ट्वेल्थ फेल
फ़िल्म समीक्षा
दिलीप मंडलहीरो मनोज शर्मा के दादा भारतीय फ़ौज में जूनियर कमीशंड ऑफ़िसर थे। बाप सरकारी नौकरी में थे। कविताएँ सुनाते थे। दादी पेंशन पाती थी। घर में लाइसेंसी बंदूक़ थी, जिससे दादी फ़ायर भी करती थीं। ज़मीन थी। गायें थीं।

फिर भी जैसा कि कहा जाता है। एक गाँव में एक बेचारा गरीब ब्राह्मण रहता था।
एक दिन दोनों भाइयों ने एमएलए के एक आदमी को चप्पल से मार दिया। पुलिस उठाकर ले गई। थाने में भाइयों ने झगड़ा किया तो बड़ा भाई बोला - जा मनोज, घर से दोनाली बंदूक़ उठा ली।
मनोज दौड़ा और थानेदार ने बंदूक़ लाने के लिए उसे जाने दिया। पिछवाड़े पर गोली नहीं मारी।
कृपया ऐसा स्टंट न करें अगर आपका नाम शर्मा नहीं है। भारत के किसी भी थाने में ऐसा स्टंट करेंगे तो पुलिस ठंडा कर देगी।
फिर आपकी स्मृति सभा ही होगी। शर्मा होने पर भी दिक़्क़त हो सकती है। विकास दुबे का आप लोगों ने देख ही लिया।
ट्वेल्थ फेल जन्मजात विशेषाधिकारों की दास्तान है। ये सबको बराबर हासिल नहीं है।
हर किसी को इंटरव्यू से भगा दिए जाने के बाद दोबारा इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाया जाता। हर किसी को मोटिवेट करने के लिए आईएएस टॉपर नहीं मिलता, जिसके घर आप रात में टहलते हुए घुस जाएँ।
जेसीओ का पोता होने, ग्रेजुएशन करने और चार साल दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी करने के बाद अगर आपको बेसिक इंग्लिश नहीं आती तो आप गधे करार दिए जाएँगे।
लेकिन मनोज तो शर्मा हैं। वे कर सकते हैं। आप लोग चुपचाप अपनी इंग्लिश सुधार लीजिए। वरना धक्के मारकर भगा देंगे।
सिनेमा के चक्कर में मत पड़िए।
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