हसदेव अरण्य में आदिवासियों के साथ जंगल की बर्बादी और कोयला का उत्खनन
परसा ईस्ट केते बासेन (पीईकेबी) - चौथा और अंतिम किस्त
सुशान्त कुमारछत्तीसगढ़ के प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रदेश पीयूसीएल के अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान तल्खी के साथ कहते हैं कि चाहे कोई भी सरकार हो, पूरे छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय के बीच उपलब्ध बेशकीमती प्राकृतिक संसाधनों के लूट का सिलसिला जारी रखना चाहते हैं। सरकारों के शह पर अविभाजित मध्यप्रदेश में इस क्षेत्र में जंगल माफियाओं ने लाखों पेड़ काट डाले। छत्तीसगढ़ बनने के पश्चात यहां की सरकारों द्वारा औद्योगिक घरानों को ठेके में देकर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के मकसद से आदिवासियों के जीवन- यापन और रहवास निरंतर उजाड़े जा रहे हैं।
डिग्री कहते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि हसदेव क्षेत्र में परियोजना के स्वीकृति और स्थापना से पहले स्थानीय आदिवासी समुदाय से परामर्श और अनिवार्य रूप से सहमति की प्रक्रिया का उल्लंघन किया गया है। आदिवासी समुदाय के प्रतिरोध को दमन करने स्थानीय नेताओं और सामजिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया है। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के पालन के अभाव और राज्य द्वारा जनता के प्रति उसकी जबाबदेही में उदासीनता के कारण इस पूरे क्षेत्र में मानव अधिकारों का व्यापक उल्लंघन हो रहा है।
भारत ने 2017 - 18 में 23 प्रतिशत और 2018 - 19 में 24 प्रतिशत कोयले का आयात किया। तथाकथित कोयले की कमी हमेशा रसद संबंधी मुद्दों के कारण होती थी क्योंकि कोयले की आपूर्ति में रेलवे की गंभीर बाधाएं होती हैं। श्रीवास्तव ने कहा कि 2017 और 2019 के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमत सस्ती थी, और तट के किनारे स्थित सभी बिजली संयंत्रों ने आर्थिक लाभ के लिए आयातित कोयले का विकल्प चुना। सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोयला ब्लॉकों के आवंटन को रद्द करने और 2019-20 तक पुनर्प्राप्त करने के बाद उत्पादन में गिरावट आई है।
2015-2019 की अवधि के दौरान, सीआईएल द्वारा उत्पादन बढ़ाकर कमी को पूरा किया गया। कोयला मंत्रालय ने भी 2017 से 2019 के बीच कई बयान दिए , जिसमें कहा गया कि कोयले की कोई कमी नहीं है। इसके अलावा, सीआईएल ने पिछले साल की तुलना में अप्रैल 2023 में उत्पादन में 7.7 प्रतिशत की वृद्धि देखी, जो 67 मिलियन टन से अधिक हो गया, जबकि कोयले की आपूर्ति में 8.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
बिजली उत्पादन का मुद्दा
याचिका में अनुमान लगाया गया है कि भले ही हम सीईए के 2029-30 में उत्पादित बिजली की इकाइयों के अनुमान के आधार पर कोयला आधारित बिजली की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत मानते हैं, कोयले की अधिकतम आवश्यकता लगभग 1,045 मिलियन टन होगी। कोयला मंत्रालय के अनुमान के अनुसार अकेले सीआईएल अगले तीन वर्षों में इसे पार कर लेगी। श्रीवास्तव की याचिका में तर्क दिया गया है कि हसदेव अरंड के घने जंगलों में बिना खनन के इस लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है। आरआरवीयूएनएल की 4,340 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता एचएसीएफ कोयला ब्लॉकों से जुड़ी है।
इसमें से एचएसीएफ से संबंद्ध छाबड़ा थर्मल पावर प्लांट की कुल क्षमता 1,820 मेगावाट, कालीसिंध की 1,200 मेगावाट और सूरतगढ़ की 1,320 मेगावाट है। सीईए के अनुसार, 100 मेगावाट यूनिट से 660 मेगावाट यूनिट की क्षमता वाले बिजली संयंत्रों की स्टेशन ताप दर के आधार पर कोयले की खपत 2,600 से 2,250 किलो कैलोरी प्रति किलोवाट-घंटे आंकी गई है. इसके आधार पर, पीईकेबी से खनन किए गए कोयले के ग्रेड पर, जो कि जी11 है और 85 प्रतिशत के उच्चतम प्लांट लोड फैक्टर पर, कोयले की आवश्यकता प्रति वर्ष 21 मिलियन टन से कम होगी।
कोयला खनन परियोजनाओं के पर्यावरण मूल्यांकन के लिए विशेषज्ञ समिति ने पीईकेबी की खनन क्षमता को वर्तमान में 15 मिलियन टन कोयले से बढ़ाकर 21 मिलियन टन करने के आरआरवीयूएनएल के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी, जिसका अर्थ है कि इसकी 4,340 मेगावाट की आवश्यकता अकेले इस कोल ब्लॉक से पूरी हो जाएगी। पर्यावरण मंत्रालय ने आरआरवीयूएनएल को पीईकेबी का विस्तार करने की अनुमति देने के लिए आलोचना की है, भले ही उसने सीमांकित क्षेत्र में उपलब्ध कोयले की पूरी तरह से खोज न करके खनन योजना का उल्लंघन किया हो।
कोई भी दावा लंबित नहीं
हसदेव अरण्य में परसा कोल ब्लॉक को मिली दूसरे चरण की स्वीकृति नाम से सत्यम श्रीवास्तव डाउन टू अर्थ में लिखते हैं कि 13 फरवरी 2018 को अंबिकापुर कलेक्टर के पत्र क्रमांक 4896 के जरिये ग्राम सभाओं को यह सूचना मिली कि परसा कोयला खदान के लिए 614.219 हेक्टेयर वन भूमि का व्यपवर्तन (डायवर्जन) इस आधार पर किया जा रहा है क्योंकि यहां वन अधिकार मान्यता कानून का क्रियान्वयन संपूर्णता में हो चुका है और कोई भी दावा लंबित नहीं है जिसके संबंध में संबन्धित गांवों की ग्राम सभाओं की सहमति अनुमोदन प्रस्तावों के माध्यम से प्राप्त की जा चुकी है।
इस मामले में यह बताया गया कि दो गांवों, फतेहपुर, हरिहरपुर और साल्ही गाँव में क्रमश: 26 जुलाई, 2017, 24 जनवरी 2018 व 27 जनवरी 2018 को ग्राम सभाएं आयोजित हुईं जिनमें यह प्रस्ताव पारित हुए कि इन गांवों में वन अधिकार कानून का संपूर्णता में क्रियान्वयन हो चुका है और कोई भी दावा लंबित नहीं है।
कोल बेयरिंग एरिया एक्ट (सीबीएए'957) का इस्तेमाल नहीं
सत्यम लिखते हैं कि पेसा कानून, 1996 को खारिज करते हुए कोल बेयरिंग एरिया एक्ट (सीबीएए,1957) का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता यह एक कानूनी और सांवैधानिक तथ्य है। ऐसे मामलों में 2013 में संसद से पारित भूमि अधिग्रहण कानून का इस्तेमाल ही किया जाना चाहिए जहां पेसा क्षेत्र के इलाकों की ग्राम सभाओं को भरोसे में लेते हुए उनकी सहमति को प्राथमिकता दिये जाने का स्पष्ट प्रावधान है।
कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन और विकास) अधिनियम, 1957
1993 में संविधान में हुए 73वें 74वें संशोधनों, 1996 में पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों के लिए बने पेसा कानून, 1996 के ही सर्वोच्च न्यायालय के उल्लेखनीय समता निर्णय, 2006 में संसद से पारित हुए वनाधिकार मान्यता कानून और 2013 में लागू हुए भूमि-अधिग्रहण कानून जैसे अपेक्षाकृत जन भागीदारी के कानूनों को भी इस कानून के द्वारा दरकिनार किया जाता रहा है। इन तमाम कानूनों से पुराना होने के बावजूद इसकी सर्वोच्चता बनी रही है। उल्लेखनीय है कि पेसा कानून को अमल में आए इस साल 25 साल हो रहे हैं।
सत्यम के अनुसार ‘कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन और विकास) अधिनियम, 1957’ बुनियादी तौर पर भूमि अधिग्रहण कानून ही है जो ऐसे क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जाता रहा है। हालांकि इसका इस्तेमाल केवल सार्वजनिक क्षेत्रों की कंपनियों के लिए करने का विशेषाधिकार देता है। यहां तक कि 2013 में संप्रग (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सरकार के दौरान संसद में पारित हुए भूमि अधिग्रहण, पुनरुद्धार, पुनर्वासन में उचित प्रतिकार तथा पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 में भी कोयला धारक क्षेत्रों को इसलिए छोड़ दिया गया था क्योंकि उसके लिए इस विशिष्ट कानून की मौजूदगी थी।
सबसे बड़ा बदलाव इन संशोधनों के जरिये कोयला क्षेत्र में देश की संघीय प्रणाली में यह होने जा रहा है। इन संशोधनों के बाद अब अधिग्रहण की पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार के अधीन होगी। लेकिन भूमि अधिग्रहण हो जाने के बाद केंद्र सरकार अपने अधीन इस जमीन और इस पर ‘खनन के अधिकार’ राज्यों को सौंप देगी। यानी राज्य सरकारें अब इस अधिग्रहित हुई जमीन को किसी कंपनी या कोयला भंडारों की नीलामी के दौरान सबसे योग्य पाये गयी कंपनी को लीज पर दे सकती हैं।
दूसरा बड़ा बदलाव इस कानून के माध्यम से अधिग्रहण हुई जमीन के इस्तेमाल को लेकर होने जा रहा है। जो जमीन कोयले के खनन के लिए ली जाएगी अब उसका इस्तेमाल कोयले से संबंधित आधारभूत संरचना या सहायक गतिविधियों और सार्वजनिक उद्देश्यों की संरचनाओं के लिए भी हो सकता है। 1957 के कानून में यह इजाजत नहीं थी बल्कि स्पष्ट रूप से यह प्रावधान थे कि जो जमीन कोयले के खनन के लिए अधिग्रहित की जाएगी उसका इस्तेमाल केवल और केवल कोयला निकालने के लिए ही होगा।
इसके अलावा एमएमडीआर कानून के तहत खनन पूरा होने के बाद जमीन को पुन: पूर्व की स्थिति में लाने के प्रावधान थे, जिसका भार खनन करने वाले के ऊपर था। इन संशोधनों के बाद हालांकि उपलब्ध नोट में इसका जिक्र नहीं है लेकिन एमएमडीआर में भी संशोधन किए जाएंगे और ?मीन की लीज की सीमा भी बढ़ाई जा सकती है।
तीसरा बेहद महत्वपूर्ण बदलाव जो होने जा रहा है, वह है इस कानून के माध्यम से कोयले के साथ-साथ लिग्नाइट (निम्न स्तरीय कोयला खनिज) खनन के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इस उद्देश्य के लिए अब तक चले आ रहे कोयलारीज कंट्रोल नियम, एमएमडीआर कानून के तहत 2004 व कोल ब्लॉक्स आबंटन नियम 2017 में यथोचित बदलाव भी किए जाएंगे।

ऊर्जा सुरक्षा सबसे ऊपर
इशान कुकरेती डाउन टू अर्थ में लिखते हैं कि कोविड - 19 के बाद सरकार के एजेंडे में ऊर्जा सुरक्षा सबसे ऊपर है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि यह नीलामी कोयला क्षेत्र को कई वर्षों के लॉकडाउन से बाहर लाएगी। उन्होंने कहा, भारत में दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कोयला भंडार है और हम कोयले के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं तो फिर हम दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक क्यों नहीं बन सकते?
कोयले को हरित बनाने के लिए सरकार ने 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले को गैस में बदलने के लिए चार परियोजनाओं में 20,000 करोड़ का निवेश करने की घोषणा की है। समस्या यह है कि कोयले के भंडार देश के सबसे घने जंगलों में पाए जाते हैं, जहां बहुत गरीब लोग और इनमें भी ज्यादातर आदिवासी रहते हैं। इसका मतलब यह है कि जब अधिक कोयले के लिए नए क्षेत्रों का खनन शुरू होगा तो इन अनछुए जंगलों और उनके निवासियों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ेगा।
2015 के बाद से सरकार ने और नौ खानों की नीलामी की है और उनके संचालन की जानकारी सार्वजनिक डोमेन में नहीं है। एकमात्र जानकारी का स्रोत वन सलाहकार समिति (एफएसी) द्वारा 2015 में आयोजित एक बैठक है। एफएसी मुख्यत: एक बिना किसी चेहरे मोहरे वाली संस्था है जो वन मंजूरी का आकलन और सिफारिश करती है। हालांकि, यह खनन पट्टे, खनन योजनाओं और खदानों के संचालन पर कोई विवरण नहीं देता है, लेकिन यह दर्शाता है कि 2015 के बाद से, कुल 49 कोयला खनन परियोजनाओं को जंगलों के उपयोग के लिए चरण एक (24 खदानें) या चरण दो (25 खदानें ) की मंजूरी दी गई है। इन 49 परियोजनाओं में से नौ मूल नो-गो क्षेत्रों में हैं।
चरण एक के तहत, मंजूरी तो दी जाती है, लेकिन उपयोगकर्ता एजेंसी या निजी कंपनी को नेट वर्तमान मूल्य का भुगतान करना है और स्थानीय समुदायों के अधिकारों एवं शर्तों को पूरा करना है। स्टेज दो के तहत, वनभूमि के इस्तेमाल के लिए अंतिम अनुमति दी जाती है और उपयोगकर्ता एजेंसी या कंपनी को एक वर्ष के भीतर प्रतिपूरक वनीकरण (कटे पेड़ों के बदले में नए पेड़) करना पड़ता है।
सरकार के अपने रिकॉर्ड के अनुसार जिन 49 कोयला परियोजनाओं के लिए वनों के डायवर्जन की अनुमति दी गई है, उसके कारण 19,614 हेक्टेयर वनभूमि प्रभावित होगी। इस तरह 1.02 मिलियन पेड़ों की कटाई और 10,151 परिवार बेदखल होंगे। इशान कुकरेती के अनुसार दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी केंद्र सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के अनुमानों के अनुसार पीएसयू भारत के घरेलू कोयले का 80 प्रतिशत से अधिक का उत्पादन करता है और 2,00,000 से अधिक खदान लीज के क्षेत्रों पर नियंत्रण रखता है।
इनमें से अधिकांश किसी जमाने में जंगल हुआ करते थे। कोल इंडिया का अनुमानित भंडार 64 करोड़ टन है। इसने पिछले साल 700 मिलियन टन का उत्पादन किया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह क्षमता से कम है तो निजी निवेशकों के लिए एक खुला निमंत्रण क्या एकमात्र विकल्प है? यह मुख्यत: फूट डालो और राज करो रणनीति है। पहले ही डायवर्ट एवं बर्बाद की गई भूमि को पहले ठीक किए जाने के बजाय और भी ज्यादा जंगल काट दिए जाते हैं। इनमें से अधिकांश जंगल बेशकीमती और सघन किस्म के हैं, जिनमें समृद्ध जैव विविधता है। इसीलिए इसे संरक्षित किया गया था। अब यह भी खत्म हो जाएगा।
ये गया, वो गया, चला गया
नो-गो के रूप में चिह्नित किए गए कोयला ब्लॉकों की संख्या कैसे कम हुई?
2010 - पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (एमओईएफ) और कोयला मंत्रालय (एमओसी) ने 222 कोयला ब्लॉकों का अध्ययन किया और उन्हें नो-गो क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया।
2011 - नो-गो ब्लॉक की संख्या घटकर 153 रह गई।
2012 - एमओईएफ ने वैसे अनछुए वन क्षेत्रों (जहां किसी भी अप्राकृतिक गतिविधि से अपरिवर्तनीय क्षति होगी) की पहचान करने के लिए पैरामीटर बनाने हेतु एक समिति बनाई। ये छह पैरामीटर हैं: हाइड्रोलॉजिकल मूल्य, लैंडस्केप अखंडता, वन्य जीवन मूल्य, जैविक समृद्धि, वन के प्रकार और कुल वन क्षेत्र।
2014 - सरकार ने भारत के वन सर्वेक्षण विभाग को 793 कोयला ब्लॉकों का विश्लेषण करने के लिए एक अध्ययन करने को कहा और उन्हें इनवॉयलेट (अखंडित) और नॉट इनवॉयलेट (खंडित ) के रूप में वर्गीकृत करने को भी कहा। एफएसआई एक जीआईएस आधारित निर्णय समर्थन प्रणाली बनाता है जो एमओईएफ समिति द्वारा निर्धारित मापदंडों का उपयोग करता है। एफएसआई ने अगस्त में अपनी रिपोर्ट को में इनवॉयलेट (अखंडित) कोयला ब्लॉक की संख्या को घटाकर केवल 35 कर दिया।
2015 - एमओईएफसीसी और एमओसी की एक बैठक में ब्लॉकों के अखंडित घोषित किए जाने के मापदंडों को शिथिल किया जाता है और हसदेव-अरंड कोलफील्ड में पटुरिया, पिंडराक्षी, केंट एक्सटेंशन और परसा ईस्ट जैसे ब्लॉक, मांड-रायगढ़ कोयला क्षेत्र में तालापल्ली और सिंगरौली कोयला क्षेत्र में अमेलिया नॉर्थ को अखंडित श्रेणी से बाहर कर दिया जाता है।
नो-गो घोषित की गई 12 खदानें नीलाम की जाएंगी
जून, 2020 में जिन 41 खदानों की नीलामी घोषणा की गई है, उनमें 12 को 2010 में नो-गो के रूप में वर्गीकृत किया गया था। छत्तीसगढ़ में मांड-रायगढ़ कोयला क्षेत्र में 4 ब्लॉकों में से दो और हसदेव-अरण्य कोलफील्ड में सभी तीन ब्लॉक नो-गो थे। झारखंड में, उत्तरी करनपुर कोलफील्ड के 5 ब्लॉकों में से तीन को नो-गो के रूप में चिह्नित किया गया था। मध्य प्रदेश में सिंगरौली कोलफील्ड में तीन में से दो ब्लॉकों को नो-गो के रूप में वर्गीकृत किया गया था। ओडिशा के तालचर कोलफील्ड और महाराष्ट्र की वर्धा घाटी में एक-एक ब्लॉक भी इसी श्रेणी के हैं। वास्तव में, सरकार लंबे समय से इन कोयला ब्लॉकों पर नजर गड़ाए हुए है।
हसदेव-अरण्य में फूट डालो और राज करो
इशान कुकरेती के अनुसार प्राचीन वनों का विनाश यहीं नहीं रुका। जून 2020 में नीलामी के लिए डाले गए ब्लॉकों की सूची में मोरगा दक्षिण भी शामिल है, जो हसदेव-अरण्य के अंतिम शेष ब्लॉकों में से एक है। इस क्षेत्र में 97 प्रतिशत वन आवरण है और इसे पहले कभी आवंटित या नीलाम नहीं किया गया था। हसदेव-अरण्य के समृद्ध जंगल तेजी से घटते जा रहे हैं, वहीं पड़ोसी मंडी-रायगढ़ कोयला क्षेत्र में 48 गो ब्लॉक हैं, जो भले ही आवंटित कर दिए गए हों लेकिन उनमें से कई अभी चालू नहीं हैं। इशान कुकरेती के अनुसार 73 कोयला ब्लॉक, अखंडित श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। जिनमें से 12 पहले से ही खनन के अधीन हैं। इन पर वन मंजूरी दी गई थी। इसलिए उन्हें अखंडित श्रेणी से बाहर रखा जाना चाहिए।
49 निर्णय नियम (केवल बहुत घने जंगल के कारण, 29 ब्लॉक) से प्रभावित हैं, 6 निर्णय नियम-II से प्रभावित हैं, 6 पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से स्थिति को समेटने के बाद कोयला मंत्रालय द्वारा पहले आवंटित किया गया। अब इनवॉयलेट श्रेणी में आते हैं, जिन्हें इनवॉयलेट लिस्ट से बाहर करने की आवश्यकता है। अन्य 6: पहले आवंटित किए गए ये ब्लॉक पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से समझौते के बाद, अब अखंडित श्रेणी में आते हैं। जिन्हें इस लिस्ट से बाहर करने की आवश्यकता है।

ये ब्लॉक हैं- हसदेव-अरण्य में पटुरिया, हसदेव-अरण्य में पिंडराक्षी, हसदेव-अरण्य में केंट इक्स्टेन्शन, हसदेव अरण्य में परसा पूर्व, मंड-रायगढ़ में तालापल्ली और सिंगरौली में अमेलिया नॉर्थ। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए यह देखा गया कि ब्लॉक में पडऩे वाले घने जंगल के क्षेत्र का एक छोटा सा हिस्सा भी नियम-एक के तहत पूरे ब्लॉक को अखंडित बना देता है। इस पैरामीटर के कारण पंद्रह ब्लॉक प्रभावित होते हैं, जिन्हें कि अखंडित श्रेणी के बाहर रखा जाना है।
हम सभी की सांसों को बचाने के लिए लड़ रहे हैं
हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक मंडल के सदस्य उमेश्वर आर्मो ने कहा कि हम सिर्फ अपने जंगल, जमीन को बचाने के लिए आंदोलन नहीं कर रहे हैं बल्कि हसदेव नदी, पर्यावरण, वन्य जीव और हम सभी की सांसों को बचाने के लिए लड़ रहे है। पिछले 12 सालों से कानून पर विश्वास करके लोकतांत्रिक तरीके से हसदेव के आदिवासी आंदोलनरत हैं, लेकिन सरकार दमन करके अन्याय पूर्वक हमारे जंगल, जमीन छिन रही है। हमारे जंगल से करोड़ों रुपए के लघु वनोपज निकलते हैं जो कई पीढिय़ों तक चलेंगे, आक्सीजन मिलती है, पानी मिलता है लेकिन सरकारों को विकास के नाम सिर्फ कोयला निकालना ही है।
ग्राम साल्ही के नेतृत्वकर्ता रामलाल करियाम ने कहा कि सुबह 4 बजे सोते हुए पुलिस ने हमे घर से उठाया, कपड़े तक पहनने नहीं दिए क्या हम कोई अपराधी हैं? पुलिस कानून से नहीं, बल्कि अदानी कंपनी के इशारे पर चल रही है। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि 3 दिनों तक पूरे गांव को एक तरह से बंधक बनाकर रखा गया और पेड़ों की कटाई की गई।
हसदेव से जुड़ें प्रमुख जानकारों के अनुसार अगर आप वन स्वीकृति का अध्ययन बताता है कि फेस-II के लिए 1136 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्सन किया गया है खनन के लिए जिसमे 2,50,000 पेड़ कटेंगे। फेस-I में 762 हेक्टेयर जंगल काटे गए जिसमे 1,50,000 पेड़ कटे।
आदिवासियों के खिलाफ अन्याय, सरकार, संविधान और न्याय के बीच द्वंद्व
दोबारा, हसदेव से जुड़े जानकारों का माने तो नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा 2014 में (सुदीप श्रीवास्तव बनाम भारत संघ एवं अन्य) मामले में हसदेव में चल रहे खदान परसा ईस्ट केते बासन जो राजस्थान राज्य विद्युत् उत्पादन निगम को आबंटित हैं और खनन का एमडीओ (माइन डेव्हलेपर एंड ऑपरेटर) अडानी समूह के पास है की वन स्वीकृति को निरस्त करने का आदेश दिया था। साथ ही हसदेव जैसे वन क्षेत्र की जैवविविधता का विस्तृत अध्ययन करने के निर्देश दिए थे।
इसी आदेश के अनुपालन में आईसीएफआरई एवं डब्ल्यूआईआई द्वारा हसदेव अरण्य की बायोडायवर्सिटी स्टडी की गई है। आईसीएफआरई ने रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि हसदेव एक महत्वपूर्ण जैव विविधता से संपन्न वन क्षेत्र हैं जिस पर ओपनकास्ट माइनिंग के गंभीर एवं अपरिवर्तनीय प्रभाव पड़ेंगे।
2. आईसीएफआरई रिपोर्ट के अनुसार हसदेव अरण्ड कोलफील्ड्स की 14 खनन परियोजनाओं को खनन से दूर रखने की अनुशंसा की है। जिसका मुख्य कारण है सघन साल वन, महत्वपूर्ण वाटरशेड और ड्रेनेज जिसका हसदेव नदी के जल प्रवाह और इस पर बने मिनीमाता बांध के अस्तित्व में महत्वपूर्ण योगदान है।
3. लेकिन आईसीएफआरई ने 4 खनन परियोजनाओं क्रमश:परसा ईस्ट केते बासन पीईकेबी, तारा, परसा एवं केते एक्सटेंशन में खनन किये जा सकने की अनुशंसा की है। इसका कारण बताया गया है कि पीईकेबी में खनन पहले से ही चल रही है और बाकि परियोजनाओं की स्वीकृति की प्रक्रिया भी चल रही हैं तो इन्हें खनन के लिए कड़े पर्यावरणीय नियम एवं शर्तो के साथ खोला जा सकता है। तारा को छोड़ दें तो 4 में से 3 खदान राजस्थान को आवंटित है और इसमें खनन का एमडीओ अडानी समूह के पास है। अभी पेड़ कटाई पीईकेबी की फेस-II में चल रही है। जिसकी अंतिम वन स्वीकृति का आदेश कांग्रेस की सरकार ने अप्रैल, 2022 में जारी की थी। बताया गया कि ये चारों कोल ब्लॉक्स एक दूसरे से लगे हुए हैं, जो अडानी को चाहिए।
गौरतलब है कि डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट महत्वपूर्ण पहलू हैं जिस पर हमें ध्यान केन्द्रित करनी चाहिए-
1. भारतीय वन्यजीव अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के 9 वन्यजीव हसदेव के वनों में निवास करते हैं। इन वन्यजीवों का इस कानून के तहत उच्चतम कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है।
2. हसदेव हाथी और बाघ का महत्वपूर्ण रहवास और कॉरिडोर है। कान्हा, भोरमदेव से लेकर अचानकमार और हसदेव तक एक महत्वपूर्ण बाघ कॉरिडोर है जो आगे झारखण्ड के पलामू तक फैला हुआ है।
3. डब्ल्यूआईआई ने स्थानीय समुदाय का सर्वे किया और रिपोर्ट में उल्लेख है कि आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में स्थानीय लोगों की आजीविका, खाद्य और औषधीय जरूरतें वनों से सीधे रूप से जुड़ी है। इनका 60 से 70 प्रतिशत का सालाना आय वनों पर आधारित है। कुल 23 गांव का सर्वे करने के बाद डब्ल्यूआईआई इस नतीजे पर पहुंची कि स्थानीय समुदाय खनन नहीं चाहता बल्कि वे अपने वनों को ही अपने जीवन का आधार मानते हैं क्योंकि उनकी संस्कृति और समाज वन से ही जुड़ा है।
4. हसदेव एक महत्वपूर्ण हाथी रहवास है। खनन से वनों और वन्यजीवों पर अपरिवर्तनीय प्रभाव पड़ेंगे। हाथी -मानव द्वन्द एक बड़ी समस्या है छत्तीसगढ़ में। अगर हसदेव में खनन को और आगे बढ़ाया गया तो हाथी -मानव द्वन्द इतना विकराल हो जाएगा कि राज्य सरकार इसे संभाल नहीं पाएगी।
5. डब्ल्यूआईआई ने स्पष्ट लिखा है कि जैव विविधता और वन्य जीवों की दृष्टि से हसदेव अरण्ड एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है और इसका संरक्षण मूल्य बहुत ज्यादा है।
6. मौजूदा चालु खदान के अलावा कोई भी खनन परियोजना को इस क्षेत्र में नहीं खोला जाना चाहिए। हसदेव अरण्ड क्षेत्र को खनन के लिए ‘नो-गो एरिया’ घोषित किया जाना चाहिए और खनन से होने वाले अपरिवर्तनीय प्रभाव, समृद्ध जैव विविधता और सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए यहां कोई खनन नहीं किया जाना चाहिए।
7. मौजूदा खनन परियोजना पीईकेबी और चोटिया के भी गंभीर पर्यावरणीय प्रभाव हैं जिन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
जैसा कि बताया गया कि पीईकेबी हसदेव की मात्र चालु खदान है। इसका फेस-I का पूरा कोयला निकाल लिया गया है। अब फेस-II से कोयला निकलने के लिए अभी वनों की कटाई चल रही है। अप्रैल 2022 में कांग्रेस की सरकार ने फेस-II के वन भूमि के डायवर्सन यानि कि वन स्वीकृति जारी की। जिसके बाद से यहां कटाई शुरू हुई थी। लेकिन पिछले वर्ष ग्रामीणों के विरोध और अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन के कारण वह रुक गई। लेकिन नई सरकार के बनते ही भारी पुलिस बल लगा कर और आन्दोलन के नेतृत्वकताओं को गिरफ्तार कर तेजी से यहां कटाई शुरू हो गई। 43 हेक्टेयर की कटाई पिछले साल सितम्बर में हुई थी तब भी पुलिस बल लगाकर लोगों को गिरफ्तार कर कटाई की गई थी। अब भी वही हाल है। अब 91 हेक्टेयर में वनों की कटाई हो रही है, लोगों को पुलिस हिरासत से छोड़ दिए गए हैं लेकिन गांव में नजरबंद कर रखा है।

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