क्या 2024 लोकसभा चुनाव बसपा के लिए शोकगीत लिखने का वक्त होगा?

...बावजूद बसपा को एकदम ख़त्म मान लेना भी जल्दबाज़ी ही होगी

सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा 

 

एनडीए बनाम इंडिया की बहस से परे 2024 के लोकसभा चुनाव कई राजनीतिक दलों के सामने बड़े सवाल लेकर खड़े हैं। इनमें से एक बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और उसकी प्रमुख मायावती हैं। लोग यह जानना चाहते हैं कि मायावती इस चुनाव में किसी गठबंधन का हिस्सा होंगी या अकेले दम पर चुनाव लड़ेंगीं? अपनी घोषणा के मुताबिक़ अगर वह अकेले दम पर चुनाव लड़ेंगीं तो बसपा की रणनीति आख़िर क्या होगी?

बसपा को लेकर लोगों की चिंताएं जायज़ हैं। वजह यह कि यह पार्टी दलित-बहुजनों के स्वाभिमान और बराबरी पाने के आंदोलन से जन्मी है। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस पार्टी से दिली हमदर्दी रखता है। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद से पार्टी को मिलने वाले वोटों की संख्या में भले ही कमी आई है, लेकिन फिर भी ज़मीनी स्तर पर जनसमर्थन पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ है। भले ही मायावती इस दौरान आंदोलनों से दूर रही हों, लेकिन फिर भी लोग अहम मसलों पर उनकी बात सुनना चाहते हैं। 

लोगों की हमदर्दी और सियासी ज़रूरतें अपनी जगह हैं, लेकिन सच यही है कि बसपा के सामने इस वक़्त अपना वजूद बचाने का संकट है। चुनाव-दर-चुनाव बसपा की वोटों में हिस्सेदारी घट रही है। मसलन, 2004 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को 5.33 प्रतिशत वोट मिले थे। हालांकि 2009 में यह बढ़कर 6.17 प्रतिशत जरूर हुआ, लेकिन 2014 के चुनाव में यह घटकर महज़ 4.19 प्रतिशत रह गए। वहीं 2019 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल से गठबंधन के बावजूद पार्टी देश भर में महज़ 3.67 प्रतिशत वोट ही जुटा पाई।

वर्ष 2004 में बीएसपी के 19 सांसद जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। वहीं 2009 में पार्टी के कुल 21 उम्मीदवारों को जीत हासिल हुई। जबकि 2014 में पार्टी के सभी उम्मीदवार चुनाव हार गए। वोटों में कम हिस्सेदारी के बावजूद 2019 में बसपा के टिकट पर कुल 10 उम्मीदवार चुनकर लोकसभा पहुंचे। हालांकि इन दस उम्मीदवारों की जीत की एक बड़ी वजह समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बाद बीएसपी के पक्ष में मुसलमान वोटों का ध्रुवीकरण रही। इस चुनाव में 2014 के लोकसभा चुनाव के मुक़ाबले पार्टी की वोट हिस्सेदारी में 0.52 प्रतिशत की कमी आई।

वर्ष 2012 के बाद से बसपा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी कोई बड़ा करिश्मा कर पाने में नाकाम रही है। बताते चलें कि 2007 में 403 सदस्यीय यूपी विधानसभा में बसपा के कुल 206 विधायक थे, जिनकी संख्या 2012 में घटकर 80 रह गई। वहीं 2017 में पार्टी के सिर्फ 19 उम्मीदवार चुनाव जीत पाए। वहीं 2022 में पार्टी का वोट शेयर 2017 में मिले 22.23 प्रतिशत से घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया और उसके सिर्फ एक उम्मीदवार को जीत हासिल हुई। यह नतीजा न सिर्फ मायावती बल्कि यूपी में बड़ी राजनीतिक ताक़त मानी जाने वाली बसपा के लिए बड़ा झटका था। हालांकि इसके बावजूद बसपा को एकदम ख़त्म मान लेना भी जल्दबाज़ी ही होगी।

बसपा के प्रदर्शन में लगातार गिरावट की तमाम वजहें रही हैं। एक तो पार्टी के पास अब कांशीराम जैसा कोई मिशनरी नेता नहीं है, जो सत्ता की दौड़ से दूर सिर्फ पार्टी और विचार के लिए दिन-रात एक कर सके। दूसरा, मायावती समेत पार्टी के पास कोई ऐसा नेता नहीं है, जो सीधे तौर पर लोगों या कार्यकर्ताओं से जुड़ाव रखता हो। पार्टी के पास दूसरी, तीसरी पंक्ति के दलित-बहुजन चेहरों का अभाव है। कोर वोटर माने जाने वाले दलितों के अलावा किसी दूसरे समाज या समुदाय का ऐसा कोई बड़ा नेता नहीं है, जो पार्टी के वोटों में उल्लेखनीय इज़ाफा कर पाए।

पिछले दस वर्षों के दौरान लालजी वर्मा, इंद्रजीत सरोज, वीर सिंह, दारा सिंह चौहान, स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे दूसरी पंक्ति के नेता या तो पार्टी छोड़ गए या फिर निकाल दिए गए। हाल के दिनों में जनाधार वाले नेता इमरान मसूद और सांसद दानिश अली से भी पार्टी ने किनारा कर लिया है। बसपा के पास अब रामवीर उपाध्याय, नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी जैसा नेता भी नहीं है, जिनके दम पर दलित वोटरों के बाहर पार्टी अपनी पहुंच बना सके। 

पिछले दस वर्षों के दौरान यह भी देखा गया है कि बसपा का कोर वोटर माने जाने वाले दलित-बहुजन समाज के लोग अलग-अलग पार्टियों की तरफ जाते रहे हैं और बसपा ने उन्हें रोकने की कोई ख़ास कोशिश नहीं की। कहना अतिशयोक्ति नहीं कि भाजपा की चुनावी सफलताओं में बसपा से पलायन करने वाले वोटरों की बड़ी हिस्सेदारी है। इस बीच समाजवादी पार्टी ने भी बसपा के कई नेताओं को अपने पाले में लाकर दलित-बहुजनों के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश की है। यूपी में भले ही कांग्रेस को सफलता नहीं मिली है, लेकिन दूसरे राज्यों में पार्टी दलितों को ठीक-ठाक तादाद में अपनी तरफ खींच पाने में सफल रही है।

उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर की आज़ाद समाज पार्टी, दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने भी बसपा के वोटरों को लुभाने में कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं रखी। छितराते वोट बैंक और कमज़ोर होती पार्टी के अलावा मायावती की बढ़ती उम्र भी चिंता की वजह है। दलित आंदोलन से जुड़े लोगों का मानना है कि मायावती में भागदौड़ करने और ज़मीन पर उतरकर पार्टी को मज़बूत करने की पहले जैसी इच्छाशक्ति नहीं रही है। ऐसे में बसपा को फिर से प्रासंगिक बनाना और दलित मतदाताओं में फिर से जीत का विश्वास दिला पाना आसान नहीं है। अगर 2024 में भी पार्टी का प्रदर्शन नहीं सुधरता है तो यक़ीनन फिर बसपा के लिए शोकगीत लिखने का समय आ गया है। 

यह फारवर्ड प्रेस में छप चुकी है। 


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