राज्यसभा चुनाव: नारी शक्ति पर भरोसा:
छत्तीसगढ़ के राज्यसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस का महिला कार्ड:
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इस बार राज्यसभा चुनाव एक खास संदेश के साथ सामने आया है। राज्य की दो खाली हो रही सीटों के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस—दोनों ही प्रमुख दलों ने महिला प्रत्याशियों को मैदान में उतारकर नारी शक्ति को आगे बढ़ाने की पहल की है। भाजपा ने जहां लक्ष्मी वर्मा को उम्मीदवार बनाया है, वहीं कांग्रेस ने एक बार फिर फूलोदेवी नेताम पर भरोसा जताया है। ...
मुनाफे की मशीन में पिसा बचपन, पीडि़त के पक्ष में फैसला नहीं:
कोर्ट ने कारखाना मालिक पर ठोका 2.80 लाख रुपए का जुर्माना:
कबीरधाम जिला, ग्राम मंझोली के श्रवण गुड़ उद्योग में 17 वर्षीय किशोर युवक मनोज कुमार की मौत के मामले में न्यायालय ने अपना अंतिम फैसला सुना दिया है। न्यायालय ने कारखाना मालिक श्रवण कुमार चंद्रवंशी को श्रमिक मनोज की मौत और सुरक्षा मानकों की अनदेखी का मुख्य जिम्मेदार माना है।...
बस्तर के पत्रकार प्रभात सिंह की संघर्षपूर्ण कहानी:
पत्रकारिता की लड़ाई में अपने भाई जैसे दोस्त मुकेश चंद्राकर को खो दिया:
उनकी सबसे चर्चित रिपोर्ट "झूठे हैं पुलिस के बयानः मोदेनार" अप्रैल 2015 में आई, जिसके लिए उन्होंने बस्तर के तत्कालीन आईजी एसआरपी कल्लूरी की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साहस दिखाते हुए कठिन सवाल पूछे। जहां ज्यादातर स्थानीय पत्रकार चुप रहते थे या सिर्फ हैंडआउट लेते थे, वहां प्रभात ने सवाल किए कि पुलिस की कार्रवाइयों में कितनी पारदर्शिता है। इस रिपोर्ट के बाद वे पुलिस प्रशासन के निशाने पर आ गए।...
धम्मदूत संघरत्न मानके ने प्रज्ञागिरी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलवाई:
प्रज्ञागिरी में धम्मदूत संघरत्न मानके की प्रतिमा स्थापित की जाएं-कन्हैयालाल खोब्रागढ़े:
इस वर्ष डोंगरगढ़ में आयोजित अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मलेन 33वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। हालांकि अब यहां दो आयोजन होते हैं लेकिन इसकी शुरूआत बौद्ध भदंत संघरत्न मानके ने आज से 33 वर्ष पहले राजनांदगांव के कुछ महत्वूपूर्ण बौद्ध अनुयायियों के साथ की थी। उन्होंनें सोचा था कि यहां अंतरराष्ट्रीय बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना हो, बौद्ध भिक्षु प्रशिक्षण केन्द्र हो, लघु उद्योग हो तथा विशाल वाचनालय हो लेकिन बदलते समय के साथ यह सम्मेलन अब धर्म से हटकर विभिन्न राजनैतिक पार्टियों का अखाड़ा बनता जा रहा है।...
ऐतिहासिक डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय आंदोलन:
दलित समाज की जीत नहीं बल्कि लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और समानता की जीत है:
मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर विश्वविद्यालय के नाम से नाम देना एक लंबा आंदोलन (जो कि ऐतिहासिक नामंकरण आंदोलन) था, जो लगभग 16 साल चला और अन्तत: सफल हुआ। इस विश्वविद्यालय की स्थापना 23 अगस्त 1958 को हुई थी। ...