perhaps rounded ear rings.
(5) जिला पुरातत्त्व संग्रहालय राजनांदगांव मे तीन जैन प्रतिमाएं संग्रहित हैं.
1. स्थानक तीर्थंकर - पुतली पुलिया से प्राप्त , 106x 28 x 26 से.मी. बलुआ प्रस्तर, 11'2वी शती ई.
2. जैन तीर्थंकर- दिग्विजय स्टेडियम, राजनांदगांव, से प्राप्त, 56x 67 x 25 से.मी., काला प्रस्तर, 11'2वीं शती ई.
3. समपदस्थानिक आदिनाथ - कठुवा पुलिया (पाटेकोहरा), डोंगरगढ़ 77x 44 x 27 से.मी., बलुआ प्रस्तर, 13'4वी शती ई.
ऐसी मान्यता हैं कि दिग्विजय स्टेडियम मे स्थापित मूर्तियां भोरमदेव क्षेत्र से ले जायी गईं थीं।
भोरमदेव क्षेत्र में पचारही–बकेला में बौद्ध-जैन प्रतिमाएं अधिक मिली हैं, भोरमदेव में कम, इससे प्रतीत होता है कि पचराही इनका अधिक महत्वपूर्ण स्थल रहा होगा। इधर दक्षिण दिशा में आगे बढऩे पर गंडई, घटियारी,खैरागढ़ क्षेत्र में भी इन प्रतिमाओं की संख्या अधिक दिखाई पड़ती है। पचराही का इतिहास सोमवंशी काल से पता चलता है। उस काल के प्राप्त स्थापत्य खंड और प्रतिमाओं को बौद्ध स्थापत्य माना गया है। आगे 11 वीं 12वीं सदी में दोनो धर्मों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। इनसे इस क्षेत्र में तत्कालीन समय में इन धर्मों के प्रभाव का पता चलता है।
संदर्भ
(1) जैन प्रतिमाएं(ब्राउजर) इंदिरा कला संगीत विश्व विद्यालय खैरागढ़ - डॉ. आशुतोष चौरे (संग्रहालयाध्यक्ष)
(2) बौद्ध प्रतिमाएं (ब्राउजर) इंदिरा कला संगीत विश्व विद्यालय खैरागढ़ - डॉ. आशुतोष चौरे (संग्रहालयाध्यक्ष)
(3) भोरमदेव क्षेत्र पश्चिम दक्षिण कोशल की कला - डॉ. सीताराम शर्मा (1990)
(4) Excavation At Pachrahi - S. S. Yadav, Atul pradhan (2010)
(5) सिहावलोकन - राहुल कुमार सिंह (2019)
(6) विवरणिका जिला पुरातत्त्व संग्रहालय राजनांदगांव

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