सिरपुर दुनिया की सबसे बड़ी बौद्ध विरासतों में से एक
सुशान्त कुमारसिरपुर दुनिया की सबसे बड़ी बौद्ध विरासतों में से एक है। यहां की कला-स्थापत्य, पुरातत्व दुनिया की महानतम सभ्यता व संस्कृति में गिना जाता है। दुनिया भर के इतिहास, संस्कृति, भाषा एवं पुरातत्व प्रेमी सिरपुर को बड़े उत्साह व साक्ष्य के तौर पर इसे देखा जा रहा है। इस महान सभ्यता एवं संस्कृति से रूबरू कराने के लिए यहां तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय महोत्सव एवं शोध संगोष्ठी का आयोजन 12, 13 एवं 14 मार्च को किया जा रहा है। इसमें भारत सहित अन्य देशों से धम्म, संस्कृति, शिक्षा, साहित्य, समाज, इतिहास, कला एवं स्थापत्य से जुड़े बौद्धिक हस्ताक्षर, शोधकर्ता, एवं बड़ी संख्या में लोग भागीदार बन रहे हैं।

बताया जा रहा है इस आयोजन में देश-विदेश से 500 से ज्यादा बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणी सहभागी बन रहे हैं। इस महोत्सव एवं शोध संगोष्ठी का प्रचार जोर-शोर पर किया गया है। गांव- शहर, हर-घर तक आयोजक टीम निमंत्रण पहुंचा रहे हैं।
आयोजन में पहुंच रहे आगंतुक संक्षेप में यह जान ले कि पहले यह जान ले कि छत्तीसगढ़ का कोई इतिहास नहीं है जो भी है वह कोसल का ही है। भारतवर्ष के मध्य में स्थित मध्यपदेश से अलग हुए छत्तीसगढ़ के दक्षिण पूर्वी भाग और उड़ीसा के पश्चिमी भाग को प्राचीन काल में 'दक्षिण कोसलÓ कहा जाता था। सिरपुर के अलावा विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त अतिभलेख, मुद्राओं तथा मुहरों के विशेष संदर्भ में इस भू-भाग का ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी से दसवीं शताब्दी तक का राजनैतिक इतिहास प्राप्त होता है। यह क्षेत्र अपनी अनुकूल जैविक परिस्थिति के कारण प्रागैतिहासिक काल से ही मानव सभ्यता का प्रमुख केन्द्र रहा है।
ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी से दक्षिण में सातवाहन वंशीय राजवंश से लेकर चेदि, वाकाटक तथा गुप्त राजवंश का प्रभाव व एकाधिकार यहां दृष्टिगत होता है। चौथी सदी में नलवंशीय, राजषितुल्य कुल, शरभपुरीय, पांडुवंशीय एवं सोमवंशीय जैसे स्थानीय राजवंशों का उल्लेख यहां प्राप्त होता है। वर्तमान में रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर और रायगढ़ का भू-भाग जो आज छत्तीसगढ़ राज्य में आता है प्राचीन काल में इसे कोसल अथवा दक्षिण कोसल कहा जाता था। परंतु इस प्रदेश की सीमाओं में परिवर्तन भी होता रहा है।
प्राचीन काल में उड़ीसा का पश्चिमी भाग (संबलपुर जिला) भी इसमें सम्मिलित था। जिसके आधार पर यह ज्ञात होता है कि सम्राट अशोक ने यहां बौद्ध स्तूप का निर्माण कराया था। अशोक के साम्राज्य के अंतर्गत कलिंग एवं रूपनाथ के होने की जानकारी उनके अभिलेखों से प्राप्त होती है। अत: अनुमान किया जा सकता है कि यह भाग भी उनके साम्राज्य का अंग रहा होगा। उस काल में पुरातात्विक स्थल, सरगुजा जिले के रायगढ़ के निकट जोगीमारा और सीताबेंगा नामक गुफाएं हैं। इसमें अशोककालीन लिपि में सुतनुका नामक देवदासी एवं उसके प्रेमी देवदत्त का उल्लेख है।
उक्त सीमाओं में परिबद्ध एवं मुख्तया महानदी एवं उसकी सहायक नदियों से सिंचित इस प्रदेश की प्राचीन राजधानी रायपुर जिले में महानदी के पूर्वी तट पर स्थित सिरपुर में थी। कहा यह भी जाता है कि बुद्ध ने ईसा पूर्व 475 के दौरान आनंद को धम्म उपदेश देने सिरपुर भेजा था। इतिहासकारों के अनुसार ईसा पूर्व छठी शती में कोसलाधिपति प्रसेनजित का दक्षिण कोसल नरेश के साथ युद्ध होना तय था। जो बुद्ध की मध्यस्थता के कारण रूक गया। तत्पश्चात बुद्ध यहां एक वर्षावास बिताकर दक्षिण कोसल को अपनी कार्यक्षेत्र तय किया था। कृतज्ञतावश दक्षिण कोसल के नरेश से एक हजार वस्त्रखंडों की भेंट स्वीकार की। संभवत: यह वस्त्र पाणिनि द्वारा उल्लेखित 'टिटला कद्रू रहा होगा। टिटलागढ़ नामक स्थान अब उड़ीसा के बलांगीर जिले में है, जो प्राचीन काल में दक्षिण कोसल का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था।
राजा प्रसेनजित के राजकाल में कोसल प्रसिद्ध हो गया। प्रसेनजित बुद्ध का अनुयायी और उनकी अवस्था का था। उसने काशी को अपने राज्य में मिलाया। किंतु अजातशत्रु ने, जो निरीह शाक्यों की हत्या के कारण कुख्यात था, अपने दुष्ट साथियों के साथ मिलकर प्रसेनजित को गद्दी से उतार दिया। सिरपुर प्राचीन काल मेें श्रीपुर के नाम से विख्यात रहा है तथा सोमवंशी शासकों के काल में इसे दक्षिण कोसल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त रहा है।
काल के शाश्वत नैतिक मूल्यों एवं मौलिक स्थापत्य शैली के साथ-साथ धार्मिक सौहाद्र्र तथा आध्यत्मिक ज्ञान-विज्ञान के प्रकाश से आलोकित सिरपुर भारतीय कला के इतिहास में विशिष्ट कला तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। सिरपुर की प्राचीनता का सर्वप्रथम परिचय शरभपुरीय शासक प्रवरराज तथा महासुदवराज के ताम्रपत्रों में उपलब्ध होता है जिनमें श्रीपुर से भूमिदान दिया गया था। सोमवंशी शासकों के काल में सिरपुर दक्षिण कोसल का महत्वपूर्ण राजनैतिक एवं सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इस वंश के महाप्रतापी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के 58 वर्षीय सुदीर्घ शासन काल (595 से 653 ईसवी) में यहां अनेकानेक मंदिर, मठ, बौद्ध विहार, सरोवर तथा उद्यानों का निर्माण करवाया गया।
आज स्थिति यह है कि पुरातात्विक महत्व के इस स्थान को हिन्दु धर्म के साथ कई अन्य धर्म के लोगों ने अवैध अतिक्रमन कर मंदिर और व्यवसायिक प्रतिष्ठान का क्षेत्र बना दिया है। संरक्षण के अभाव में यह क्षेत्र अतित के गर्भ में सिमटता जा रहा है।
सातवीं सदी ईसवी में चीन के महान पर्यटक तथा बौद्ध विद्वान ह्वेनसांग नेे दक्षिण कोसल की 639 ईसवी में यात्रा की थी। वे अपने जीवनी लेखन में कोसल को 'क्यिावसलो' नाम से पुकारते थे। उनके अनुसार सिरपुर में उस समय लगभग 100 संघाराम थे। जिनमें महायान संप्रदाय के 10 हजार भिक्षु निवास करते थे। बौद्ध विद्वानों का मानना है कि वर्तमान में सिरपुर में स्थित लक्ष्मण मंदिर, वह महायान संप्रदाय के अनुयायी नागार्जुन का विहार हुआ करता था। जो यहां नालंदा से शिक्षा देने पहुंचते थे।
एक मात्र शिलाटंकित नाट्यशाला रायगढ़ के निकट जोगीमढ़ा गुफा है। जिसपर मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में प्राकृत के दो लेख अंकित है। एक में सुतनुका नाम की देवदासी तथा देवदत्त नामक 'रूपदक्ष' की प्रेम कहानी का और दूसरे लेख में ऋतुराज बसंत का छंदोबद्ध वर्णन है। दो नदियों के संगम पर अवस्थित ताला नामक ग्राम में छठीं शती ईसवी के दो विशाल शिवमंदिर मिले हैं। जिनकी बनावट और रूपसज्जा चालुक्य तथा वाकाटक शैलियों से प्रीाावित है। इनमें से बड़े मंदिर में रूद्रभैरव की एक विलक्षण विशालकाय अष्टमुख्य प्रतिमा मिली है। जिसमें अंग-प्रत्यंग विभिन्न जीव-जंतुओं की आवृत्तियों से निर्मित है।
राजिम का विख्यात छठी शती का राजीवलोचन मंदिर दक्षिण कोसल की विशिष्ट वस्तुशैली का जनक है। इस कारण से सिरपुर और राजीवलोचन मंदिर में मूर्तियों और मंदिर निर्माण में कई समानतायें हैं। इस शैली का विकसित रूप महाशिव गुप्त बालार्जुन के राज्य काल में निर्मित सिरपुर तथा खारोय के मंदिरों में तथा पलारी के सिद्धेश्वर मंदिर में देखी जा सकती है। वे मंदिर पंचरथ आकार के ईंटों से बने थे पर इनके पाषारण निर्मित द्वारा गंगा-यमुना की महाकाय, ललित विभंग मुद्रा में खड़ी मूर्तियों से अलंकृत होते हैं।
सिरपुर के पुरावैभव की ओर से तत्कालीन ब्रिटिश विद्वान बेगलर (1873-74वीं) एवं सर अलेक्जेंडर कनिंघम (1881-82 ईस्वी) के द्वारा सर्वप्रथम प्रकाश डालते हुए आर्केलाजिकल एर्वे रिपोर्टस ऑफ इंडिया खंड 7 तथा 17 में संबंधित प्रारंभिक विवरण प्रकाशित किए गए हैं। सिरपुर के गर्भ में छिपे पुरातत्वीय रहस्यों को उजागर करने के उद्देश्य से समय-समय पर उत्खनन के प्रयास किए गए। जिनसे सिरपुर के पुरातत्व वैभव और सांस्कृतिक इतिहास पर प्रचुर प्रकाश पड़ा है।
जापानी भदंत सुरई ससाई व प्रख्यात पुरातत्विद अरूण कुमार शर्मा के निर्देशन में वर्ष 1990 से 2005 के मध्य दक्षिण कोसल की राजधानी सिरपुर की पुरातात्विक महत्व को अधिकाधिक उजागर करते हुए इसे अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने तथा उपलब्ध सांस्कृतिक निधि को विश्व धरोहर के रूप में स्थापित करने की दिशा में सफलता अर्जित की।
इन वर्षों में 6 बौद्ध विहार, 1 बौद्ध स्तूप, 1 बेद पाठशाला, 1 जैन विहार, 7 आवासीय भव, 8 शिव मंदिर तथा विशाल औद्योगिक स्थल जहां चौड़े-चौड़े रास्ते 48 अन्नागार तथा कई आयुर्वेदिक स्नान कुंड प्रकाश में आए हैं।
इतिहासकारों के अनुसार दक्षिण कोसल का क्षेत्र संभवत: नंद- र्मार्य साम्राज्य का अंग था। इसकी पुष्टि चीनी यात्री ह्वेनसांग की यात्रा विवरण से होती है। इसी स्थल से देश की प्राचीनतम नाट्यशाला। नंद-र्मार्य के सिक्के रायपुर तथा बिलासपुर जिले के अनेक स्थलों से प्राप्त हुवे हैं। आचार्य नरेन्द्र देव रचित अवदान शतक नामक संस्कृत ग्रंथ से जानकारी मिलती है कि भगवान बुद्ध ने दक्षिण कोसल की राजधानी में तीन माह प्रवास किया था। जब बुद्ध गृह त्याग करके राजगृह गए। तब राजा बिंबिसार ने उनसे मिलकर पूछा था कि 'तुम कौन हो?' । तब बुद्ध ने कहा था -उजुं जानपदो राजा हिमवन्तस्स पस्सतो। धनविरियेन समपन्नो कोसलेसु निकेतिनो।। आदिच्या नाम गोत्तेन साकिया नाम जातिया। तम्हा कुल पब्बजितोम्हिं राज न कामे अभिपत्थयं।। अर्थात 'हे राजा, यहां से सीधे हिमालय की तलहटी में कोसल देशों में से एक जनपद है। उसका गोत्र आदित्य है और जाति शाक्य। हे राजा उस कुल से कामोपभोगों की इच्छा छोड़कर, मैं परिव्राजक बन गया हूं।'
महत्व यह भी है कि श्रीपुर अर्थात सिरपुर में बुद्ध, नागार्जुन, ह्वेनसांग के साथ बोधिसत्व डॉ. भीमराव आम्बेडकर सहित कई शख्सियतों की उपस्थिति यहां तथा इसके आस-पास रहे हैं। इसके इसे विश्व पटल में लाने के लिये वर्षों से अंतरराष्ट्रीय बौद्ध आयोजन यहां किये जाते हैं। इतिहास के पन्ने पलटने के साथ ऐतिहासिक जानकारियां आप तक पहुंचते रहेगा। अतित के गौरवशाली इतिहास के साथ प्रबुद्ध भारत के नवनिर्माण में यह कार्य पत्रकारिता के क्षेत्र में आगे बढ़ेगा।
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