ज़िंदा हैं बटला हाउस एनकाउंटर पर जवाब खोजते ये सवाल
रिजवान रहमानबटला हाउस एनकाउंटर फ़र्ज़ी नहीं था. देश की सुप्रीम अदालत ने कह दिया है. उसके बाद हिंदी बेल्ट ने समवेत गर्जना के साथ हमें बता दिया है कि देखो कुछ भी फ़र्ज़ी नहीं था. किसने कहा फ़र्ज़ी था सब कुछ. मौतें तो वास्तविक थीं. पकड़े भी वास्तविक लोग ही गए, साबुत जीते जागते इंसान. यातनाएं वास्तविक थीं और अब जो क्षोभ भय, सन्नाटे और आशंका लोगों के ज़ेहन में है, वो भी वास्तविक है. लेकिन मीडिया को न जाने ये अनयूज़्अल स्टोरीज़ क्यों नहीं दिखती. उसका काम शायद सतह की हरकतों से चल जाता है. अंडर करेंट्स हमेशा से कितनी तीव्र बहती रही हैं.

19 सितम्बर 2008 की तारीख़ को बाटला हाउस इलाक़े में L'8 बिल्डिंग. फ़्लैट नंबर 108 में दिल्ली पुलिस की एक स्पेशल टीम दाख़िल होती है. पुलिस के मुताबिक़ फ़्लैट में पांच लोग मौजूद थे. दोनों ओर से गोलीबारी शुरू हुई. पुलिस ने दो कथित आतंकियों आतिफ़ और साजिद को मौके पर मार गिराया. स्पेशल सेल के इंस्पेक्टर मोहन चंद वर्मा को गोली लगी. इंस्पेक्टर को अस्पताल ले जाया गया जहां कुछ ही घंटों में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गयी. पुलिस ने यह भी कहा कि दो कथित आतंकी मौक़े से भागने में सफल रहे और एक को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया. 24 साल का आतिफ जामिया में एम.ए ह्यूमेन राईट्स फस्ट एयर का छात्र था और 17 साल का साजिद दसवीं की पढाई करके ग्यारहवीं में दाखिले के लिए आया था.
क्या हैं जवाब खोजते सवाल ?
1. क्या पुलिस को पहले से पता था की उस जगह ‘खूंखार आतंकी’ छिपे हैं?
2. अगर हाँ, तो पुलिस ने अपने शुरुआती बयानों में क्यों कहा कि वो तो सिर्फ रेकी करने गए थे लेकिन ‘आतंकियों’ ने गोली चला दी इसलिए जवाबी कार्यवाही करनी पड़ी.
3. और अगर नहीं तो घटना के दो-तीन घंटे के अन्दर ही कैसे पुलिस ने ये घोषित कर दिया कि मारे जाने वाले आतंकी थे?
4. अगर पुलिस ने आतीफ के मोबाइल को 26 जुलाई 2008 से सर्विलांस पर रखे होने का दावा किया था, तो इन लोगों 13 सितम्बर का सीरियल ब्लास्ट कैसे किया? पुलिस ने उन्हें पहले गिरफ्तार क्यों नहीं किया? क्या पुलिस बम धमाकों के इंतज़ार में थी?
5. साजिद और आतिफ के शरीर पर मिले चोट, ज़ख्म और गोलियों के निशान क्या बताते हैं?
6. साजिद के सर में ऊपर से मारे गए 5 गोलियों के निशान हैं जो कैसे संभव हुआ? क्या साजिद को घुटनें के बल बिठाकर सर के ऊपर से गोली मारी गई? इस पर दिल्ली पुलिस का जवाब आया कि ऑपरेशन के दौरान साजिद सीने के बल लेटकर गोलियां चला रहा था जिससे गोलियां सीधे उसके सर में जाकर लगीं.
7. आतिफ के पीठ की चमड़ी पूरी तरह कैसे छिली? पैर पर भी ताज़े ज़ख्म के निशान पाए गए जिससे लगता है कि दिल्ली पुलिस ने मारने के पहले आतिफ़ को टॉर्चर किया था.
8. दो कथित ‘आतंकी’ कैसे भागे? जबकि पुलिस का दावा है कि ऑपरेशन से पहले उस गली को पूरी तरह से घेर लिया गया था.
9. पुलिस ने दावा किया कि साजिद, जिसकी उम्र 17 साल थी, बम बनाने में माहिर था. ऐसे में सवाल उठता है कि वहां से बम बनाने वाली चीज़ बरामद क्यों नहीं हुई?
10. ऑपरेशन के बाद घटनास्थल से कई क़िस्म के हथियार और विस्फोटक बरामद किए गए. लेकिन हर मीडिया रिपोर्ट में एक एके-47 के अलावा, रिवाल्वर, तमंचे, ज़िंदा कारतूस, मैगज़ीन और विस्फोटक की मात्रा में अलग-अलग थी. ऐसे में सवाल उठता है कि हथियारों की असल संख्या क्या है जिस पर पुलिस की ओर से कोई पुख़्ता जवाब नहीं मिले.
11. दोनों पक्षों की ओर से कितने राउंड फ़ायरिंग हुई, इस बारे में भी कोई पुख़्ता संख्या नहीं मिलती है.
12. क्या बम बनाने की क़ाबिलियत रखने वाले आरोपियों का सामना करने पुलिस महज़ सर्विस रिवाल्वर लेकर गयी थी?
और सबसे बडा सवाल तो इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा की मौत है
1. ऑपरेशन के समय पुलिस अधिकारियों ने बुलेटप्रूफ़ जैकेट क्यों नहीं पहने थे?
2. इस पर दिल्ली पुलिस की तरफ से पहले सफाई मिली कि अगर इतनी तैयारी से पुलिस मौक़े पर छापा मारती तो आतंकी अलर्ट हो जाते. लेकिन इसके बाद एक और बयान में कहा गया कि स्पेशल टीम के सभी अधिकारियों ने बुलेटप्रूफ़ जैकेट पहनी हुई थीं बस इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा ने नहीं पहनी थीं. अब सवाल ये है कि अगर पुलिस की जानकारी पुख़्ता थी कि बाटला हाउस के फ़्लैट में आतंकी छिपे हुए हैं तब भी पुलिस ने बुलेटप्रूफ़ जैकेट नहीं पहनने का रिस्क क्यों लिया?
3. पुलिस ने अपनी कहानी में बताया था कि शहज़ाद के पिस्तौल से एमसी शर्मा की मौत हुई जो भाग गया. जबकि बैलिस्टिक रिपोर्ट के मुताबिक इंस्पेक्टर एमसी शर्मा के जिस्म में पाई गई गोली उसी पिस्तौल से चली थी जो मौका-ए-वारदात से हासिल हुई थी. अब अगर शहज़ाद अपनी पिस्तौल लेकर फरार हो गया था तो ज़ाहिर है कि मौका-ए-वारदात से हासिल पिस्तौल उसकी नहीं थी. इससे शक उठता है कि शर्मा का क़त्ल किसने किया.
4. यह कैसे संभव हुआ कि शर्मा को गोली लगने के बाद भी उन्हें अपने पैरों पर चलाकर चार मंजिल इमारत से नीचे लाया गया और खून का एक कतरा भी नहीं गिरा.
5. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार शर्मा शाम पांच बजे तक बिल्कुल खतरे से बाहर थे तो शाम सात बजे अचानक उनकी मौत कैसे हो गई?
6. रिपोर्ट के अनुसार पेट में गोली लगने से खून का ज्यादा बहाव हुआ और यही मौत का कारण बना. अब फिर यह सवाल उठता है कि जब शर्मा को 10 मिनट के अन्दर मेडिकल सहायता मिल गई थी, ऐसे में संवेदनशील जगह (Vital part) पर गोली न लगने के बावजूद भी उनकी मौत कैसे हो गई? कैसे उनके शरीर से 3 लीटर खून बह गया?
7. इसी कड़ी में सबसे बड़ा सवाल इंस्पेक्टर शर्मा के घावों के बारे में होता है कि उन्हें लगी गोली के निशान कहां थे?
8. इंस्पेक्टर शर्मा को पास के ही होली फ़ैमिली अस्पताल ले जाते हुई एक तस्वीर है जिसमें क़मीज़ पर कहीं भी गोली लगने की वजह से घाव या ख़ून के धब्बे दिखाई नहीं दे रहे हैं. इस पर दिल्ली पुलिस ने कहा कि उन्हें गोली सामने से लगी थी और शरीर को बेधकर पीछे से निकल गयी थी. इसलिए ये प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि इंस्पेक्टर शर्मा के अंदरूनी घाव का राज क्या है.
जांच पर सवाल
1. मानवाधिकार आयोग केवल पुलिस से बातचीत के आधार पर रिपोर्ट कैसे दे सकता है. किसी और से पूछताछ किए बगैर एनकाउंटर को कैसे सही ठहरा सकता है.
2. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के गाइडलाइंस के अनुसार प्रत्येक अप्राकृतिक मौत की तरह इस घटना की भी मजिस्ट्रियल जांच क्यों नहीं करवाई गई?
3. सरकार ने ज्यूडिशियल जांच कराने की मांग क्यों नहीं मानी. क्या यह अपने आप में एनकाउंटर को फर्ज़ी मानने के लिए काफी नहीं है?
4. हैरत की बात है कि पुलिस और सरकार एमसी शर्मा की मौत को भी बराबर नज़रअंदाज़ किया गया.
5. साजिद के सिर पर पाँच गोलियाँ लगी थीं, अगर यह एनकाउंटर था तो सिर पर पाँच गोलियाँ कैसे मारी गईं'. 2012 में जब यह विवाद छिड़ा तो तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम ने इस मामले में फिर से जाँच शुरू करने को नकार दिया था. तब दिल्ली के लेफ़्टीनेंट गवर्नर तेजेंद्र खन्ना ने कहा था कि इस मामले की जाँच की कोई ज़रूरत नहीं है.
6. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रधननमंत्री तक ने जाँच की ज़रूरत से इनकार कर दिया था.
क्या कहती है आतंकी मामलें पर ‘जामिया टीचर्स सोलिडारिटी असोसिऐशन’ (JTSA) की रिपोर्ट
स्पेशल सेल की कार्यशैली पर ‘जामिया टीचर्स सोलिडारिटी असोसिऐशन’ (JTSA) ने एक रिपोर्ट जारी किया था जिसका नाम है Framed, Damned, Acquitted: Dossiers of a very ‘Special’ Cell. स्पेशल सेल के करतूतों को उजागर करती JTSA की ये रिपोर्ट, कोर्ट द्वारा दिए गए फौसलों पर आधारित एक शोध है जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि पुलिस फर्जी केस बनाने और फर्जी एंकाउंटर करने में माहिर हैं. इसमें उन 16 मुक़दमो की पड़ताल की गयी है जिसमे पहले-पहल पुलिस ने दावा किया था कि पकड़ा गया व्यक्ति ‘खूंखार आतंकी’ है जिनका ताल्लुक अन्तराष्ट्रीय आतंकी संगठन से है, और ये लोग एक नहीं बल्कि कई बड़ी ‘आतंकी घटना’ अंजाम देने वाले थे पर हमारी बहादुर पुलिस ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर इन्हें धर दबोचा. लेकिन हकीकत है कि अदालतों में साबित हुआ कि इन व्यक्तियों का ऐसी किसी गतिविधि से दूर-दूर तक का कोई लेना देना नहीं है. कोर्ट ने कई मामलो में आरोपियों को बरी करते हुए साफ़ तौर पर कहा, “पुलिस वालों ने इन्हें जान-बूझकर फर्जी मुकदमों फसाया. ”
इन 16 में से दो आरोपी ऐसे हैं, जिन्हें अपने जवानी के चौदह साल भारत के विभिन्न जेलों में गुजारने पड़े. लेकिन छूटने के बाद आज भी उनकी ज़िन्दगी नरक बन गई. कमाने के लिए रोज़गार नहीं… वक़्त बिताने के लिए दोस्त नहीं… कईयों के माँ-बाप ये उम्मीद लेकर ही इस दुनिया से चल बसे कि उनका बेटा एक दिन छूट कर आएगा. कुल मिलाकर इनकी जिंदगियां बर्बाद कर दी गयी और जेल से छूटने के बाद भी ‘आतंकी’ कहलाते हैं.
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