कितने राम, किन के राम
हर सांस में विराजने वाले कबीर के राम, या कि एक खास कुल और स्थान पर जन्मने वाले दशरथनन्दन तुलसी या वाल्मीकिकृत राम
प्रेमकुमार मणिराम का नाम भारतीय वांग्मय में कवियों ने पिरोया और उसे हमारी संस्कृति का हिस्सा बनाया. राम किसी पंथ विशेष के नहीं, पूरे हिंदुस्तान की विरासत हैं. वह जाने कितने रूप में हमारे वजूद में समाए हैं. वह हमारे भीतर हैं, तो बाहर भी. अतीत हैं, तो भविष्य भी.

राम कथा साधारण भी है और अद्भुत भी. प्रथमद्रष्ट्या वह एक परिवार की कहानी है, लेकिन वह एक ज़माने की भी कहानी है और फिर एक राष्ट्र की भी. राम, अवध की किसान संस्कृति का नायक. इक्ष्वाकु, यानी ईख उत्पादकों का कुल-घराना. दसरथ की तीन रानियां और उन रानियों के चार पुत्र. राम उनमें एक हैं. कथा है ऋष्य श्रृंग के खीर यज्ञ से दसरथ पिता बने. राजघरानों की ऐसी परंपरा हुआ करती थी.
महाभारत-कथा में भी कृष्ण द्वैपायन से धृतराष्ट्र और पाण्डु के जन्म होते हैं. कथा विस्तार केलिए ऐसे आधार जरूरी होते हैं. इस से रहस्यमयता और आकर्षण गहरा होता है. यही पौराणिकता की पहचान है. कथा गढ़ने वाले संकेत देते हैं कि इतिहास और पौराणिकता के भेद को समझो. जो ना समझे वो अनाड़ी हैं.
राम की कथा भारत की जनकथा बन गई है. इसके जाने कितने रूप हैं. कहा जाता है कि तीन सौ से भी अधिक रामायण हैं. थोड़-बहुत भेद जरूर हैं, लेकिन मूल कथा यही है कि कृषि-संस्कृति का जुझारू नायक राम, जिसे गृह-कलह सुलझाने केलिए घर-निकाला दिया गया है, और निर्वासन-काल में जिसकी पत्नी का अपहरण एक ताकतवर राजा द्वारा कर लिया गया है, अपनी मेधा-बुद्धि से आदिवासी लोगों को इकठ्ठा कर सेना बनाता है और उस महाशक्तिमान को पराजित कर देता है, जो तत्कालीन दुनिया में छप्पन इंच की छाती फुलाए सब पर धौंस जमा रहा था.
यह कमजोर लोगों द्वारा मजबूत लोगों के खिलाफ लड़ाई थी, जिस में मजबूत की पराजय होती है. ऐसी कथा को जनकथा बननी ही थी. भारतीय जनमन ने इस कथा को अपना जीवन बना लिया और इसके नायक को अपना इष्ट. राम ईश्वर बन गए. वह ब्रह्म की तरह शक्ति के रूप बन गए. वह नाम बन गए. फिर यह नाम हमारा इष्ट बन गया. भक्तिकालीन कवियों ने इस नाम के वृत्त पर ही अपनी वैचारिक दुनिया गढ़ी. कबीर, रैदास से लेकर जाने कितने कवियों ने उन्हें अपना इष्ट घोषित किया. रामनाम भारतीय जनमन का कंठहार बन गया.
संस्कृत कवि वाल्मीकि ने अपने काव्य रामायण में इस कथा को शब्द और रूप दिये. वाल्मीकि आरंभिक सामंतवादी दौर के कवि थे. उनका राम सब मिला कर लोक-पुरुष है. अधिक से अधिक पुरुषोत्तम. सामान्य से कुछ अलग-- विशिष्ट. तुलसीदास ने जब रामचरित मानस लिखा,तब उसे थोड़ा और आगे ले गए. राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया. वह अकबर का जमाना था. मुगल राज के पहले यहाँ सल्तनत राज था. सल्तनत राज में सुल्तानों की स्थिति वायसराय जैसी होती थी. क्योकि क्राउन अथवा ताज ( मुख्य शक्ति ) तो खलीफा के पास होता था.
मुग़ल राज में द्वैत ख़त्म कर दिया गया. अकबर ने स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया. तुलसीदास इस से प्रभावित थे. उन्हें हिन्दुओं के बीच भी ऐसी शख्सियत चाहिए थी, जो सार्वभौम राजा हो. धार्मिक और राजनीतिक सत्ता एक जगह हो. राम को उन्होंने राजा भी बनाया और ईश्वर भी घोषित किया. मुगल दरबार की तरह राम का दरबार भी सृजित हुआ. इस दरबार में सीता के साथ राम, उनके सभी भाई और यहाँ तक कि हनुमान भी शामिल हैं. हिंदुत्व के प्रस्तावक सावरकर ने घोषणा की थी कि उत्तर के आर्य राजा जब दक्खिन जाकर द्रविड़ नेता हनुमान को गले लगाते हैं, यानी आर्य और द्रविड़ जब एकमेव होते हैं, तभी हिंदुत्व बनता है.
इसलिए राम सावरकर की हिन्दुत्व- परियोजना के भी आधार हैं. कुछ यही सोच मध्यकालीन तुलसीदास की भी थी. तुलसी ने भक्ति का चूरण डाल कर यह भी बताया कि प्रभु राम को भक्ति से काबू में किया जा सकता है. इस तरह निरक्षर जनता के लिए भी राम को संभव किया. तुलसी का प्रस्तावित रामराज मुगल राज का एक विकल्प भी था. ईसा के प्रभु के राज की तरह. पराजित हिन्दू जाति में वह स्वाभिमान लाने की कोशिश करते हैं. उनका राम गरीब-नवाज है. लेकिन तुलसी की सोच में भयानक संकीर्णता भी थी.
सामाजिक तौर पर उनका रामराज गो-द्विजहितकारी है. गरीब द्विजों ( आज के अर्थ में सवर्ण कहे जाने वाले ऊँची जाति के हिन्दू ) की भलाई ही उसका मकसद है. सम्पूर्ण हिन्दू या हिंदुस्तानी समाज उनकी सोच में नहीं है. कबीर के अमरदेस की तुलना में तुलसी के रामराज के सरोकार तंग हैं. तुलसी का लोक तथाकथित भद्र हिंदुलोक है, जिसमें मिहनतक़श तबकों को अधमजात कह कर तिरस्कृत किया गया है.
भारतीय समाज में अनेक राम की लड़ाई पुराने समय से है. कौन से राम? घट-घट और हर सांस में विराजने वाले कबीर के राम, या कि एक खास कुल और स्थान पर जन्मने वाले दशरथनन्दन तुलसी या वाल्मीकिकृत राम. लेकिन तुलसीकृत राम भी श्रीराम नहीं, सियाराम हैं. सियाराममय सब जग जानी. पूरी सृष्टि सियाराममय है. केवल राममय नहीं.
अपनी पत्नी और प्रेयसी रत्ना के प्रेम में आपादमस्तक डूबे तुलसी केवल राम की वंदना से परहेज करते हैं. उनका राम क्षण भर केलिए भी सीता से जुदा नहीं होता. वाल्मीकि की रामकथा के राम राजा बनने के कुछ महीने बाद ही सीता को घरनिकाला देते हैं. तुलसी इस प्रसंग का चालाकी से विलोप कर देते हैं. कहने का अर्थ यह कि हर ज़माने में राम के अर्थ और रूप बदलते रहे हैं. यही लचीला चरित्र रामत्व है.
बहुत सारे पेंचो-ख़म हैं रामकथा में. उसे आप अपने -अपने हिसाब से बांच सकते हैं. ग्रामीण किसान महिलाएँ गीत गाती हैं कि छहर -छहर बारिश हो रही है और अजुध्या के रजवाड़े में उदास बैठी कौसल्या माता बिलख रही हैं कि हमारे बेटे-बहू इस धारासार बारिश में भीग रहे होंगे. कोई आदिवासी महिला बड़े राग से हिरणी का वियोग गीत गा रही है. अजुध्या में रामलला का जन्मदिन मनाया जा रहा है और उसके उत्सव में सालन बनाने केलिए उसके साथी हिरण को मार डाला गया है.
हिरणी कौशल्या से अर्ज कर रही है- हमारे हिरण को आपलोगों ने मार ही दिया. ठीक है उसके सालन से अपने रामलला का उत्सव मनाइए. आपसे विनती बस इतनी है कि उसकी खाल हम को दे दीजिए. उस खाल को देख कर मैं अपने हिरण को याद करुँगी. रानी कौशल्या हिरणी को झिड़की देती है. भागो. नहीं दूंगी वह खाल. उस से डफली मढ़वाऊंगी और हमारे रामजी उसे डम-डम बजाएंगे.
तो बहुत सारे राम हैं. क्रान्तिदर्शी युवा राम भी हैं, जो एक ऐसी कुमारी से विवाह करते हैं, जिसके जात-गोत्र का पता नहीं है. अयोनिजा है वह. उसकी योनि -कुक्षि का कोई पता नहीं. खेत में मिली है बिचारी. अज्ञातकुलशील है. कितने लोग ऐसी कन्या से विवाह केलिए आज भी तैयार होंगे. लेकिन युवा राम यह करते हैं. शिव यानि कल्याण का धनु उठाने की क्षमता केवल उनमें है. वही हैं जिन्हें नई मर्यादा गढ़नी है. वह बार-बार मर्यादा स्थापित करते हैं.
समाज से बहिष्कृत अहल्या के यहाँ जा कर उसे समाज से जोड़ते हैं. भीलकन्या शबरी के प्यार में पगे जूठे बेर खाते हैं. वनवासी हनुमान-सुग्रीव को गले लगाते हैं. हठी ब्राह्मण रावण का वध करते हैं. लेकिन वही राम जब स्वयं राजा बनते हैं, तब तपस्वी शूद्र शम्बूक का वध करते हैं, सीता को घरनिकाला देते हैं और अपने ही पुत्रों पर अविश्वास करते हुए उनसे युद्ध करते हैं. यह ठीक वैसा ही युद्ध है जैसा राम-रावण युद्ध था. रावण की जगह इस बार राम राजा है,जिसके पास सम्पूर्ण राजशक्ति है.
लव-कुश के पास बस अपनी शक्ति, साहस और अबला माँ है. इस बार रावण नहीं, राम रथी है, और विरथ हैं लव-कुश. लेकिन कथा यही है कि विरथ राम की ही तरह विरथ लव-कुश भी युद्ध जीतते हैं और राम बुरी तरह पराजित होते हैं. राम का अंत रावण से भी बुरे ढंग से होता है. वह सरयू में या तो स्वयं लाज से डूब मरते हैं,या फिर बेटों द्वारा डुबो दिए जाते हैं.
इस तरह रामायण राम के उत्थान और पतन की कहानी है. इस का पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दोनों दिलचस्प है. पूर्वार्द्ध में शक्तिमान रावण की पराजय होती है और उत्तरार्द्ध में शक्तिमान राम की. पूर्वार्द्ध में राम जीतते हैं, उत्तरार्द्ध में लव-कुश. दुनिया भर की कोई कथा इतनी दिलचस्प और अनूठी नहीं होगी, जितनी कि रामायण है. राजसत्ता किसी को भी भ्रष्ट बना सकती है, वह रावण हो, या राम. रावण बहुत बड़ा विद्वान है और राम साक्षात् ईश्वर के प्रतिरूप.
लेकिन सत्ता का मद दोनों को अंततः पतित बना डालता है. रामायण का यह शाश्वत सन्देश बिलकुल अनूठा है. दुनिया के शायद ही किसी काव्य में ऐसा हो. इसलिए शायद समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने रामायण मेला लगाने की कवायद की थी. मशहूर चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन ने रामायण सीरीज की मशहूर पेंटिंग बनाई थी.
रामकथा की यह महान परंपरा भाजपा के हाथों अब अयोध्या में राममंदिर में समेट दी गई है. कबीर और रैदास के निर्गुण राम तक तो इनकी पहुँच नहीं ही हो सकती थी, तुलसीदास के सियाराम को भी इनलोगों ने श्रीराम बना दिया है.
क्या इस राम को लेकर कोई राष्ट्र बन सकता है? सावरकर ने क्या इसी राम की योजना की थी ? आरएसएस की परियोजना में गो-द्विजहितकारी वह राम है, जो स्वयं अपने रामत्व से च्युत हो चुका है. वह राम अपने ही बेटों लव-कुश से युद्ध केलिए सन्नद्ध है.
यह पुरोहितवादी वशिष्ठ की शरण में बैठा हुआ राम है, जिसकी नियति सरयू में जलसमाधि लेने की है. पण्डे -पुरोहितों और घंटे-घड़ियालों से घिरा यह राम भारत की जनता का नहीं, एक गिरोह का है. यह राष्ट्र का नहीं, संघ का राम है. अयोध्या में जनवरी 2024 में इसी राम का मंदिर प्रतिष्ठित होने जा रहा है.
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