लोक मंचों पर आलोक बिखेरने वाला दीपक अब छोड़ गया स्मृतियों का उजियारा

अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं

अरुण कुमार निगम

 

लोक मंचों पर आलोक बिखेरने वाला "दीपक", देव-लोक को आलोकित करने चला गया और छोड़ गया इस लोक के लिए स्मृतियों की कभी भी धूमिल न होने वाली रेशमी-रश्मियाँ…। 

दीपक चन्द्राकर का जन्म ग्राम अर्जुन्दा में 01 जुलाई 1954 को हुआ था। पिता श्री उजियार सिंह चन्द्राकर से उन्हें छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत की समझ के साथ लोक-संस्कृति विरासत में मिली।

प्रारंभिक शिक्षा अर्जुन्दा में पूर्ण करने के बाद वे कल्याण महाविद्यालय से वाणिज्य में स्नातक हुए। स्नातकोत्तर की पढ़ाई उन्होंने दुर्गा महाविद्यालय, रायपुर से पूर्ण की। 

1971 से उन्होंने रंगमंच से नाता जोड़ लिया। दाऊ महासिंह चन्द्राकर को वे अपना प्रेरणा स्रोत मानते थे। उनके साथ उन्होंने 1977 से 1982 तक सोनहा बिहान में काम किया। दुर्ग के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी निर्देशक रामहृदय तिवारी को वे अपना आदर्श और गुरु मानते थे। 

दीपक चन्द्राकर ने लोरिक चंदा, हरेली, घर कहाँ है, गम्मतिहा, दसमत कैना आदि का निर्देशन करते हुए मुख्य भूमिका भी निभायी। सन् 1992 में उन्होंने स्वयं के लोकमंच "लोक रंग" की स्थापना की और छत्तीसगढ़ के अनेक स्थानों पर इसका प्रदर्शन करते रहे हैं।

उन्होंने इस संस्था के माध्यम से अनेक लोक कलाकारों को तैयार किया और उन्हें पहचान दी। लोक रंग के प्रदर्शन छत्तीसगढ़ के बाहर अनेक प्रदेशों में हुए हैं जिनमें से भोपाल, टाटानगर, दिल्ली, अमेठी आदि हैं। महाराष्ट्र में तो लोकरंग के एक सौ से भी अधिक प्रदर्शन हो चुके हैं। 

दीपक चन्द्राकर दूरदर्शन पर भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। लोरिक चंदा, हरेली, रथ यात्रा, अँजोर, आजादी के सौगात, रहस, कसक आदि नाटक उनके प्रमुख नाटकों में माने जाते हैं।

उन्होंने अनेक वीडियो फिल्मों जैसे संधि बेला, शिवनाथ की गोद में, आतंक, जेठू अउ पुनिया आदि में मुख्य भूमिका निभाते हुए नृत्य निर्देशन भी किया।

उन्होंने छत्तीसगढ़ी गीतों व लोकगीतों के अनेक कैसेट्स भी जारी किए जो छत्तीसगढ़ में काफी मशहूर हुए। वर्तमान दौर में उन्होंने अनेक लघु फिल्मों का निर्देशन किया है। ये सारी फिल्में यूट्यूब पर उपलब्ध हैं।

दीपक चन्द्राकर की प्रतिभा को अनेक मंचों ने सम्मानित किया। अपनी कला के प्रति वे पूर्णतः समर्पित रहे। रंग मंच में वे अनुशासन को काफी महत्व देते थे।

नवोदित कलाकारों को उन्होंने मंच दिया, उनकी कला को निखारा शायद इसी कारण अर्जुन्दा को लोक कलाकारों का गढ़ भी कहा जाता है।

अर्जुन्दा की माटी में लोक-कलाओं की सोंधी खुशबू सहज ही महसूस की जा सकती है। अनेक प्रतिभाओं के धनी होने के बावजूद वे काफी मिलनसार थे।

अहंकार उन्हें छू न सका। आज भले ही उन्होंने अपनी नश्वर देह का त्याग कर दिया है किंतु दीपक की रोशनी की तरह उनकी कला आने वाली पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त करती रहेगी। 


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